आर्थिक क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता

भारत के आर्थिक इतिहास में हालिया वर्षों को एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक आँकड़ों के अनुसार भारत अब दुनिया की चैथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद (नॉमिनल जीडीपी) के आधार पर भारत ने जापान को पीछे छोड़ते हुए यह स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि केवल एक रैंकिंग परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की बदलती वैश्विक पहचान का संकेत है।
स्वतंत्रता मिलने के समय भारत की अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक शोषण से जर्जर थी। सीमित संसाधन, कमजोर औद्योगिक ढाँचा और व्यापक गरीबी भारत की पहचान बने हुए थे लेकिन समय के साथ भारत ने अपने आर्थिक ढाँचे को पुनर्गठित किया और 1991 के आर्थिक सुधारों ने देश को वैश्विक बाजार से जोड़ा और उदारीकरण, निजीकरण व वैश्वीकरण की नीतियों ने विकास को नई गति दी।
पिछले एक दशक में भारत की आर्थिक प्रगति विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है। जीएसटी, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों ने व्यापार, उद्योग और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। डिजिटल भुगतान प्रणाली ने भारत को फिनटेक क्रांति का वैश्विक उदाहरण बना दिया है।
भारत की इस उपलब्धि के पीछे उसकी युवा आबादी सबसे बड़ी ताकत है। देश का युवा वर्ग तकनीक, नवाचार और उद्यमिता के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। आज भारत दुनिया के सबसे बड़े स्टार्ट-अप इकोसिस्टम में से एक है। सेवा क्षेत्र, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवाओं में भारत की वैश्विक भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
वैश्विक मंच पर भारत की आर्थिक मजबूती का प्रभाव स्पष्ट दिखने लगा है। जी-20 जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका निर्णायक हुई है। विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत को वैकल्पिक उत्पादन केंद्र के रूप में देख रही हैं। आर्थिक शक्ति ने भारत को केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि नीति-निर्धारक राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ाया है।
हालाँकि, यह सफलता चुनौतियों से मुक्त नहीं है। बेरोजगारी, आय असमानता, महँगाई और पर्यावरणीय संकट जैसी समस्याएँ अभी भी गंभीर हैं। आर्थिक विकास का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचे और विकास समावेशी व टिकाऊ बने।
भारत का चैथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना एक उपलब्धि के साथ-साथ एक जिम्मेदारी भी है। आने वाले वर्षों में भारत के सामने अवसर हंै कि वह न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक और मानवीय
मूल्यों के साथ वैश्विक नेतृत्व प्रस्तुत करे। यह उपलब्धि इस बात का
प्रमाण है कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है- आत्मविश्वास के साथ, लेकिन संतुलन और संवेदनशीलता के साथ।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)


