कारोबार

खाद्य तेलों का आयात हुआ महंगा

हमारे देश मंे सकल घरेलू उत्पाद अर्थात् जीडीपी की दर भले ही बढ़ी है लेकिन हमारा रुपया अमेरिकी डालर के मुकाबले नीचे लुढ़क गया है। इसके कई दुष्प्रभाव देखने को मिलेंगे। सबसे ज्यादा इसका असर खाद्य तेलों पर पड़ेगा। खाद्य तेलों का आयात महंगा हो जाएगा। रबी की फसल तैयार होने में काफी समय है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरसों की फसल अच्छी होगी और तिलहन के क्षेत्र मंे हमारा देश आत्मनिर्भर हो जाएगा। हमारे देश मंे खरीफ की फसल में खाद्यान्न का उत्पादन अच्छा हुआ है। तिलहन फसलों की खेती का रकबा भी बढ़ा है। अनुमान है कि चालू रबी सीजन मंे 84.10 लाख हेक्टेयर मंे तिलहनी फसलें उगाई जाएंगी। रबी की फसलों मंे सिंचाई की समस्या नहीं आएगी। हमारे बांधों और जलाशयों मंे पानी का स्टाक 90 फीसद तक अभी है। यह स्टाक थोड़ा कम भी हो जाएगा तो विशेष फर्क नहीं पड़ेगा।
अमरीकी डॉलर की तुलना में भारतीय मुद्रा (रुपया) की विनिमय दर लुढ़ककर सर्वकालीन निचले स्तर पर आ जाने से विदेशी खाद्य तेलों का आयात काफी महंगा हो गया है जिससे अनेक रिफाइनर्स ने दिसम्बर तथा जनवरी शिपमेंट के लिए किए गए आयात अनुबंधों को निरस्त (कैंसिल) कर दिया है।
इससे घरेलू प्रभाग में तिलहनों की मांग खपत एवं कीमत में सुधार आने का संकेत मिलने लगे हैं। क्रूड खाद्य तेलों का आयात ज्यादा महंगा हो जाने का असर रिफाइनर्स की कार्य क्षमता एवं गतिविधि पर पड़ने लगा है और वे स्वदेशी खाद्य तेलों की खरीद पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इससे क्रशिंग इकाइयों में तिलहन की मांग बढ़ गई है और तदनुरूप तिलहनों के दाम में सुधार आने लगा है। अभी तो रिफाइनर्स के पास पूर्व में आयातित क्रूड खाद्य तेलों का स्टॉक बचा हुआ है लेकिन जब यह घट जाएगा तब अगले महीने यानी जनवरी में इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ सकता है।
उद्योग समीक्षकों के अनुसार विदेशों से खाद्य तेलों का आयात जारी रखना आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद साबित नहीं हो रहा है। इसलिए स्वदेशी तिलहनों की खरीद एवं क्रशिंग पर विशेष जोर दिया जाने लगा है। 11 दिसम्बर 2025 को डॉलर का मूल्य उछलकर 90.48 रुपए के शीर्ष स्तर पर पहुंच गया।
एक अग्रणी विश्लेषक के मुताबिक आयातित सोयाबीन तेल का भाव 2 रुपए प्रति लीटर बढ़ जाने से भारतीय आयातकों ने दिसम्बर एवं जनवरी शिपमेंट के लिए करीब 70 हजार टन क्रूड सोया तेल के सौदे को कैंसिल कर दिया है।
अमरीकी कृषि विभाग (उस्डा) ने अपनी नई मासिक रिपोर्ट में 2025-26 के मार्केटिंग सीजन के दौरान भारत में चावल का सकल उत्पादन उछलकर 15.20 करोड़ टन के सर्वकालीन सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने तथा गेहूं का उत्पादन 11.30 करोड़ टन से बढ़कर 11.79 करोड़ टन के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाने का अनुमान लगाया है लेकिन तिलहनों का उत्पादन 415 लाख टन से घटकर 403 लाख टन रह जाने की संभावना व्यक्त की गयी। इस उत्पादन आंकड़े में खरीफ, रबी एवं जायद- तीनों सीजन की पैदावार का अनुमान शामिल है।
