अध्यात्म

नवरात्र के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा

हमारा भारतीय नया साल, जिसे हम हिन्दू वर्ष भी कहते हैं, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है। इसी दिन से वासंतिक नवरात्र अथवा चैत्र नवरात्र भी प्रारम्भ होते हैं। वसंत का मौसम हर्ष और उल्लास से भरा रहता है और उत्सवप्रिय भारतीयों ने इसीलिए बहुत सोच-’समझकर इस तिथि से वर्ष का प्रारम्भ किया था। नवरात्र के नौवें दिन राम नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम ने जन्म लिया था। नौ दिनों तक आदिशक्ति के नौ रूपों की उपासना की जाती है। सबसे पहले माता शैलपुत्री का पूजन होता है। उससे पहले कलश स्थापना की जाती है। नवरात्र मंे खान-पान का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। यह धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक रूप से भी अच्छा रहता है। इस समय शीतकाल का समापन और ग्रीष्मकाल के प्रारम्भ होने से शरीर की पाचनक्रिया पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए व्रत-उपवास का प्रावधान किया गया है। इसी दिन से नव संवत्सर प्रारम्भ होता है। इस
बार रौद्र नाम से संवत्सर 2083 जाना जाएगा।
इस साल 19 मार्च से चैत्र नवरात्र की शुरुआत होने जा रही है, जिसका समापन 27 मार्च को राम नवमी के पर्व के साथ हो जाएगा। नवरात्र के दिनों में माता दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। उनको भोग लगाया जाता है। साथ ही उपवास रखा जाता है। नवरात्र के पहले दिन माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। मां शैलपुत्री के पूजन से जीवन में स्थिरता और दृढ़ता आती है। पारिवारिक स्थिति, दांपत्य जीवन, कष्ट क्लेश और बीमारियां दूर होती हैं।
मां शैलपुत्री नंदी नाम के वृषभ यानी बैल पर सवार होती हैं. माता के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प होता है. मां शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की बेटी हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। देवी भागवत पुराण के अनुसार, एक बार प्रजापति दक्ष ने अपने यहां एक विशाल यज्ञ आयोजित किया। इस यज्ञ में उन्होंने समस्त देवी-देवताओं को बुलाया, लेकिन भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को आमंत्रण नहीं भेजा। इस पर भी देवी सती ने यज्ञ में जाने की बात कही तो भगवान शिव ने देवी को यज्ञ में जाने से मना कर दिया, लेकिन माता नहीं मानीं और वे समारोह में चली गईं. यज्ञ में प्रजापति दक्ष ने देवी पार्वती और भगवान शिव का खूब अपमान किया। यह देश कर माता सती बहुत क्रोधित हुईं। भगवान शिव के अपमान से माता को बहुत दुख हुआ और उन्होंने यज्ञ की वेदी में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद सती ने पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लिया और माता का नाम शैलपुत्री पड़ा। इसके बाद माता ने भगवान शिव को पाने के लिए घोर तपस्या की। माता के तप से प्रसन्न हो कर महादेव पार्वती को पति रूप में मिले। नवरात्र में सबसे पहले इसीलिए माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है।
वासंतिक नवरात्र (चैत्र नवरात्र) हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष (मार्च-अप्रैल) में मनाई जाती है, जो नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा और उपासना का पावन पर्व है। वर्ष 2026 में यह 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक चलेगी, जिसमें कलश स्थापना के साथ घर-घर में मां दुर्गा का आवाहन और दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। यह हिंदू नव वर्ष की शुरुआत का भी प्रतीक है। वासंतिक नवरात्र महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उगादी और कश्मीर में नवरेह के रूप में भी मनाई जाती है। यह त्योहार नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
