संयुक्त राष्ट्र के खाते में खत्म हो रहे हैं पैसे

न्यूयॉर्क के ईस्ट रिवर के किनारे खड़ी एक विशाल इमारत जिसे दुनिया “संयुक्त राष्ट्र” के नाम से जानती है, हर दिन शांति, युद्ध, भूख, विस्थापन और मानवाधिकारों पर फैसले सुनाती है लेकिन इस बार चिंता किसी युद्ध क्षेत्र से नहीं आई। चिंता इमारत के भीतर, फाइलों और बजट शीटों के बीच पैदा हुई है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दुनिया के 193 देशों को एक पत्र लिखा है और उसमें एक ऐसी चेतावनी दी है, जो किसी मिसाइल अलर्ट से कम नहीं लगती। गुटेरेस का कहना है अगर देशों ने समय पर पैसा नहीं दिया, तो यूएन जुलाई 2026 तक नकदी के मामले में खाली हो सकता है। उन्होंने इसे “आसन्न वित्तीय पतन” कहा है।
यह सुनने में अजीब लगता है। जिस संस्था को दुनिया के सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली देशों का समर्थन मिला हो, वह पैसे की कमी से कैसे लड़खड़ा सकती है? पर असलियत यही है। यूएन का इंजन “भाषणों” से नहीं, योगदान से चलता है। हर देश को यूएन के नियमित बजट में अपना हिस्सा देना होता है। वही पैसे कर्मचारियों की तनख्वाह, कार्यालयों का खर्च, रिपोर्टिंग सिस्टम, और दुनिया भर में चलने वाले जरूरी कार्यक्रमों को चलाते हैं।
अब समस्या यह है कि कई देशों ने अपना हिस्सा पूरा नहीं दिया या समय पर नहीं दिया। नतीजा यह हुआ कि 2025 के अंत तक यूएन के पास 1.568 अरब डॉलर का बकाया जमा हो गया। यह आंकड़ा पिछले साल के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा है और जब बकाया बढ़ता है, तो यूएन के पास कैश रिजर्व भी तेजी से खत्म होने लगता है। अब स्थिति यह है कि 2026 के लिए मंजूर किया गया 3.45 अरब डॉलर का नियमित बजट कागजों में तो है, लेकिन उसे चलाने के लिए पैसा कम पड़ रहा है।
इस कहानी का सबसे बड़ा मोड़ वहाँ आता है जहाँ दुनिया का सबसे बड़ा योगदानकर्ता देश-अमेरिका खुद सबसे बड़ा बकायेदार बनकर खड़ा है। यूएन अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका पर नियमित बजट में 2.196 अरब डॉलर बकाया हैं। इसमें से 767 मिलियन डॉलर वर्तमान और पिछले वर्षों के हैं। इसके अलावा शांति मिशन वाले बजट में भी अमेरिका पर 1.8 अरब डॉलर का बकाया बताया गया है। वहीं वेनेजुएला जैसे देश भी योगदान देने में पीछे हैं।
गुटेरेस ने केवल देशों की देरी पर बात नहीं की। उन्होंने यूएन के पुराने वित्तीय नियमों को भी इस संकट की जड़ बताया। एक नियम ऐसा है जो यूएन को कहता है कि अगर बजट में कुछ पैसा बच जाए, तो उसे सदस्य देशों को वापस करना होगा- भले ही वह पैसा यूएन को मिला ही न हो। गुटेरेस ने दो टूक कहा- “हम ऐसे पैसे वापस नहीं कर सकते जो हमें मिले ही नहीं।”
इस वित्तीय संकट का असर सिर्फ न्यूयॉर्क की इमारत तक सीमित नहीं रहेगा। अगर यूएन की गतिविधियाँ बाधित होती हैं, तो इसका असर सूडान जैसे संघर्षग्रस्त क्षेत्रों, शरणार्थी कैंपों, राहत अभियानों, और विकास योजनाओं पर पड़ेगा। यानी जिन लोगों के लिए यूएन आखिरी उम्मीद होता है, उनकी मदद सबसे पहले धीमी पड़ सकती है।
अब दुनिया के सामने एक सवाल है- क्या देश समय रहते अपना हिस्सा देंगे या फिर यूएन को अपने सिस्टम में बड़े बदलाव करने पड़ेंगे? गुटेरेस की चेतावनी साफ है- यह केवल पैसे की कहानी नहीं, यह दुनिया की जिम्मेदारी की कहानी है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



