लेखक की कलम

पटेल के सामने नतमस्तक हुए निजाम

हम अपने देश की आजादी की 79वीं वर्षगांठ मनाते हुए अपूर्व गर्व और खुशी महसूस कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश मंे योगी आदित्यनाथ की सरकार एक सप्ताह पहले से तिरंगा यात्राएं निकाल रही है। ऐसी व्यवस्था है कि हर घर पर तिरंगा फहराए। इसी के साथ यह भी जरूरी है कि घर-घर आजादी के लिए मर-मिटने वालों और आजादी के बाद देश को एकजुट करने वालों की गाथा भी पहुंचाई जाए। देश को अंग्रेजों ने आजादी दे दी लेकिन पांच सौ से ज्यादा टुकड़ों में बांट दिया था। राजा-रजवाड़ों को भी उनकी जागीरें दे दी गयी थीं। इस खतरे को सबसे पहले पहचाना देश के गृहमंत्री सरदार पटेल ने। उन्होंने सभी रियासतों को देश मंे विलय होने का संदेश दिया। कई राजा खुशी-खुशी अखंड भारत का हिस्सा बन गये लेकिन हैदराबाद के निजाम उस समय बहुत ताकतवर थे। उन्होंने भारत मंे विलय करने से इनकार कर दिया लेकिन सरदार पटेल तो लौहपुरुष कहे ही जाते थे। उन्हांेने निजाम के महल को घिरवा दिया। फरवरी 1949 को जब सरदार पटेल अपने विमान से हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे पर पहुंचे तो मनबढ़ निजाम उस्मान अलीखान सिर झुकाए और हाथ जोड़े सरदार पटेल के स्वागत मंे खड़े थे। आज आजादी की वर्षगांठ मनाते समय हमें ऐसी गाथाएं अपने बच्चों का अवश्य सुनानी चाहिए।
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया था। बात उसी समय की है, भारत आजाद तो हो चुका था, लेकिन देश के ठीक सीने पर करीब 85 हजार वर्ग किलोमीटर में फैली हैदराबाद रियासत एक बहुत बड़ा कांटा बनी हुई थी। यह रियासत क्षेत्रफल में ब्रिटेन और स्कॉटलैंड से भी बड़ी थी और आबादी थी लगभग 1.6 करोड़। यहां के शासक थे निजाम उस्मान अली खान। साल 1937 में टाइम मैगजीन ने उन्हें दुनिया का सबसे अमीर इंसान घोषित किया था। निजाम की सनक का आलम यह था कि जिस 185 कैरट के बेशकीमती जैकब डायमंड को देखने के लिए दुनिया तरसती थी, उसे वे अपनी मेज पर पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करते थे। उन्हें 21 तोपों की सलामी मिलती थी, लेकिन खुद फटी शेरवानी पहनकर एक-एक पाई का हिसाब रखते थे।
आजादी के बाद हैदराबाद को भारत में शामिल होने का फैसला लेने के लिए तीन महीने का अतिरिक्त समय दिया गया था। लेकिन निजाम के इरादे कुछ और ही थे। नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में दर्ज इंटरव्यू में तत्कालीन गृह सचिव वी.पी. मेनन बताते हैं कि सरदार पटेल का शुरू से ही स्पष्ट मानना था, हैदराबाद भारत के दिल में बैठा एक ऐसा कैंसर है, जिसकी वफादारी देश की सीमाओं के बाहर है और जो हमारी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पटेल चाहते थे कि निजाम की सत्ता और उनके दबदबे का नामोनिशान मिटा दिया जाए लेकिन राह में कई रोड़े थे। प्रधानमंत्री नेहरू और लॉर्ड माउंटबेटन इसके खिलाफ थे। नेहरू को डर था कि हैदराबाद में सेना भेजने से कश्मीर के सैन्य ऑपरेशन पर बुरा असर पड़ेगा और देश में सांप्रदायिक तनाव फैलेगा। दोनों नेताओं के बीच मतभेद इतने बढ़ गए कि कैबिनेट बैठकों में जबरदस्त गर्मागर्मी होने लगी। जब नेहरू का रुख सख्त हुआ, तो सरदार पटेल बैठक से वॉकआउट कर गए। माहौल इतना गरमा गया था कि सरदार पटेल ने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाकर नेहरू को प्रधानमंत्री पद से हटाने तक का मन बना लिया था लेकिन चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की समझदारी और मध्यस्थता से मामला शांत हुआ। आखिरकार रक्षा समिति की बैठक में हैदराबाद पर सैन्य कार्रवाई का रास्ता साफ हुआ।
