(भाग-2) दुनिया का सबसे अनमोल रत्न

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक लम्बी संधर्व गाथा है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों ने अपने-अपने स्तर पर आज़ादी की इस मशाल को जलाए रखने का काम किया। स्वाधीनता आंदोलन की शुरुआत बंगाल से शुरू होकर पूरे देश में फैली जिसने आगे चलकर एक सशक्त मुखर क्रांति का स्वरूप ग्रहण किया। यह आंदोलन एक निरन्तर होने वाले वैचारिक विकास के रूप में जाना गया। इस दौरान जो साहित्य रचा गया जो कविताएं लिखीं गईं वे सभी शिल्प और संवेदना दोनों के स्तर पर उच्चकोटि की थीं। यह सच है कि देश की आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हमारे देश में तत्कालीन प्रबुद्ध कलमकारों ने अपने उत्पीड़न की परवाह न करते हुए जन मानस को सचेत करने, उनमें आततायी विदेशी शासन के कारनामों की पोल खोलने तथा लोगों में जन जागृति की भावना विकसित करने के लिए अपनी लेखनी का अच्छा उपयोग किया था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जो सामाजिक साहित्य उस समय रचा गया वह सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था, क्योंकि उन्हें डर था कि लोग बहुत तेजी से उनके विरुद्ध उठ खड़े हों सकते हैं। ये सभी रचनाएं हमारे अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं। इस प्रतिबन्धित साहित्य से नई पीढ़ी का परिचय कराना भी हमारा नैतिक दायित्व है जिसकी शुरुआत हम जल्दी ही करेंगे। जिसके प्रथम चरण में हम प्रेमचंद की पुस्तक ‘सोज़े वतन’ से ही दूसरी कहानी यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।
दिलफिगार ने आशा और भय की एक विचित्र मनःस्थिति में वह बूँद पेश की और उसकी सारी कैफियत बहुत पुरजोर लफ्जों में बयान की। दिलफरेब ने पूरी कहानी बहुत गौर से सुनी और वह भेंट हाथ में लेकर जरा देर तक गौर करने के बाद बोली-
“दिलफिगार, बेशक तूने दुनिया की एक बेशकीमत चीज ढूँढ़ निकाली। तेरी हिम्मत और तेरी सूझ-बूझ की दाद देती हूँ। मगर यह दुनिया की सबसे बेशकीमत चीज नहीं। इसलिए तू यहाँ से जा और फिर कोशिश कर। शायद अबकी तेरे हाथ वह मोती लगे और तेरी किस्मत में मेरी गुलामी लिखी हो। जैसा कि मैंने पहले ही बता दिया था, मैं तुझे फाँसी पर चढ़वा सकती हूँ, मगर मैं तेरी जाँ-बख्शी करती हूँ, इसलिए कि तुझमें वह गुण मौजूद हैं, जो मैं अपने प्रेमी में देखना चाहती हूँ और मुझे यकीन है कि तू जरूर कभी-न-कभी कामयाब होगा।
नाकाम और नामुराद दिलफिगार इस माशूकाना इनायत से जरा दिलेर होकर बोला-
“ऐ दिल की रानी! बड़ी मुद्दत के बाद तेरी ड्योढ़ी पर सजदा करना नसीब होता है। फिर खुदा जाने ऐसे दिन कब आएँगे। क्या तू अपने जान देने वाले आशिक के बुरे हाल पर तरस न खाएगी? और क्या अपने रूप की एक झलक दिखाकर इस जलते हुए दिलफिगार को आने वाली सख्तियों को झेलने की ताकत न देगी? तेरी एक मस्त निगाह के नशे से चूर होकर मैं वह कर सकता हूँ, जो आज तक किसी से न बन पड़ा हो।”
दिलफरेब आशिक की यह चाव-भरी बातें सुनकर गुस्सा हो गयी और हुक्म दिया कि इस दीवाने को खड़े-खड़े दरबार से निकाल दो। चोबदार ने फौरन गरीब दिलफिगार को धक्के देकर यार के कूचे से बाहर निकाल दिया।
कुछ देर तक तो दिलफिगार अपनी निष्ठुर प्रेमिका की इस कठोरता पर आँसू बहाता रहा, और सोचने लगा कि अब कहाँ जाऊँ। मुसीबतों के रास्ते नापने और जंगलों में भटकने के बाद आँसू की यह बूँद मिली थी, अब ऐसी कौन-सी चीज है जिसकी कीमत इस आबदार मोती से ज्यादा हो। हजरत खिज! तुमने सिकंदर को आबे-हयात के कुएँ का रास्ता दिखाया था, क्या मेरी बाँह न पकड़ोगे? सिकंदर सारी दुनिया का मालिक था। मैं तो एक बेकार मुसाफिर हूँ। तुमने कितनी ही डूबती कश्तियाँ किनारे लगायी हैं, मुझे गरीब का बेड़ा भी पार करो। ऐ अलीमुल्क जिन्दगी! कुछ तुम्हीं इस नौजवान दुखी आशिक पर तरस खाओ। तुम खुदा के एक खास दरबारी हो, क्या मेरी मुश्किल आसान न करोगे?
