ब्रिटेन पर सीहोर के सेठ का कर्ज

15 अगस्त, 1947 को हमारा देश ब्रिटिश दासता से मुक्त हुआ था। कुछ ही दिन बाद हम देश की आजादी की 79वीं वर्षगांठ मनाएंगे। इस अवसर पर देश की आजादी के लिए मर-मिटने वाले ज्ञात-अज्ञात शहीदों को हम नमन करते हैं। क्रांतिकारियों के उस जज्बे को सलाम करते हैं जिसने बताया कि अन्याय और अत्याचार का विरोध हमें हर हाल मंे करना चाहिए। चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद विस्मिल और सरदार भगत सिंह की कुर्बानी का योगदान रहा, जिससे ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़कर जाना पड़ा। लाला लाजपत राय का आंदोलन और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का देश को आजाद कराने के लिए अपनी आजाद हिन्द सेना बनाना और ब्रिटिश सेना से मुकाबला करना आज की पीढ़ी को रोमांचित करता है। इसके साथ ही कुछ कहे-अनकहे किस्से भी हैं जो नई पीढ़ी को बताने चाहिए। ऐसा ही एक किस्सा मध्य प्रदेश के सीहोर से जुड़ा है। यहां कक सेठ जुम्मालाल रूठिया ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का कर्ज दिया था। सेठ जुम्मा लाल देश की आजादी का सूरज नहीं देख पाये। उनका निधन 1937 मंे हो गया था लेकिन ब्रिटिश सरकार को दिये गये कर्ज के कागजात उनके परिवार के पास मौजूद हैं। यह कर्ज चक्रवृद्धि ब्याज पर दिया गया था और मौजूदा समय मंे उसकी कीमत 10 करोड़ रुपये के लगभग हो गयी है। ब्रिटिश सरकार उस कर्ज को अदा करेगी। सेठ जुम्मालाल के परिजनों से इस संदर्भ मंे दस्तावेज मांगे गये हैं। ब्रिटिश सरकार क्रूर थी लेकिन उसकी ईमानदारी पर संदेह नहीं किया जा सकता।
साल 1917 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सीहोर के सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का वार लोन दिया था। लगभग 109 साल पुराने इस ऐतिहासिक कर्ज की देनदारी को लेकर यूके सरकार के डेप्ट मैनेजमेंट ऑफिस ने रूठिया परिवार से दस्तावेज मांगे हैं। ब्याज और महंगाई के हिसाब से आज इस कर्ज की कीमत 10 करोड़ रुपये बैठती है। बहरहाल वर्ष 1917 में सेना के खर्चों के लिए दिए गए इस कर्ज की देनदारी को लेकर ब्रिटेन सरकार ने सकारात्मक रुख अपनाया है और परिवार से मामले से जुड़े तमाम जरूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है।
नगर सेठ जुम्मा लाल रूठिया के पोते विनय रूठिया और उनके भाई विवेक रूठिया को घर के पुराने कागजात खंगालने के दौरान 109 साल पुरानी इस लिखा-पढ़ी के मूल दस्तावेज मिले थे। इसके बाद परिवार ने अपने अधिवक्ता श्रीयांश रानीवाल के माध्यम से ब्रिटेन सरकार के ‘डेप्ट मैनेजमेंट ऑफिस’ को लीगल नोटिस भेजा था। इस नोटिस के औपचारिक जवाब में यूके सरकार ने मामले को खारिज करने के बजाय आगे की जांच की बात कही है और दस्तावेजों को लंदन स्थित गिल्ट रजिस्ट्रार के सामने प्रस्तुत करने को कहा है। ताजा अपडेट ये है कि रूठिया परिवार ने संबंधित दस्तावेज इकट्ठा करके दिल्ली में अपने वकील रानीवाल को भेज दिए हैं। रानीवाल का कहना है कि जांच-पड़ताल के बाद वे एक हफ्ते में ये दस्तावेज ब्रिटिश सरकार को भेज देंगे।
रूठिया परिवार के अनुसार प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के समय वर्ष 1917 में पूरे भारत पर ब्रिटिश हुकूमत का शासन था। उस दौर में युद्ध के मोर्चे पर तैनात सेना के राशन, पानी, हथियारों और अन्य रसद संबंधी भारी-भरकम खर्चों को पूरा करने के लिए ब्रिटिश सरकार को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा था। इस आर्थिक दबाव से निपटने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने भोपाल रियासत और देश के प्रमुख रईसों व सेठों से फंड जुटाना शुरू किया था। इसी दौरान सीहोर के तत्कालीन रईस सेठ जुम्मा लाल रूठिया ने ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का वार लोन दिया था। सेठ जुम्मा लाल का निधन वर्ष 1937 में हो गया था, लेकिन इस ऐतिहासिक लेनदेन से जुड़े आधिकारिक कागजात उनके परिवार की वसीयत और घर की पुरानी तिजोरी में सुरक्षित रहे।
