उच्च शिक्षा में बदलाव का प्रयास

देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है। प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक को लेकर संसद की संयुक्त संसदीय समिति सक्रिय हो गई है और इसी सप्ताह इसकी अहम बैठकों में कई बड़े नियामक संस्थानों से चर्चा होने जा रही है। यह विधेयक न केवल मौजूदा ढांचे को बदलने की बात करता है, बल्कि शिक्षा के नियमन, गुणवत्ता और मानकों को एक नई संरचना में ढालने का प्रस्ताव भी रखता है। समिति की अध्यक्ष डी. पुरंदेश्वरी के नेतृत्व में 31 सदस्यीय यह समिति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद के प्रतिनिधियों के साथ संवाद करेगी। इन बैठकों में शिक्षा मंत्रालय और कानून एवं न्याय मंत्रालय के अधिकारी भी मौजूद रहेंगे। दरअसल, इस विधेयक का सबसे बड़ा प्रस्ताव यही है कि इन तीनों प्रमुख संस्थानों को समाप्त कर एक एकल नियामक संस्था-विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान का गठन किया जाए।
इस नई व्यवस्था में नियमन (विनियमन), गुणवत्ता (प्रत्यायन) और मानक निर्धारण (शैक्षणिक मानक) के लिए अलग-अलग परिषदें बनाई जाएंगी, जबकि यह सब एक छतरी संगठन के तहत काम करेंगी। इसका उद्देश्य व्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाना बताया जा रहा है। हालांकि, इस बदलाव के बीच मौजूदा संस्थाओं की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। उदाहरण के लिए, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पिछले वर्ष अप्रैल से पूर्णकालिक अध्यक्ष के बिना काम कर रहा है, जब एम. जगदीश कुमार सेवानिवृत्त हुए थे। फिलहाल विनीत जोशी अतिरिक्त प्रभार के रूप में यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यह स्थिति भी दर्शाती है कि उच्च शिक्षा नियमन में सुधार की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है।
विधेयक का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें अनुदान वितरण की जिम्मेदारी को नियामक संस्था से अलग करने का प्रस्ताव है। यानी विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान केवल नियमन और मानक तय करेगा, जबकि फंडिंग के लिए अलग तंत्र विकसित किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे हितों के टकराव को कम किया जा सकेगा। हालांकि, इस प्रस्ताव पर राजनीतिक मतभेद भी साफ दिखाई दे रहे हैं। विपक्षी दलों ने इसे “कार्यपालिका का अतिक्रमण” बताते हुए चिंता जताई है। उनका तर्क है कि इससे शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है, सख्त नियमों के जरिए नियंत्रण बढ़ सकता है और यहां तक कि संस्थानों को बंद करने तक की शक्तियां दी जा सकती हैं। साथ ही, संघीय ढांचे पर भी इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
वहीं सरकार का पक्ष है कि यह विधेयक व्यापक विचार-विमर्श के बाद
लाया गया है और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप है। अधिकारियों के
अनुसार, इसे लाने से पहले कई मंत्रालयों और विभागों से परामर्श किया गया था। स्पष्ट है कि यह विधेयक केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था की दिशा तय करने वाला कदम हो सकता है। अब सबकी निगाहें संयुक्त संसदीय समिति की बैठकों और उनकी सिफारिशों पर टिकी हैं, जो तय करेंगी कि यह प्रस्तावित बदलाव कितना संतुलित और प्रभावी साबित होगा।(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



