भारत-यूरोप मुक्त व्यापार

इस वर्ष भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो लुईस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन की मौजूदगी केवल औपचारिक कूटनीतिक शिष्टाचार भर नहीं है। यह उपस्थिति ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक राजनीति और व्यापार दोनों अस्थिर दौर से गुजर रहे हैं। भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) इस दौरे का सबसे अहम एजेंडा माना जा रहा है।यूरोप के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा व्यापारिक साझेदारों पर बार-बार टैरिफ की धमकी और रणनीतिक दबाव ने यूरोप को नए भरोसेमंद साझेदारों की तलाश में धकेला है। वहीं, भारत भी अमेरिकी टैरिफ विवादों के बीच अपनी आर्थिक और कूटनीतिक रणनीति को विविध बनाने की कोशिश में है। ऐसे में भारत-यूरोप की नजदीकी एक स्पष्ट संदेश देती है कि नई दिल्ली किसी एक वैश्विक शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय बहुध्रुवीय विदेश नीति को तेजी से आगे बढ़ा रही है। सूत्रों के मुताबिक, 27 जनवरी को होने वाले उच्चस्तरीय शिखर सम्मेलन में इस समझौते की औपचारिक घोषणा संभव है। लगभग दो दशकों से चली आ रही बातचीत अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। यदि यह समझौता होता है, तो यह भारत का चार वर्षों में नौवां एफटीए होगा, जो उसके अब तक के अपेक्षाकृत संरक्षणवादी व्यापार दृष्टिकोण से एक अहम बदलाव को दर्शाता है। आर्थिक दृष्टि से यह सौदा दोनों पक्षों के लिए महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया की चैथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है और उसकी तेज विकास दर यूरोप के लिए आकर्षण का केंद्र है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ पहले से ही भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इस समझौते से भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय बाजार में दोबारा तरजीह पहुंच मिल सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां हाल के वर्षों में प्रतिस्र्पाात्मकता घटी है। भारतीय उद्योग के लिए यह समझौता कपड़ा, दवाइयों, स्टील, पेट्रोलियम उत्पादों और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खोल सकता है। हालांकि भारत कृषि और डेयरी जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में सतर्क रुख अपनाने के संकेत दे चुका है। ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स जैसे क्षेत्रों में टैरिफ में कटौती संभवतः चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। फिर भी, कुछ गंभीर मतभेद बने हुए हैं। यूरोप बौद्धिक संपदा अधिकारों और डेटा
सुरक्षा पर सख्त मानक चाहता है, जबकि भारत यूरोप के नए कार्बन टैक्स तंत्र कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म को लेकर चिंतित है। आशंका है कि यह व्यवस्था भारतीय निर्यात, खासकर सूक्ष्म और लघु उद्योगों के लिए अतिरिक्त बोझ बन सकती है। इन चुनौतियों के बावजूद, विश्लेषकों का मानना है कि दीर्घकाल में यह समझौता दोनों पक्षों के लिए लाभकारी हो सकता है। यह न
केवल अमेरिका और चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करेगा, बल्कि
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक स्थिर और संतुलित बनाने में भी मदद करेगा। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)