गरज यह कि दिलफिगार ने बहुत फरियाद मचायी मगर उसका हाथ पकड़ने के लिए कोई सामने न आया। आखिर निराश होकर वह पागलों की तरह दुबारा एक तरफ को चल खड़ा हुआ।
दिलफिगार ने पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक कितने ही जंगलों और वीरानों की खाक छानी, कभी बर्फिस्तानी चोटियों पर सोया, कभी डरावनी घाटियों में भटकता फिरा, मगर जिस चीज की धुन थी वह न मिली, यहाँ तक कि उसका शरीर हड्डियों का एक ढाँचा रह गया।
एक रोज वह शाम के वक्त किसी नदी के किनारे खस्ताहाल पड़ा हुआ था। बेखुदी के नशे से चैंका तो क्या देखता है कि चंदन की एक चिता बनी हुई है और उस पर एक युवती सुहाग के जोड़े पहने सोलहों श्रृंगार किये बैठी हुई है। उसकी जाँघ पर उसके प्यारे पति का सिर है। हजारों आदमी गोल बाँधे खड़े हैं और फूलों की वर्षा कर रहे हैं।
यकायक चिता में से खुद-ब-खुद एक लपट उठी। सती का चेहरा उस वक्त एक पवित्र भाव से आलोकित हो रहा था। चिता की पवित्र लपटें उसके गले से लिपट गयीं और दम-के-दम में वह फूल-सा शरीर राख का ढेर हो गया। प्रेमिका ने अपने को प्रेम पर न्योछावर कर दिया और दो प्रेमियों के सच्चे, पवित्र, अमर प्रेम की अंतिम लीला आँखों से ओझल हो गयी।
जब सब लोग अपने घरों को लौटे तो दिलफिगार चुपके से उठा और अपने चाक-दामन कुरते में यह राख का ढेर समेट लिया और इस मुट्ठीभर राख को दुनिया की सबसे अनमोल चीज समझता हुआ सफलता के नशे में चूर यार के कूचे की तरफ चला। अबकी ज्यों-ज्यों वह अपनी मंजिल के करीब आता था, उसकी हिम्मत बढ़ती जाती थी। कोई उसके दिल में बैठा हुआ कह रहा था-
“अबकी तेरी जीत है।”
और इस खयाल ने उसके दिल को जो-जो सपने दिखाये, उनकी चर्चा व्यर्थ है।
आखिरकार वह शहर मीनोसवाद में दाखिल हुआ और दिलफरेब की ऊँची ड्योढ़ी पर जाकर खबर दी कि दिलफिगार सुरखरू होकर लौटा है और हुजूर के सामने आना चाहता है। दिलफरेब ने जाँबाज आशिक को फौरन दरबार में बुलाया और उस चीज के लिए, जो दुनिया की सबसे बेशकीमत चीज थी, हाथ फैला दिया। दिलफिगार ने हिम्मत करके उसकी चाँदी जैसी कलाई को चूम लिया और मुट्ठी भर राख को उसकी हथेली में रखकर सारी कैफियत दिल को पिघला देने वाले लफ्जों में कह सुनायी और अपनी सुन्दर प्रेमिका के होंठों से अपनी किस्मत का मुबारक फैसला सुनने के लिए इंतजार करने लगा।
दिलफरेब ने उस मुट्ठीभर राख को आँखों से लगा लिया और कुछ देर तक विचारों के सागर में डूबी रहने के बाद बोली-
“ऐ जान निछावर करने वाले आशिक दिलफिगार ”दिलफरेब बोली,
“बेशक यह राख जो तू लाया है, जिसमें लोहे को सोना कर देने की सिफत है, दुनिया की बड़ी बेशकीमती चीज है और मैं सच्चे दिल से तेरी एहसानमंद हूँ कि तूने ऐसी अनमोल भेंट मुझे दी। मगर दुनिया में इससे भी ज्यादा अनमोल कोई चीज है, जा उसे तलाश कर और तब मेरे पास आ। मैं तहेदिल से दुआ करती हूँ कि खुदा तुझे कामयाब करे।”
यह कहकर वह सुनहरे पर्दे से बाहर आयी और माशूकाना अदा से अपने रूप का जलवा दिखाकर फिर नजरों से ओझल हो गयी। एक बिजली थी कि कौंधी और फिर बादलों के पर्दे में छिप गयी। अभी दिलफिगार के होश-हवास ठिकाने पर न आने पाये थे कि चोबदार ने मुलायमियत से उसका हाथ पकड़कर यार के कूचे से उसको निकाल दिया और फिर तीसरी बार वह प्रेम का पुजारी निराशा के अथाह समुद्र में गोते खाने लगा।
दिलफिगार का हियाव छूट गया। उसे यकीन हो गया कि मैं दुनिया में इसी तरह नाशाद और नामुराद मर जाने के लिए पैदा किया गया था और अब इसके सिवा और कोई चारा नहीं कि किसी पहाड़ पर चढ़कर नीचे कूद पड़ूँ ताकि माशूक के जुल्मों की फरियाद करने के लिए एक हड्डी भी बाकी न रहे। वह दीवाने की तरह उठा और गिरता-पड़ता एक गगनचुंबी पहाड़ की चोटी पर जा पहुँचा। किसी और समय वह ऐसे ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने का साहस न कर सकता था, मगर इस वक्त जान देने के जोश में उसे वह पहाड़ एक
मामूली टेकरी से ज्यादा ऊँचा न नजर आया। करीब था कि वह नीचे कूद पड़े कि हरे-हरे कपड़े पहने हुए और
हरा अमामा बाँधे एक बुजुर्ग एक हाथ में तस्बीह और दूसरे हाथ में लाठी लिये बरामद हुए और हिम्मत बढ़ाने वाले स्वर में बोले- -क्रमशः
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