यूरोप के 27 देशों में भारत के उत्पादों की होगी धमक

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच 27 जनवरी को जिस ऐतिहासिक व्यापार समझौते पर मुहर लगी, वह सिर्फ एक आर्थिक करार नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक शक्ति-संतुलन की कहानी भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व- यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंतोनियो कोस्टा- इस समझौते को अमेरिका और चीन जैसी दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से उपजी चुनौतियों के बीच एक रणनीतिक ढाल के रूप में देख रहे हैं। यूरोप के 27 देशों ने भारत के उत्पाद अपनी धमक दिखाएंगे।
गणतंत्र दिवस पर भारत के मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए यूरोपीय नेता 27 जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी से मिले, जहां इस समझौते का औपचारिक ऐलान किया गया।
पिछले एक दशक में भारत और इयू के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 90 प्रतिशत बढ़कर 2024 में 120 अरब यूरो तक पहुंच गया है। इसके अलावा सेवाओं के क्षेत्र में करीब 60 अरब यूरो का व्यापार हुआ। इसी तेजी को देखते हुए भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को “मदर ऑफ ऑल डील्स” करार दिया है। इस करार के तहत भारत, यूरोपीय कारों और वाइन जैसे प्रमुख उत्पादों के लिए अपने बाजार को खोल दिया है। इसके बदले में भारतीय वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य उत्पादों की यूरोपीय बाजार में पहुंच आसान हो गयी है। उर्सुला वॉन डर लेयेन ने कहा है कि यह समझौता “भारतीय बाजार में किसी भी व्यापार साझेदार को अब तक मिली सबसे ऊंची पहुंच” और इससे के भारत को होने वाले निर्यात दोगुने हो सकते हैं।
हालांकि बातचीत आखिरी क्षणों तक आसान नहीं रही। यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर टैक्स का भारतीय स्टील उद्योग पर पड़ने वाला असर जैसे मुद्दे आखिरी दौर तक अटके रहे। इसके बावजूद दोनों पक्षों ने समझौते को ऐतिहासिक और दूरदर्शी बताया। यह करार ऐसे समय पर सामने आया है जब अमेरिका की टैरिफ नीतियां और चीन के निर्यात नियंत्रण वैश्विक व्यापार को अस्थिर बना रहे हैं। भारत और ईयू, दोनों ही नए बाजार खोलने और आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविध बनाने की कोशिश में हैं। इसके साथ ही, श्रमिकों, छात्रों, शोधकर्ताओं और उच्च कुशल पेशेवरों की आवाजाही को आसान बनाने वाला समझौता और एक सुरक्षा व रक्षा सहयोग पैक्ट भी लगभग तय माना जा रहा है।
उर्सुला वॉन डर लेयेन के शब्दों में, “भारत और यूरोप ने एक स्पष्ट विकल्प चुना है। रणनीतिक साझेदारी, संवाद और खुलेपन का।” एक बिखरी हुई दुनिया में यह समझौता यह संदेश देता है कि सहयोग और भरोसे पर आधारित रास्ता अब भी संभव है।
दरअसल स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता, ऊँची ब्याज दरें और भू-राजनीतिक तनावों के बीच यदि कोई उभरती हुई अर्थव्यवस्था निवेशकों को स्थिरता और भरोसा देती नजर आ रही है, तो वह भारत है। अंतरराष्ट्रीय निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स ने भारत की मध्यम अवधि की आर्थिक विकास संभावनाओं को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया है और विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ाने की सलाह दी है। भारत-यूरोपीय संघ समझौता भी इसी की तरफ इशारा करता है।
गोल्डमैन सैक्स का कहना है कि भारत की घरेलू आर्थिक स्थिति इस समय संतुलित बनी हुई है। महंगाई दर अपने उच्चतम स्तर के आसपास पहुँचकर नियंत्रण में दिख रही है, वहीं चालू खाते का घाटा भी ऐसी सीमा में है जिसे आसानी से संभाला जा सकता है। इन परिस्थितियों में भारत न केवल आर्थिक स्थिरता का संकेत देता है, बल्कि आने वाले वर्षों में तेज विकास की ठोस संभावना भी प्रस्तुत करता है। निवेश रणनीति के संदर्भ में गोल्डमैन सैक्स भारत में घरेलू चक्रीय क्षेत्रों को वैश्विक चक्रीय क्षेत्रों की तुलना में अधिक मजबूत मानता है। बैंकिंग क्षेत्र और निवेश आधारित उद्योग-जैसे बुनियादी ढाँचा, औद्योगिक क्षेत्र और सीमेंट उद्योग-पर संस्था का विशेष भरोसा बना हुआ है। इसका अर्थ यह है कि आने वाले समय में ऋण मांग, औद्योगिक विस्तार और निर्माण गतिविधियों में मजबूती देखने को मिल सकती है। रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि आने वाले वर्षों में उचित मूल्य पर गुणवत्ता, पूंजीगत व्यय में पुनरुद्धार और मेक इन इंडिया अभियान जैसी अवधारणाएँ भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएँगी। सरकार द्वारा घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने की नीतियाँ, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता पर जोर और निजी निवेश में वृद्धि-ये सभी तत्व भारत की विकास यात्रा को नई दिशा दे रहे हैं।
गोल्डमैन सैक्स ने निवेशकों के लिए दो प्रमुख श्रेणियाँ चिन्हित की हैं। पहली श्रेणी है बड़े आकार की निरंतर विकास करने वाली कंपनियाँ, जिनमें एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, भारती एयरटेल, बजाज फाइनेंस, एलएंडटी, मारुति सुजुकी, टाइटन, अडानी पोर्ट्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, अल्ट्राटेक सीमेंट, सीमेंस, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, अपोलो हॉस्पिटल्स, जोमैटो और पेटीएम की मूल कंपनी शामिल हैं। इन कंपनियों को उनकी मजबूत वित्तीय स्थिति, भरोसेमंद व्यापार मॉडल और लंबे समय में लगातार लाभ देने की क्षमता के लिए जाना जाता है। दूसरी श्रेणी है मध्यम आकार की तेजी से बढ़ने वाली कंपनियाँ, जिन्हें भविष्य के बहुगुणक लाभ देने की संभावना वाला माना गया है। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार, इस श्रेणी की कंपनियों ने पिछले कुछ समय में देश के प्रमुख सूचकांक से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत के मध्यम आकार के उद्योगों में अभी भी अपार संभावनाएँ छिपी हुई हैं।
कुल मिलाकर, गोल्डमैन सैक्स की यह रिपोर्ट भारत को केवल एक सुरक्षित निवेश विकल्प ही नहीं, बल्कि वैश्विक पूंजी के लिए एक दीर्घकालिक और विश्वसनीय विकास केंद्र के रूप में प्रस्तुत करती है। जब दुनिया की कई अर्थव्यवस्थाएँ दबाव और अस्थिरता से जूझ रही हैं, तब भारत की कहानी स्थिरता, सुधार और भविष्य की संभावनाओं की कहानी बनकर उभर रही है।(वीपी राहुल-हिफी फीचर)


