रोहिंग्या पर सीजेआई की टिप्पणी

इन दिनों भारत में रोहिंग्या मुसलमानों की चर्चा फिर से हो रही है। मानवाधिकार कार्यकर्ता डा. रीता मनचंद्रा ने सुप्रीम कोर्ट मंे याचिका दायर कर रखी है कि रोहिंग्या शरणार्थियों को हिरासत में लेकर गायब कर दिया गया है। इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि रोहिंग्याओं को शरणार्थियों का दर्जा किसने दिया। सीजेआई की इस टिप्पणी पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए तो तीन दर्जन से अधिक रिटायर्ड जजांे ने सीजेआई के पक्ष को उचित ठहराया है। दरअसल, हर मामले पर राजनीति करना कुछ लोगों की आदत हो गयी है। ध्यान रहे कि रोहिंग्या भारतीय कानून के तहत शरणार्थी बनकर नहीं आए। वे गैरकानूनी ढंग से यहां आए। यह एक गंभीर और जायज चिंता है कि नाजायज तरीके से भारत मंे घुसने वालों ने आधार कार्ड, राशन कार्ड और अन्य प्रमाण पत्र कैसे हासिल कर लिये हैं। म्यांमार जैसे देश में इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी पड़ी है। भारत मंे मतदाता सूचियों के गहन परीक्षण (एसआईआर) मंे भी रोहिंग्या सबसे बड़ी समस्या के रूप मंे उभरे हैं। रोहिंग्या समुदाय के लोग अब सिर्फ घर बनाकर रहने तक सीमित नहीं हैं बल्कि उनके बच्चों के लिए अलग से मदरसे तक चल रहे हैं। इनकी आबादी लगातार बढ़ रही है और जनसांख्यकीय बदलाव पर जबर्दस्त सवाल खड़े हो रहे हैं।
देश में रोहिंग्याओं से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक टिप्पणी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान और सवालों की 44 रिटायर्ड जजों ने आलोचना की है। इन रिटायर्ड जजों ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत की टिप्पणी पर सवाल उठानेवालों को आड़े हाथों लिया है और एक लेटर जारी करते हुए सीजेआई का समर्थन किया है। हाल ही में हाईकोर्ट रिटायर्ड जजों, सीनियर वकीलों और लीगल स्कॉलर्स ने चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नाम एक ओपेन लेटर लिखकर उनकी टिप्पणी को अविवेकपूर्ण बताया था। अब इसी कैंपेन के खिलाफ रिटायर्ड जज उतर पड़े हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट में मशहूर लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. रीता मनचंदा की याचिका पर सुनवाई हो रही थी। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों को हिरासत में लेकर गायब कर दिया गया है। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि रोहिंग्याओं को शरणार्थी का दर्जा किसने दिया। आप (रोहिंग्या) पहले सुरंग खोदकर या बाड़ पार करके अवैध रूप से दाखिल होते हैं, फिर खाना, पानी और पढ़ाई का हक मांगते हैं। चीफ जस्टिस की इस टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए उन्हें घेरने की कोशिश की गई थी। इस पर 44 रिटायर्ड जजों ने अपनी चिट्ठी में लिखा कि हम, रिटायर्ड जज, रोहिंग्या माइग्रेंट्स से जुड़ी कार्यवाही में माननीय चीफ जस्टिस की टिप्पणियों के बाद उन्हें ( माननीय चीफ जस्टिस) निशाना बनाने वाले सोचे-समझे कैंपेन पर अपनी कड़ी आपत्ति जताते हैं।
चिट्ठी में लिखा गया- न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष, तर्कपूर्ण आलोचना हो सकती है और होनी भी चाहिए। हालांकि, हम जो देख रहे हैं, वह सिद्धांतों पर असहमति नहीं है, बल्कि एक रूटीन कोर्टरूम कार्यवाही को भेदभाव वाला काम बताकर ज्यूडिशियरी को गलत साबित करने की कोशिश है। चीफ जस्टिस पर सबसे बुनियादी कानूनी सवाल पूछने के लिए हमला किया जा रहा है। कानून के हिसाब से, कोर्ट के सामने जिस स्टेटस का दावा किया जा रहा है, वह किसने दिया है? अधिकारों या हकों पर कोई फैसला तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक इस सीमा पर पहले ध्यान नहीं दिया जाता।इसी तरह, इस अभियान में सुप्रीम कोर्ट की बेंच की इस साफ बात को आसानी से नजरअंदाज कर दिया गया है कि भारत की जमीन पर किसी भी इंसान, नागरिक या विदेशी को टॉर्चर, गायब या अमानवीय बर्ताव का शिकार नहीं बनाया जा सकता, और हर इंसान की रिस्पेक्ट की जानी चाहिए। इसे दबाना और फिर कोर्ट पर “अमानवीयकरण” का आरोप लगाना, असल में कही गई बात को बहुत ज्यादा तोड़-मरोड़कर पेश करना है।
