उत्तर प्रदेशदेश

किसानों को मिले योजनाओं का लाभ

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार चाहती है कि किसानों को योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ मिले लेकिन कुछ अड़चने दूर करना जरूरी है। प्रदेश के खेतों में सिंचाई आज भी बड़ी हद तक निजी नलकूपों पर निर्भर है। धान, गेहूँ, गन्ना या सब्जी-हर फसल के पीछे पानी की वही मोटर चलती है, जो किसान की जेब और उसकी मेहनत दोनों से जुड़ी होती है। राज्य सरकार की नलकूपों के लिए मुफ्त बिजली योजना को किसानों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा गया था, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि बड़ी संख्या में किसान इस सुविधा से अब भी बाहर हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार प्रदेश में निजी नलकूपों के लाखों बिजली कनेक्शन हैं, लेकिन इनमें से बड़ी संख्या ऐसे किसानों की है जो मुफ्त बिजली योजना का लाभ नहीं ले पा रहे। इसकी सबसे बड़ी वजह है पुराने बिजली बिलों का बकाया। वर्षों से जमा यह बकाया राशि किसानों के लिए एक ऐसी दीवार बन गई है, जिसे पार किए बिना वे योजना में पंजीकरण नहीं करा सकते।
ग्रामीण इलाकों में किसान बताते हैं कि बिजली बिल का बकाया कोई एक बार की समस्या नहीं है। कई जगह मीटर से जुड़ी गड़बड़ियाँ, अनियमित रीडिंग और समय पर बिल न मिलने जैसी परेशानियाँ वर्षों से चली आ रही हैं। धीरे-धीरे यह रकम इतनी बढ़ गई कि अब एकमुश्त भुगतान कर पाना छोटे और सीमांत किसानों के लिए लगभग असंभव हो गया है। ऐसे में मुफ्त बिजली की योजना एक उम्मीद तो जगाती है, लेकिन उसकी शर्तें उसी उम्मीद को तोड़ भी देती हैं।बिजली विभाग का कहना है कि बकाया भुगतान के बिना योजना को पूरी तरह लागू करना व्यावहारिक नहीं है। विभाग के अनुसार यदि बिना शर्त मुफ्त बिजली दी गई, तो व्यवस्था पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा। दूसरी ओर किसान संगठनों का तर्क है कि खेती पहले से ही घाटे का सौदा बनती जा रही हैकृमहंगे बीज, खाद, सिंचाई और अन्य खर्चों के बीच बिजली का बढ़ता बोझ किसान कैसे उठाए?राज्य सरकार ने बकाया बिलों को लेकर राहत योजनाएँ और किश्तों में भुगतान की सुविधा देने की बात कही है, लेकिन जानकारी के अभाव और जटिल प्रक्रियाओं के कारण इसका लाभ सीमित किसानों तक ही पहुँच पा रहा है। गाँवों में आज भी कई किसान ऐसे हैं जिन्हें ठीक से पता ही नहीं कि पंजीकरण कैसे करना है या किन शर्तों को पूरा करना जरूरी है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर और तकनीकी औपचारिकताएँ उनकी परेशानी और बढ़ा देती हैं।इस समस्या का असर केवल बिजली तक सीमित नहीं है। सिंचाई महंगी होने का सीधा अर्थ है खेती की लागत बढ़ना और मुनाफा घट जाना। जब किसान समय पर पानी नहीं दे पाता, तो फसल प्रभावित होती है और अंततः उसकी आमदनी पर असर पड़ता है। यही कारण है कि मुफ्त बिजली जैसी योजनाएँ कागज पर जितनी प्रभावशाली दिखती हैं, जमीन पर उतनी ही अधूरी लगती हैं।
असल सवाल यह नहीं है कि योजना है या नहीं, बल्कि यह है कि वह किस तक पहुँच रही है। जब तक बकाया बिजली बिलों की समस्या का व्यावहारिक और मानवीय समाधान नहीं निकाला जाता, तब तक लाखों किसान इस राहत से वंचित रहेंगे।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button