चोर तो चोर, पढ़े-लिखे महाचोर

इस शीर्षक को देखकर कुछ लोग चैंकेंगे। हमने कुछ शब्द का प्रयोग जानबूझकर किया है क्योंकि सफेद पोश अपराध के किस्से बहुत पहले से सुनने को मिल रहे हैं। फिर भी पढ़े-लिखे और सम्पन्न लोगों को सामान्य रूप से आदर की दृष्टि से देखा जाता है लेकिन गत दिनों (10 जुलाई) एक समाचार पढ़कर माथा ठनक गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक अर्थात 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाना चाहते हैं। हमारे देश में कृषि उत्पादन से लेकर अंतरिक्ष अभियान तक लगभग उतनी ही प्रगति कर ली है जितनी विकसित राष्ट्रों के पास है लेकिन हमारी मानसिकता में बहुत अंतर है। इसको समझने के लिए ही हम उस खबर का पहले उल्लेख कर रहे हैं जो बताती है कि हमारे देश में चोर तो चोर हैं ही, पढ़े-लिखे महाचोर हैं।
खबर यह है कि भारतीय रेलवे बोर्ड ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इसके तहत ट्रेन के एसी कोच में मिलने वाले तौलिए, कंबल, चादर और तकिया कवर की चोरी रोकी जा सकेगी। रेलवे बोर्ड बेडरोल मैनेजमेंट को पूरी तरह से उच्च तकनीक से लैस करेगा। इसके तहत कम्बल और चादरों के अंदर बहुत ही गोपनीय तरीके से बेहद सूक्ष्म रेडियो फ्रीक्वेंसी आईडेंटी फिकेशन और एफआईडी चिप लगाई जाएंगी। इससे चोरी के मामले रुक सकेंगे। रेलवे बोर्ड के अनुसार हर साल लाखों बेडरोल पार कर दिये जाते हैं। अब इस प्रकार की चोरी पर लगाम लग जाएगी। कंबल, चादर, तौलिए आदि में आरएफआईडी चिप लगाने के साथ ही ट्रेन और स्टेशन के निकास द्वारों पर अदृश्य सेंसर भी लगाए जाएंगे। इस प्रकार यदि कोई यात्री ट्रेन से कम्बल, चादर, बेडशीट या कवर-तौलिया चुराकर ले जाने की कोशिश करेगा तो दरवाजे का सेंसर तुरंत ही अलार्म बजा देगा और चोर पकड़ा जाएगा। रेलवे को इस पर ज्यादा खर्च भी नहीं करना पड़ेगा। बताया जा रहा है कि इस तकनीक को लागू करने का खर्च बहुत सीमित है। एक बेड रोल पर चिप लगाने की लागत सिर्फ 20 से 50 रुपये आएगी। वहीं प्रति कोच या स्टेशन पर लगभग 20 से 30 हजार का स्कैनर सिस्टम लगेगा। बहरहाल, रेलवे के हानि-लाभ के लेखे-जोखे पर बहस करने का हमारा मकसद नहीं है। हम यह कहना चाहते हैं कि ट्रेन में एसी कोच में सफर करने वाले अमीर और ज्यादातर पढ़े-लिखे लोग होते हैं। एसी कोच में चोरी करने वाले पढ़े-लिखे महाचोर हैं। ये लोग किसी अभाव में चोरी नहीं करते। ट्रेन के डिब्बों में लिखा होता है कि रेलवे आपकी सम्पत्ति है। इसका गलत अर्थ लगाते हैं। इस तरह की मानसिकता के रहते हम अपने देश को विकसित कैसे बना पाएंगे? इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या हो सकती है कि रेलवे बोर्ड को 10 रुपये की टावल में चिप लगवानी पड़ रही है ताकि 10 हजार का रेल किराया देने में सक्षम पढ़े-लिखे लोग चोरी न कर सकें। आश्चर्य इस बात पर भी होता है कि ऐसे लोग अपने घर में जाकर बड़ी शान से अपनी चोरी की कुशलता का बखान करते होंगे। इस प्रकार का बखान परिवार के बच्चों को भी गलत शिक्षा दे सकता है। बहरहाल इस प्रकार के पढ़े-लिखे चोर अपने बच्चें को यह भी बता दें कि अब रेलवे बोर्ड इस प्रकार के चोरों को पकड़ेगा और सजा भी देगा।
