शांति की अपील, पाक को लेकर चिंता

भारत ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ऊर्जा अवसंरचना पर लगातार हो रहे हमलों के बीच शांति की अपील की है, वहीं पाक के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता भी जतायी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कतर, फ्रांस, जॉर्डन, ओमान और मलेशिया के शीर्ष नेताओं से फोन पर बातचीत कर क्षेत्र में शांति बहाली और तनाव कम करने की अपील की। यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते टकराव ने पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता को खतरे में डाल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सभी वार्तालापों में स्पष्ट रूप से कहा कि इस संकट का समाधान केवल संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने ऊर्जा अवसंरचना पर हो रहे हमलों की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएँ न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित करती हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी गंभीर असर डालती हैं। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं, के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। कतर के अमीर तमीम बिन हमद अल थानी के साथ बातचीत में मोदी ने भारत की ओर से समर्थन जताया और वहाँ रह रहे भारतीय समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आभार व्यक्त किया। जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय के साथ चर्चा में उन्होंने क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए साझा प्रयासों पर जोर दिया और संकट
के दौरान फंसे भारतीयों की
सुरक्षित वापसी में जॉर्डन की भूमिका की सराहना की।फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ बातचीत में दोनों नेताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि तनाव को कम करने
के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और निरंतर संवाद आवश्यक है। ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक के साथ वार्ता में भी शांति और स्थिरता को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया। वहीं मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ बातचीत में भी क्षेत्रीय हालात पर चिंता व्यक्त करते हुए कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता दोहराई।
इस पूरे संकट का एक अहम पहलू हॉर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट को जन्म दे सकती है। यही कारण है कि भारत ने सुरक्षित और निर्बाध नौवहन पर विशेष जोर दिया है।इसी बीच, हालात तब और गंभीर हो गए जब ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के तेल और गैस संयंत्रों पर हमले तेज कर दिए। यह कार्रवाई साउथ पार्स गैस क्षेत्र पर हुए हमले के जवाब में की गई, जो दुनिया के सबसे बड़े गैस भंडारों में से एक है। इस घटनाक्रम ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है। कुल मिलाकर, यह स्थिति केवल क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। ऐसे समय में भारत की संतुलित और संवाद-आधारित कूटनीति एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में उसकी भूमिका को और मजबूत करती है।
उधर, भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर गंभीर चिंता जताई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पाकिस्तान का गुप्त परमाणु प्रसार (क्लैंडेस्टाइन न्यूक्लियर प्रोलिफरेशन) का इतिहास वैश्विक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। यह बयान उस समय आया है जब अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने भी इसी तरह की आशंकाओं को दोहराया है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गैबार्ड द्वारा प्रस्तुत 2026 की वार्षिक खतरा आकलन रिपोर्ट में पाकिस्तान को उन देशों में शामिल किया गया है, जो अमेरिका के लिए संभावित परमाणु खतरा पैदा कर सकते हैं। इस सूची में रूस, चीन, उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देश भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये देश उन्नत मिसाइल प्रणालियों का विकास कर रहे हैं, जो परमाणु और पारंपरिक दोनों तरह के हथियार ले जाने में सक्षम हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस रिपोर्ट का समर्थन करते हुए कहा कि पाकिस्तान का पिछला रिकॉर्ड ही उसकी नीतियों पर सवाल खड़े करता है। रणधीर जायसवाल ने कहा कि इस तरह के बयान यह स्पष्ट करते हैं कि पाकिस्तान की गुप्त परमाणु गतिविधियाँ वैश्विक शांति के लिए खतरा हैं। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाता रहा है।यदि इतिहास पर नजर डालें, तो पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम 1970 के दशक में शुरू हुआ था। “प्रोजेक्ट-706” जैसे गुप्त कार्यक्रम के माध्यम से इसे आगे बढ़ाया गया। बाद में 1998 में पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण कर खुद को परमाणु शक्ति घोषित किया। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान ने न केवल अपने परमाणु कार्यक्रम को गुप्त रखा, बल्कि अतीत में तकनीक और ज्ञान के प्रसार को लेकर भी उस पर आरोप लगते रहे हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसके परमाणु इरादों को लेकर सतर्क रहता है। अमेरिकी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल तकनीक पर काम कर रहा है, जिसमें अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल विकसित करने की संभावना भी शामिल है। यदि ऐसा होता है, तो यह केवल दक्षिण एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा संतुलन को भी प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक तनाव रहा है। ऐसे में परमाणु हथियारों और मिसाइल तकनीक का विस्तार क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। कुल मिलाकर, यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि परमाणु हथियारों का प्रसार आज भी वैश्विक राजनीति का एक संवेदनशील और खतरनाक पहलू बना हुआ है। भारत का रुख स्पष्ट है। परमाणु प्रसार पर कड़ी निगरानी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए ही वैश्विक शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