नवरात्र की शुरुआत (प्रतिपदा)- 19 मार्च 2026, गुरुवार को और समापन (राम नवमी)- 27 मार्च 2026, शुक्रवार होगी।
कलश स्थापना मुहूर्त (19 मार्च)- सुबह 06.52 से 07.43 तक या दोपहर में अभिजित मुहूर्त 12.05 से 12.53 तक
इस समय वसंत ऋतु होती है और इसी से विक्रम संवत के नए साल की शुरुआत होती है। नवरात्र के नौ दिन में माँ के स्वरूप माँ शैलपुत्री पूजा, माँ ब्रह्मचारिणी, माँ चंद्रघंटा, माँ कूष्मांडा, माँ स्कंदमाता, माँ कात्यायनी, माँ कालरात्रि, माँ महागौरी और माँ सिद्धिदात्री आवाहन व पूजन होगा।
पहले दिन सुबह स्नान के बाद कलश स्थापना (घटस्थापना) करें, जौ बोएं और अखंड ज्योत जलाएं। इन नौ दिनों में सात्विक भोजन करें, प्याज-लहसुन का त्याग करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें। प्रतिदिन सुबह-शाम दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ और माँ की आरती करें। मां दुर्गा को फल, मिश्री, हलवा, नारियल और पान का भोग लगाएं।
ज्योतिषियों के अनुसार वासंतिक नवरात्र (चैत्र नवरात्र) शुभ ग्रहों के योग के चलते महत्वपूर्ण है। मीन लग्न में चतुर्ग्रही योग बनने और शुक्र के अपनी उच्च राशि में होने के कारण यह विशेष फलदायी हो रहा है। नौ दिनों में कई शुभ संयोग बनेंगे। इस वर्ष 19 मार्च दिन बृहस्पतिवार को वासंतिक नवरात्र ग्रह नक्षत्रों के विशेष संचरण के कारण शुभ फलदाई होगा। मीन लग्न में सूर्य, शुक्र, शनि एवं चंद्रमा की युति से चतुर्ग्रही योग के साथ वासंतिक नवरात्र का आरंभ हो रहा है। शुक्र अपनी उच्च राशि में रहेंगे, जिससे मां दुर्गा की पूजा अर्चना का विशेष फल प्राप्त होगा। मीन लग्न के अधिपति देव गुरु बृहस्पति हैं जो धर्म, अध्यात्म, भाग्य व धन के कारक माने जाते हैं। इस तरह देवगुरु की कृपा से इस वर्ष का नवरात्र विशेष लाभ देने वाला होगा। नवरात्र नौ दिनों का होगा और इन नौ दिनों में कई शुभ संयोग बनेंगे। इस बार 20 को सर्वार्थ अमृत सिद्ध योग, 21 को शनि रिक्ता समायोग, 22 को रवि योग, 23 को सर्वार्थ सिद्धि योग, 24 को द्विपुष्कर योग, 25 को बुधे भद्रा सिद्ध योग, 26 और 27 मार्च को सर्वार्थ सिद्ध योग प्राप्त होगा। 25 से 27 मार्च के मध्य मिथुन राशि में चंद्रमा और गुरु की युति के कारण गजकेसरी योग का निर्माण हो रहा है, जो मां के पूजन के लिए विशेष फलदायी होगा। देवी को प्रसन्न करने के लिए नवरात्र के नौ दिनों में लोभ, क्रोध, मोह, काम-वासना से दूर रहते हुए केवल देवी का ही ध्यान करना चाहिए। भक्त दुर्गा चालीसा व देवी के 32 नाम का पाठ और भगवती की आरती करने से भी लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस दौरान व्रत रखने के साथ कई नियमों का पालन किया जाता है। नवरात्रि के व्रत में खान पान को लेकर कई नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से व्रत और पूजा का पूर्ण फल मिलता है।
हिन्दू धर्म में नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की उपासना और साधना का विशेष समय माना जाता है। इन नौ दिनों में कई श्रद्धालु व्रत रखते हैं और खान-पान में विशेष सावधानी बरतते हैं। मान्यता है कि इस दौरान सात्विक और हल्का भोजन करने से मन और शरीर दोनों शुद्ध रहते हैं, जिससे पूजा-पाठ, ध्यान और मंत्र जप में मन अधिक लग पाता है। इसलिए नवरात्र के व्रत में
कुछ चीजों का सेवन किया जाता है, जबकि कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज किया जाता है। प्याज और लहसुन, सामान्य नमक, मांसाहारी भोजन, शराब और नशीले पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए।(मोहिता-हिफी फीचर)

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