एसी कोच में इस प्रकार की चोरी के मामले पर बात करते हुए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कुछ नजारे याद आते हैं। लखनऊ में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने नयी पीढ़ी को महान नेताओं का स्मरण करने के लिए गोमती तट पर भव्य प्रेरणा स्थल बनवाया है। अभी वहां मैदान ही मैदान दिखता है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहार बाजपेयी, जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमाएं लगायी गयी हैं। इस प्रतिमाओं का जब अनावरण कराया गया तो वहां तरह-तरह के पौधों से सजे गमले रखे गये थे। इससे पूरा मैदान हरा-भरा लगता था लेकिन प्रतिमाओं के अनावरण के बाद कुछ दिनों में ही वहां से पौधे लगे गमले गायब हो गये। वहां सीसीटीवी से पता चला कि कई कार वाले गमले चोरी करके ले गये हैं। माना जा रहा है कि यह काम भी पढ़े-लिखे चोरों ने ही किया है। घर सजाने का शौक है लेकिन पौधे और गमले खरीद नहीं सकते। प्रेरणा स्थल से गमले और पौधे चोरी करने वाले सामान्य वर्ग के लोग नहीं हो सकते, यह निश्चित है। ऐसे लोग अफसर की कुर्सी पर बैठकर वहां से भी गमले ही नहीं कई चीजें चोरी करके घर लाते हैं। यह चोरी भी वे छिपकर नहीं करते बल्कि खुलेआम अपने ड्राइवर या किसी कर्मचारी के माध्यम से करते हैं।
सभी अधिकारियों में यह प्रवृत्ति नहीं होती है। इसलिए ईमानदार अफसरों को सलाम। वे ईमानदारी से काम करते रहें तो देश विकसित राष्ट्र बन सकता है लेकिन रिटायर्ड एआरटीओ ललित कुमार जैसे लोगों के रहते यह राह आसान नहीं होगी। ललित कुमार परिवहन विभाग में एआरटीओ के पद पर उत्तर प्रदेश में तैनात थे। सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (एआरटीओ) का पद बहुत बड़ी जनसेवा का होता है। ललित कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण संगठन ने आय से अधिक सम्पत्ति की जांच की थी। जांच अवधि के दौरान उनकी कुल आय 93.26 लाख रुपये थी और उन्होंने 1.61 करोड़ रुपये खर्च किये थे। इस प्रकार भ्रष्टाचार निवारण संगठन के अफसरों को संदेह हुआ क्योंकि ललित कुमार ने अपनी कुल घोषित आय से 68.66 लाख रुपये ज्यादा खर्च किये थे और किसी से कर्ज भी नहीं लिया। घोषित आय से 73.26 प्रतिशत अधिक खर्च करने का मतलब दाल में काला ही नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है। जांच एजेंसी का संदेह बढ़ा तो जांच विजिलेंस को सौंपी गयी। विजिलेंस की टीम ने ललित कुमार के लखनऊ में अलीगंज स्थित आवास पर छापा मारा।
छापे के दौरान उनके आवास से 13 किलो सोना और 20 करोड़ की सम्पत्ति बरामद हुई। विजिलेंस टीम ने दावा किया था कि 35 करोड़ की चल-अचल सम्पत्ति सामने आयी है। विजिलेंस की औचारिक सूचना के बाद आयकर विभाग ने भी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। स्वाभाविक है कि प्रथम दृष्टया यही लगता है कि पूर्व आरटीओ ने आयकर चोरी भी की है।
देश में एक ललित कुमार हो
तो भी देश को विकसित राष्ट्र बनाने
में बाधा नहीं आएगी लेकिन कई
ललित कुमार महाचोरी कर रहे हैं। इसके बावजूद हमें हताश नहीं होना चाहिए क्योंकि विनय कुमार लंगेह
जैसे अधिकारी भी हमारे देश में हैं जिन्होंने 1140 गांवों की तस्वीर बदल डाली।
छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी विनय कुमार लंगेह अपनी कार्यशैली और नवाचारों के कारण इन दिनों सुर्खियों में हैं। कोरिया से लेकर महासमुंद तक… जहां भी पोस्टिंग मिली वहां उन्होंने नई मिसाल पेश की. कभी सॉफ्टवेयर इंजीनियर रहे आईएएस विनय कुमार ने नौकरी छोड़कर यूपीएससी की कठिन राह चुनी और और कई असफलताओं के बाद 2015 में 477वीं रैंक हासिल कर आईएएस बने। बता दें कि छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कलेक्टर रहते हुए विनय कुमार लंगेह ने एक अनूठी मिसाल पेश की है, जिससे 551 ग्राम पंचायतों के 1140 से अधिक गांवों की तस्वीर बदल गई।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