वर्तमान रबी सीजन में गेहूं का उत्पादन क्षेत्र बढ़कर 241.40 लाख हेक्टेयर पर पहुंच चुका है जो पिछले साल के बिजाई क्षेत्र 217.80 लाख हेक्टेयर से काफी अधिक है। रबी सीजन के इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण खाद्यान्न की खेती में किसानों का भारी उत्साह बरकरार है। उस्डा की रिपोर्ट के अनुसार 2025-26 के खरीफ सीजन के दौरान भारत में धान का क्षेत्रफल बढ़कर 441 लाख हेक्टेयर के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया जबकि दक्षिण-पश्चिम मानसून की जोरदार बारिश भी हुई। इससे धान-चावल के उत्पादन में अच्छी बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद है। इस बार कुछ क्षेत्रों में कपास के बजाए किसानों ने धान की खेती को प्राथमिकता दी।
जहां तक तिलहन फसलों की बात है तो यद्यपि चालू रबी सीजन में इसका बिजाई क्षेत्र बढ़कर 84.10 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है जो पिछले साल के क्षेत्रफल 81.70 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है लेकिन इसके बावजूद तिलहनों के कुल वार्षिक उत्पादन में करीब 12 लाख टन की गिरावट आने का अनुमान लगाया गया है। खरीफ सीजन में सोयाबीन की फसल को अधिशेष बारिश एवं भयंकर बाढ़ से नुकसान हुआ। वैसे मूंगफली फसल की हालत आमतौर पर अच्छी रही। मौजूदा रबी सीजन में सरसों का रकबा बढ़ रहा है और मौसम की स्थिति भी काफी हद तक अनुकूल बनी हुई है।
रबी फसलों मंे सिंचाई की समस्या नहीं आएगी। भारत के 166 प्रमुख बांधों-जलाशयों में पानी का कुल स्टॉक लगातार पांचवें सप्ताह भी इसकी कुल भंडारण क्षमता के मुकाबले 90 प्रतिशत से नीचे ही रहा क्योंकि देश के अधिकांश इलाकों में पिछले सप्ताह बारिश की कमी देखी गई। राष्ट्रीय स्तर पर गत सप्ताह केवल 1.7 मि०मी० वर्षा हुई जो सामान्य औसत 3.7 मि०मी० से 55 प्रतिशत कम रही। केन्द्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के नवीनतम साप्ताहिक आंकड़ों के अनुसार सभी 166 प्रमुख बांधों-जलाशयों में पानी का स्टॉक घटकर 155.226 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) रह गया जो
उसकी कुल भंडारण क्षमता का 84.56 प्रतिशत है। इसके बावजूद पानी का यह स्टॉक गत वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 7.5 प्रतिशत और 10 वर्षीय औसत स्तर के मुकाबले 22.23 प्रतिशत ज्यादा है। इसे देखते हुए लगता है कि रबी फसलों की सिंचाई के लिए बांधों- जलाशयों में अब भी पानी का पर्याप्त स्टॉक
उपलब्ध है।
मौसम विभाग के मुताबिक पिछले सप्ताह देश के पूर्वी एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र पश्चिमोत्तर भाग तथा मध्यवर्ती राज्यों में बारिश का 100 प्रतिशत अभाव रहा यानी वहां वर्षा बिल्कुल नहीं हुई जबकि दक्षिण भारत में भी 20 प्रतिशत कम बारिश हुई। रबी फसलों की जोरदार बिजाई अभी जारी है और इसका कुल रकबा 479 लाख हेक्टेयर से ऊपर पहुंच चुका है। कुछ क्षेत्रों
में दिन का तापमान ऊंचे स्तर पर रहता है जिससे खेतों की मिटटी
से नमी सूखने लगी है। ऐसे क्षेत्रों
में बारिश की जरूरत महसूस होने वाली है और फसलों की सिंचाई के लिए किसानों ने प्रयास आरंभ कर दिया है।
(अखिलेश पाठक-हिफी फीचर)

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