इस मामले में, हम कुछ बुनियादी बातों को बताना जरूरी समझते हैं। सबसे पहले यह कि रोहिंग्या भारतीय कानून के तहत रिफ्यूजी के तौर पर भारत नहीं आए हैं। उन्हें किसी कानूनी रिफ्यूजी-प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क के जरिए जगह नहीं मिली है। ज्यादातर मामलों में, उनकी एंट्री अनियमित या गैर-कानूनी है, और वे सिर्फ दावे से उस स्थिति को कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त “रिफ्यूजी” स्टेटस में एकतरफा नहीं बदल सकते। भारत ने 1951 के यूएन रिफ्यूजी कन्वेंशन और न ही इसके 1967 के प्रोटोकॉल पर दस्तखत किया है। भारत की अपनी सीमा में आने वालों के प्रति जिम्मेदारी उसके अपने संविधान, विदेशियों और इमिग्रेशन पर उसके घरेलू कानूनों और आम मानवाधिकार नियमों से बनती है। यह एक गंभीर और जायज चिंता है कि गैर-कानूनी तरीके से भारत में घुसने वाले लोगों ने आधार कार्ड, राशन कार्ड और दूसरे भारतीय डॉक्यूमेंट कैसे हासिल किए। ये नागरिकों या कानूनी तौर पर रहने वाले लोगों के लिए हैं। इनका गलत इस्तेमाल हमारी पहचान और वेलफेयर सिस्टम की ईमानदारी को कमजोर करता है। साथ ही डॉक्यूमेंट फ्रॉड और मिलीभगत के ऑर्गनाइज्ड नेटवर्क के बारे में गंभीर सवाल खड़े करता है।
भारत में रोहिंग्या मुख्य रूप से म्यांमार के रखाइन राज्य से आए मुस्लिम हैं, जो उत्पीड़न का आधार बनाकर 1980-90 के दशक से यहाँ रह रहे हैं। वे भारत में कई शहरों में रहते हैं। सरकार उन्हें अवैध प्रवासी मानती है और सुरक्षा चिंताओं के कारण उनके प्रति सख्त रवैया अपनाती है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि भारत में घुसपैठियों के लिए किसी तरह का ‘रेड कार्पेट वेलकम’ नहीं होना चाहिए।” यह टिप्पणी भारत की सुरक्षा और अवैध घुसपैठ के प्रति उसके सख्त रुख को दर्शाती है। रोहिंग्या हमारे देश के लिए खतरा बन रहे हैं। जम्मू की जमीन पर तस्वीर यही बयां कर रही है। म्यांमार से आए रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय के लोग न सिर्फ यहा आकर बसे हैं बल्कि अब कई इलाकों में उनकी स्थायी बसावट, कारोबार और यहां तक कि समानांतर ढांचे तक बनते दिखाई दे रहे हैं। यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट के संदेश और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ी खाई पैदा करती है। पहले रोहिंग्या समुदाय के लोग जम्मू शहर और आसपास के इलाकों में अस्थायी कैम्पों तक सीमित थे लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। कई क्षेत्रों में इनकी परमानेंट बस्तियां बस गई हैं। झुग्गियों का विस्तार हुआ है और यहां तक कि छोटी-छोटी दुकानें व बाजार भी खड़े हो चुके हैं। ये अब सिर्फ अस्थायी रूप से रहने के मकसद से नहीं आए हैं बल्कि उनका इरादा यहीं बस जाने का लगता है। सरकारी और सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, जम्मू के नरवाल, सुंजवां, भठिंडी और अन्य इलाकों में रोहिंग्या परिवारों ने ढांचों का स्थायी रूप लेती बस्तियां खड़ी कर ली हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1994 में दो बच्चों समेत एक रोहिंग्या परिवार जम्मू पहुंचा था। इसके बाद 2009 के बाद इनकी उपस्थिति में तेज उछाल आया। सन् 2007 से 2015 के बीच बड़ी संख्या में रोहिंग्या भारत आए और जम्मू में बसने लगे। पहले इस जगह का नाम कासिम नगर हुआ करता था और 2007 में इसे रोहिंग्या बस्ती के नाम से जाना जाने लगा। सन् 2020 के बाद रोहिंग्या मुस्लिम समुदाय ने अपने संगठन को इतना मजबूत कर लिया कि स्थायी रूप से बसने की चाह में इस जगह को ‘बर्मा बस्ती’ का नाम भी दे दिया गया है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



