धर्मांतरण विरोधी कानूनों को कोर्ट में चुनौती

देश में धर्मांतरण विरोधी कानूनों को लेकर चल रही बहस अब एक बड़े संवैधानिक मोड़ पर पहुंच गई है। नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया (एनसीसीआई) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए 12 राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चुनौती दी है। इस याचिका ने न केवल धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा फिर से केंद्र में ला दिया है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा किया है कि क्या राज्य सरकारें वयस्क नागरिकों के निजी धार्मिक फैसलों पर इस तरह नियंत्रण रख सकती हैं। एनसीसीआई की याचिका में कहा गया है कि ये कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। संगठन का तर्क है कि कई राज्यों में लागू कानूनों की भाषा और परिभाषाएं इतनी व्यापक और अस्पष्ट हैं कि किसी भी सामान्य धार्मिक गतिविधि- जैसे प्रार्थना, धार्मिक चर्चा या सेवा कार्य-को भी “प्रलोभन” या “प्रभाव” की श्रेणी में डालकर कार्रवाई की जा सकती है। इससे कानून लागू करने वाली एजेंसियों को मनमानी की गुंजाइश मिल जाती है।
याचिका में जिन राज्यों के कानूनों को चुनौती दी गई है, उनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, कर्नाटक, हरियाणा और राजस्थान शामिल हैं। एनसीसीआई का कहना है कि इन कानूनों के चलते कई जगहों पर अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर ईसाई समुदाय से जुड़े लोगों को अनावश्यक जांच, एफआईआर और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। संगठन ने कोर्ट से यह भी मांग की है कि इन कानूनों के क्रियान्वयन पर सुनवाई के दौरान रोक लगाई जाए, क्योंकि इनके दुरुपयोग की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और 12 राज्यों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि यह मामला अन्य समान लंबित याचिकाओं के साथ जोड़कर सुना जाएगा और आगे इसे तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष विस्तृत सुनवाई के लिए रखा जा सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कोर्ट इस विषय को केवल प्रशासनिक विवाद नहीं बल्कि गंभीर संवैधानिक प्रश्न मान रहा है। इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न यही है-क्या धर्मांतरण विरोधी कानून “जबरन, धोखे या लालच से धर्म परिवर्तन” रोकने के नाम पर नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों पर जरूरत से ज्यादा अंकुश लगा रहे हैं? समर्थक पक्ष का तर्क है कि ऐसे कानून समाज में जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए जरूरी हैं, जबकि विराधी पक्ष कहता है कि कानूनों की अस्पष्टता और कठोर प्रावधानों के कारण वे “नियंत्रण” और “दमन” का माध्यम बन सकते हैं। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर हैं। यदि अदालत इन कानूनों की संवैधानिक समीक्षा में कोई बड़ी टिप्पणी या दिशा-निर्देश देती है, तो यह फैसला देश में धार्मिक स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और राज्य की शक्तियों के संतुलन को नई परिभाषा दे सकता है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



