लेखक की कलम

बेटियों को लेकर सीजेआई की चिंता

डेढ़ साल बाद भी पश्चिमी बंगाल में वही दरिंदगी और बर्बरता की वारदात सामने आई है जैसे कि पहले हुई थी। ओडिशा की मेडिकल की छात्रा के साथ पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान जिले में कुछ दरिंदों ने रेप किया। पुलिस ने गत 11 अक्टूबर को यह जानकारी दी। मामले में पुुलिस ने तीन शैतानों को गिरफ्तार किया है। यह घटना दुर्गापुर स्थित निजी मेडिकल कॉलेज परिसर के बाहर हुई। उन्होंने बताया कि सेकेंड ईयर की छात्रा अपने एक मित्र के साथ डिनर के लिए बाहर गई थी। पश्चिम बंगाल में छात्राओं से रेप की घटनाएं इससे पहले भी हो चुकी हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में जूनियर महिला डॉक्घ्टर की रेप के बाद हत्या ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। इसके बाद एक लॉ कॉलेज की छात्रा के साथ भी रेप करने का मामला सामने आया था।
देश के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने बेटियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को लेकर गंभीर चिंता जतायी है और कहा है कि अगर किसी देश की आत्मा को जानना हो, तो देखिए वो अपनी बेटियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। सीजेआई का यह कथन न केवल एक संवेदनशील निरीक्षण है, बल्कि हमारे समाज के अंतःकरण को झकझोरने वाला सवाल भी है। जब देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था का प्रमुख यह पूछता है कि क्या हमारी बेटियां सच में सुरक्षित हैं? तो यह महज एक कानूनी प्रश्न नहीं, बल्कि एक नैतिक चुनौती बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट की किशोर न्याय समिति के तत्वावधान में यूनिसेफ इंडिया के सहयोग से बालिकाओं की सुरक्षा: भारत में उसके लिए एक सुरक्षित और सक्षम वातावरण विषय पर आयोजित राष्ट्रीय वार्षिक हितधारक परामर्श सम्मेलन में मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या हम यह कह सकते हैं कि हमारे बच्चे, खासतौर पर हमारी बेटियां, पूरी तरह सुरक्षित हैं? क्या सुरक्षा उस जगह संभव है, जहां गरिमा छीनी जाती है, आवाजें दबा दी जाती हैं या सपनों को हालातों से बांध दिया जाता है? बालिका की सुरक्षा का मतलब सिर्फ संरक्षण नहीं, बल्कि सशक्तिकरण भी होना चाहिए, ताकि हर लड़की को देखा, सुना और महत्व दिया जा सके। सीजेआई ने संविधान के इतिहास की याद दिलाते हुए बताया कि महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष सुरक्षा का विचार भारत की आजादी के समय से ही संविधान में शामिल किया गया था। संविधान निर्माताओं ने राज्य को यह शक्ति दी कि वह महिलाओं और बच्चों के हित में विशेष कानून बना सकें, क्योंकि उन्हें पता था कि बाल शोषण, गरीबी और शिक्षा की कमी जैसी चुनौतियां हमारे समाज की जड़ में हैं।
भारत का संविधान महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है। अनुच्छेद 15(3) के अंतर्गत राज्य को यह अधिकार है कि यह उनके हित में विशेष कानून बना सके। यह दूरदर्शिता उन संविधान निर्माताओं की थी, जिन्होंने आजादी के तुरंत बाद यह समझ लिया था कि सामाजिक असमानता, बाल शोषण और शिक्षा की कमी देश की की जड़ों को कमजोर कर सकती है। यही कारण है कि आज हमारे पास किशोर न्याय अधिनियम, बाल विवाह निषेध कानून और पॉस्को जैसे मजबूत कानूनी ढांचे हैं। सीजेआई गवई की टिप्पणी ने यह कठोर सच्चाई उजागर की कि कानून मौजूद हैं, पर उनका प्रभाव अभी भी सीमित है। देश के कई हिस्सों में बच्चियां बाल विवाह, शोषण, तस्करी और कुपोषण की शिकार हैं। सबसे बड़ी चिंता उनके साथ बढ़ता अपराध है, जो तमाम कानूनों के बावजूद कम होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है। बेटियों के के साथ होने वाली दुष्कर्म की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट हमारी आत्मतुष्टि को तोड़ने वाली सच्चाई सामने रखती है। वर्ष 2023 में बच्चों के खिलाफ अपराधों के 1,77,335 मामले दर्ज हुए। यह पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत अधिक हैं। इनमें से 45 प्रतिशत मामले अपहरण से जुड़े हैं, और 38 प्रतिशत मामले पॉक्सो अधिनियम के तहत यौन अपराधों से संबंधित हैं। सबसे अधिक मामले अपहरण और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज किए गए हैं। अपहरण की घटनाएं, बच्चों के खिलाफ कुल अपराधों का 45.05 फीसदी हिस्सा हैं, वहीं 67,694 मामले पॉक्सो अधिनियम से संबंधित अपराधों में दर्ज हुए हैं। इनमें लड़कियों के साथ हुए अपराध अधिक हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में अपराध दर सबसे अधिक पाई गई है। नाबालिग लड़कियों से विवाह के लिए उनका अपहरण करना सबसे बड़ी वजह रही। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में 16,737 लड़कियों और 129 लड़कों को जबरन शादी के लिए अगवा किया गया या नाबालिग लड़कियों की मानव तस्करी या खरीद-फरोख्त के भी 1,858 मामले सामने आए। यह केवल आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि यह हमारी सामूहिक विफलता का दर्पण है। सिर्फ इतना ही नहीं, सीजेआई जानकारी दी कि डिजिटल युग में लड़कियां नई तरह की चुनौतियों और खतरों का सामना कर रही हैं। उन्होंने चिंता जताई कि तकनीक, जो कभी सशक्तिकरण का जरिया थी, अब शोषण का माध्यम
बनती जा रही है। ऑनलाइन हैरेसमेंट, साइबर बुलिंग, डिजिटल स्टॉकिंग, निजी डेटा का दुरुपयोग और डीपफेक तस्वीरें अब लड़कियों के लिए गंभीर खतरा
बन चुकी हैं। उन्होंने परामर्श दिया कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी को डिजिटल युग के अपराधों को समझने के लिए प्रशिक्षित होना चाहिए। लड़कियों के खिलाफ साइबर अपराधों को संभालने में संवेदनशीलता और समझदारी
दोनों जरूरी हैं। पुलिस और जांच
एजेंसियों को विशेष प्रशिक्षण मिलना
चाहिए ताकि ये ऐसे मामलों में पीड़ितों की सुरक्षा और सम्मान का ध्यान रख सकें।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि एक तरफ जहां बेटियां अपराध का शिकार हो रही हैं, तो दूसरी तरफ अभी तक अपने अधिकारों से भी वंचित है। आज भी देश के कई हिस्सों में पीड़ित बच्चियां न्याय पाने से पहले सामाजिक कलंक का सामना करती हैं। पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराना कठिन है, मुकदमें सालों तक खिंचते हैं और सजा दर कम बनी रहती है। यह स्थिति बताती है कि जब तक न्याय प्रणाली में संवेदनशीलता और तत्परता नहीं आएगी, तब तक कानून सिर्फ कागज पर रह जाएगा। सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हर अभिभावक, शिक्षक, मीडिया संस्थान और नागरिक को यह समझना होगा कि बेटियों की सुरक्षा सामूहिक दायित्व है। स्कूल स्तर पर ही बच्चों, खासकर लड़कियों को साइबर सुरक्षा, डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन शालीनता के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए। इसके अलावा डीपफेक और निजी डेटा के दुरुपयोग के खिलाफ स्पष्ट दंडात्मक प्रावधानों की जरूरत है। साथ ही बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों के शीघ्र निपटान के लिए न्यायालयों की संख्या और संसाधन बढ़ाए जाने चाहिए।
सबसे बड़ी जरूरत है, लोगों की सोच और मानसिकता बदलने की। वास्तविक परिवर्तन मानसिकता से आता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बेटियों को सुरक्षा देने का अर्थ उन्हें ‘कमजोर’ मानना नहीं है, बल्कि उन्हें बराबरी का अधिकार देना है। जब तक घर-परिवार और समाज में यह सोच नहीं बदलेगी कि लड़की बाहर जाएगी तो खतरा है, तब तक कोई भी नीति स्थायी असर नहीं डाल सकेगी। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि सम्मान का अर्थ नियंत्रण नहीं, बल्कि समान अवसर है। सीजेआई गवई का वक्तव्य केवल एक भाषण नहीं, बल्कि चेतावनी है कि उस समाज के लिए जो अक्सर अपनी बेटियों की सुरक्षा के प्रश्न को संस्कारों और परंपराओं के पर्दे में ढक देता है अगर बेटियां भय के बिना नहीं जी सकतीं, अगर उनकी आवाजें दबाई जाती हैं और सपने हालातों में कैद हैं तो हमें अपनी सभ्यता पर गर्व करने का कोई अधिकार नहीं। इसलिए आज जरूरत है कि हम अपनी सोच, अपनी व्यवस्था और अपने डिजिटल भविष्य तीनों को पुनः परिभाषित करें। यह प्रतिबिंब जब स्पष्ट, मजबूत और न्यायपूर्ण होगा, तब ही भारत सच में विश्वगुरु कहलाने के योग्य होगा। (मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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