वर्ष 1917 के दौर में दिए गए 35 हजार रुपये की कीमत उस समय के सोने के भाव और आर्थिक मूल्य के हिसाब से अत्यंत विशाल थी। आज के समय में चक्रवृद्धि ब्याज दर और पिछले एक शतक की महंगाई दर के हिसाब से इसका आकलन किया जाए, तो यह राशि कई करोड़ों रुपये बैठती है। दस्तावेजों की वैधानिकता और सत्यता जांचने के बाद परिवार ने इसे कानूनी रूप से यूके सरकार के सामने उठाने का फैसला किया। रूठिया परिवार ने वकील श्रीयांश रानीवाल के जरिए ब्रिटेन सरकार के ‘डेप्ट मैनेजमेंट ऑफिस’ को ईमेल और हार्ड कॉपी के जरिए लीगल नोटिस भेजा। यूके सरकार की ओर से इस नोटिस का औपचारिक जवाब प्राप्त हो चुका है, जिसमें ब्रिटिश सरकार ने इस दावे को खारिज करने के बजाय मामले में आगे की जांच की बात स्वीकार की है।
अधिवक्ता और परिवार के सदस्य विनय रूठिया का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार कोई भी संप्रभु राष्ट्र या उसकी उत्तराधिकारी सरकार अपने पुराने, वैध और संविदात्मक वित्तीय कर्ज को चुकाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होती है। यूके सरकार से सकारात्मक पत्राचार मिलने के बाद रूठिया परिवार अब मांगे गए सभी आवश्यक दस्तावेज जल्द से जल्द लंदन भेजने की तैयारी कर रहा है, ताकि बकाया राशि की वसूली के लिए अगली वैधानिक प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाया जा सके।
एक मोटे अनुमान के मुताबिक साल 1917 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जारी इस वॉर लोन प्रमाण पत्र पर 5.5 फीसद सालाना ब्याज तय किया गया था। यदि 109 साल (1917 से 2026) के इस वक्त और 5.5 फीसद सालाना चक्रवृद्धि ब्याज के मानक वित्तीय फार्मूले से इसकी सटीक गणना की जाए, तो यह राशि आज के समय में लगभग 1.20 करोड़ रुपये बैठती है, बशर्ते इस दौरान ब्याज का कोई भुगतान न हुआ हो। वहीं दूसरी ओर, यदि इस राशि का मूल्यांकन 1917 के समय सोने के भाव और आज के भाव के तुलनात्मक अंतर से किया जाए क्योंकि 1917 से अब तक सोने की दरों में 3,000 गुना से भी अधिक का उछाल आया है तो इस पैमाने से 1917 के 35,000 रुपये का आज का अनुमानित आर्थिक मूल्य 10 करोड़ रुपये से अधिक आंका जा सकता है।हालांकि ये सिर्फ अनुमान है। वास्तविक आंकलन इससे अलग भी हो सकता है।
प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक चलने वाला एक वैश्विक संघर्ष था, जो मुख्य रूप से यूरोप, एशिया और अफ्रीका में लड़ा गया। इस महान युद्ध में दुनिया दो प्रमुख गुटों मित्र राष्ट्र (ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, अमेरिका आदि) और केंद्रीय शक्तियों (जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन साम्राज्य आदि) में बँट गई थी मित्र राष्ट्र में ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जापान, इटली (1915 से) और संयुक्त राज्य अमेरिका (1917 से) थे तो केंद्रीय शक्तियाँ जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन (उस्मानिया) साम्राज्य और बुल्गारिया थीं। इससे साम्राज्यों का पतन हुआ। रूस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन साम्राज्य का अंत हो गया। यूरोप और मध्य पूर्व में कई नए देशों (जैसे पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया) का उदय हुआ। वारसा संधि (1919) में जर्मनी को युद्ध के लिए दोषी ठहराया गया और भारी जुर्माना लगाया गया। राष्ट्र संघ की स्थापना हुई, भविष्य में ऐसे युद्धों को रोकने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनाई गई। लगभग 2 करोड़ लोग मारे गए और करोड़ों घायल हुए थे।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



