यूजीसी का ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन एक्ट 2026

13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने प्रोमोशन ऑफ इक्विटी इन हॉयर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026 को अधिसूचित किया, जिससे वर्ष 2012 का पुराना ढांचा समाप्त हो गया। यह विनियमन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 में निहित “इक्विटी और इन्क्लूजन” की अवधारणा से प्रेरित है और इसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव से निपटने के लिए एक संस्थागत व्यवस्था खड़ी करना बताया गया है। नियमों के अनुसार, इनका लक्ष्य धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना है, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांग व्यक्तियों के विरुद्ध। पहली नजर में यह उद्देश्य असामान्य या विवादास्पद नहीं लगता, क्योंकि भारत में आरक्षण और सामाजिक न्याय की नीतियाँ लंबे समय से लागू रही हैं लेकिन नियमों की भाषा और संरचना को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
आलोचकों का कहना है कि जहां नियमों में “विशेष रूप से” शब्द का प्रयोग किया गया है, वहीं व्यवहार में यह विनियमन भेदभाव की अवधारणा को लगभग पूरी तरह आरक्षित वर्गों तक सीमित कर देता है। सामान्य वर्ग के व्यक्तियों को उनकी जातिगत पहचान के आधार पर भेदभाव का संभावित शिकार मानने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। इससे यह धारणा बनती है कि जातिगत भेदभाव केवल एक दिशा में संभव है, जो सामाजिक यथार्थ को अत्यधिक सरलीकृत कर देता है। इन नियमों के तहत सभी केंद्रीय, राज्य, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (ईओसी) की स्थापना अनिवार्य की गई है। इसके अंतर्गत इक्विटी कमेटी, 24ग7 हेल्पलाइन, ऑनलाइन और ऑफलाइन शिकायत प्रणाली तथा समयबद्ध जांच और कार्रवाई का प्रावधान है। साथ ही ‘इक्विटी स्क्वॉड’ और ‘इक्विटी एंबेसडर’ जैसे नए पदों की भी व्यवस्था की गई है, जिनका कार्य परिसर में व्यवहार की निगरानी करना होगा। यह ढांचा विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका को केवल शैक्षणिक संचालन से आगे बढ़ाकर निगरानी, जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई तक विस्तारित करता है।
आलोचकों के अनुसार, यह परिवर्तन विश्वविद्यालयों को संवाद और विमर्श के खुले मंच के बजाय एक अत्यधिक नियंत्रित और संदेहपूर्ण स्थान में बदल सकता है, विशेषकर ऐसे समय में जब कैंपस पहले से ही वैचारिक और राजनीतिक बहसों के केंद्र बने हुए हैं। नियमों की एक प्रमुख आलोचना यह भी है कि इनमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए किसी प्रकार के दंड का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इससे प्राकृतिक न्याय और निष्पक्ष प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं। आशंका जताई जा रही है कि शिकायत को प्राथमिक सत्य मानकर आरोपी को पहले से दोषी की तरह देखा जाएगा, जिससे छात्रों और शिक्षकों के भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।निस्संदेह, ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार करना और भेदभाव के विरुद्ध ठोस कदम उठाना आवश्यक है।(वीपी राहुल-हिफी फीचर)