इस बीच, निजाम पर्दे के पीछे से भारत के खिलाफ खतरनाक शतरंज खेल रहे थे। उन्होंने चेकस्लोवाकिया से 30 लाख पाउंड के राइफल, मशीनगन और आधुनिक हथियार खरीदने की डील की। पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपये दिए और कराची में अपना ट्रेड एजेंट तैनात कर दिया। वे पुर्तगाल के साथ गोवा बंदरगाह के इस्तेमाल का समझौता करने और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन से हस्तक्षेप कराने की कोशिश में भी थे।
उधर, मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएम) का चरमपंथी नेता कासिम रिजवी दंभ भर रहा था कि ष्हैदराबाद कोई छोटा-मोटा जूनागढ़ नहीं है। सरदार पटेल ने उसे करारा जवाब देते हुए कहा था- अगर हैदराबाद वक्त रहते दीवार पर लिखी इबारत नहीं पढ़ता, तो उसे अंजाम भुगतना ही पड़ेगा। सितंबर 1948 में दो ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने इतिहास का रुख बदल दिया। 11 सितंबर को पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का निधन हो गया, यानी निजाम का सबसे बड़ा मददगार चला गया। वहीं गंगापुर स्टेशन पर रजाकारों ने ट्रेन यात्रियों पर हमला कर दिया, जिससे पूरे देश में जनाक्रोश फूट पड़ा।
सरदार पटेल ने अब और वक्त न गंवाने का फैसला किया। उन्होंने सेना प्रमुख जनरल के.एम. करियप्पा को बुलाया और सीधे शब्दों में पूछा- अगर हैदराबाद पर कार्रवाई के दौरान पाकिस्तान कोई हरकत करता है, तो क्या आप बिना किसी अतिरिक्त मदद के हालात संभाल लेंगे? करियप्पा का बिना किसी झिझक के एक शब्द में जवाब था- हां। जब ब्रिटिश सैन्य सलाहकारों ने चेताया कि पाकिस्तान मुंबई या अहमदाबाद पर बम गिरा सकता है, तो पड़ताल में सामने आया कि पाकिस्तान के पास केवल दो काम करने वाले बॉम्बर हैं और अगर वे दिल्ली तक आ भी गए, तो वापस लौटने की क्षमता उनमें नहीं है। सरदार पटेल ने सारी चेतावनियों को दरकिनार कर दिया।
13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन पोलो की शुरुआत की। मेजर जनरल जेएन चैधुरी की अगुवाई में यह सैनिक कार्रवाई सिर्फ 108 घंटे चली। भारतीय सेना की प्रचंड ताकत के आगे रजाकारों और निजाम की सेना ने घुटने टेक दिए।
विमान की खिड़की से निजाम को देखकर पटेल ने मुस्कुराते हुए अपने सचिव से कहा और फिर नीचे उतरकर विनम्रता से निजाम के अभिवादन का जवाब दिया। इस तरह सरदार पटेल की लौह-दृढ़ता के सामने एक निरंकुश सत्ता का अंत हुआ और हैदराबाद हमेशा-हमेशा के लिए अखंड भारत का अभिन्न अंग बन गया।
फरवरी 1949 में जब सरदार पटेल का विमान हैदराबाद के बेगमपेट हवाई अड्डे पर उतरा, तो कभी खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर शहंशाह समझने वाले निजाम उस्मान अली खान सिर झुकाए और हाथ जोड़े सरदार के स्वागत में खड़े थे। हैदराबाद रियासत भी भारत का अविभाज्य अंग बन गयी थी।

(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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