लेखक की कलम

नये साल में सीजेआई का तोहफा

यह सच है कि हम भारतीयों का नया साल चैत्र महीने से प्रारंभ होता है लेकिन पहली जनवरी से शुरू होने वाले नये वर्ष का स्वागत करने की दीवानगी हमारी संस्कृति का परिचय देती है। इस बार भी 31 दिसंबर की रात में होटलों से लेकर सड़क तक जश्न मनाया गया और रात के 12 बजते ही हैप्पी न्यू ईयर की गूंज जिस तरह उठी वो वसुधैव कुटुम्बकम् का एक प्रतीक भी है। इस दिन हम कुछ अच्छी बातों का संकल्प भी लेते हैं। यह बात अलग है कि बहुत जल्द हम उस संकल्प को भूल भी जाते हैं। सभी के साथ यह लागू नहीं होता। संकल्प कर निभाने वाले समाज का आदर्श बनते हैं। उनकी प्रशंसा भी करनी चाहिए। इसलिए हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत अर्थात सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने 2026 के पहले दिन संकल्प लिया है कि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा अब आधी रात को भी खुला रहेगा। इसके लिए उनकी तारीफ भी करनी चाहिए। यह व्यापक जनहित का काम है।भारत के चीफ जस्टिस सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि फरियादी इमरजेंसी में आधी रात को भी सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं।
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अगर किसी नागरिक को कानूनी इमरजेंसी का सामना करना पड़ता है या जांच एजेंसियों द्वारा अजीब समय पर गिरफ्तारी की धमकी दी जाती है, तो वह व्यक्ति अपने मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए आधी रात को भी संवैधानिक अदालतों से सुनवाई की मांग कर सकेगा। सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘मेरा प्रयास है और रहेगा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट को लोगों की अदालतें बनाया जाए, जहां कानूनी इमरजेंसी में काम के घंटों के बाद भी किसी भी समय संपर्क किया जा सके।’ उन्होंने कहा कि उनकी प्राथमिकताओं में से एक यह है कि कई अहम संवैधानिक मुद्दों से जुड़ी पेंडिंग याचिकाओं से निपटने के लिए जितनी हो सके उतनी संविधान बेंचें स्थापित की जाएं- जैसे कि चुनावी रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का मामला, जो बिहार से शुरू हुआ और अब एक दर्जन राज्यों में चल रहा है।
इधर, सीजेआई ने जल्द न्याय सुनिश्चित करने और इंसाफ के लिए नया सिस्टम लागू कर दिया है तो उधर सुप्रीम कोर्ट में कामकाज में सुगमता, जल्द न्याय सुनिश्चित करने के लिए एसओपी जारी की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इसमें उसके समक्ष पेश होने वाले वकीलों द्वारा दलीलों और लिखित निवेदन प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई है। इस कदम का उद्देश्य न्यायालय के कामकाज में सुगमता और न्याय मुहैया कराने की व्यवस्था में तेजी लाना है।
सीजेआई यानी प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों ने 29 दिसम्बर को एक परिपत्र जारी किया। इसमें सभी मामलों में मौखिक दलीलें प्रस्तुत करने की समय सीमा का पालन करने के लिए एसओपी तय की गई है। तत्काल प्रभाव से लागू इस एसओपी में कहा गया है, ‘वरिष्ठ अधिवक्ता, दलील रखने वाले वकील और रिकॉर्ड पर मौजूद अधिवक्ता, नोटिस के बाद और नियमित सुनवाई वाले सभी मामलों में मौखिक बहस करने की समय-सीमा सुनवाई शुरू होने से कम से कम एक दिन पहले प्रस्तुत करेंगे। यह समय-सीमा न्यायालय को ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ (एओआर) को पहले से उपलब्ध कराए गए उपस्थिति पर्ची जमा करने के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी।
इसमें कहा गया है कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं सहित बहस करने वाले वकील, अपने एओआर या पीठ द्वारा नामित नोडल वकील (यदि कोई हो) के माध्यम से, सुनवाई की तारीख से कम से कम तीन दिन पहले दूसरे पक्ष को एक प्रति देने के बाद संक्षिप्त नोट या लिखित प्रस्तुति दाखिल करेंगे, जो पांच पृष्ठ से अधिक का नहीं होगा। शीर्ष अदालत के चार रजिस्ट्रार द्वारा हस्ताक्षरित परिपत्र में कहा गया है, ‘सभी वकील निर्धारित समय-सीमा का सख्ती से पालन करेंगे और अपनी मौखिक दलीलें पूरी करेंगे।’
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने रोहतक स्थित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से विधि का अध्ययन किया। उन्होंने 1985 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में वकालत शुरू की और हरियाणा के महाधिवक्ता के रूप में कार्य किया। इसके बाद, 2001 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया।
2004 में, न्यायमूर्ति कांत को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। उन्होंने 3 अक्टूबर, 2018 को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उनकी नियुक्ति विवादों में घिरी क्योंकि न्यायमूर्ति ए.के. गोयल, जो पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत हुए एक सलाहकार न्यायाधीश थे, ने कॉलेजियम से असहमति जताई । सलाहकार न्यायाधीशों के विचार कॉलेजियम द्वारा इसलिए मांगे जाते हैं क्योंकि वे उस उच्च न्यायालय से परिचित होते हैं जहां से किसी न्यायाधीश को पदोन्नति के लिए विचार किया जा रहा होता है। इसके बावजूद, कॉलेजियम ने न्यायमूर्ति कांत को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया।
जितेंद्र सिंह बनाम पर्यावरण मंत्रालय एवं अन्य के मामले में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा और स्वयं की ओर से न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने सर्वसम्मत निर्णय दिया। उन्होंने कहा कि तालाब सार्वजनिक उपयोगिताएँ हैं जिनका उपयोग आम जनता करती है। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय जल निकायों को समाप्त करने की योजनाएँ, भले ही उनके विकल्प मौजूद हों, संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती हैं। इसीप्रकार केंद्रीय जांच ब्यूरो बनाम सक्रू महागु बिनजेवार और अन्य के मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत हत्या, आपराधिक साजिश, दंगा और धमकी एवं अपमान के आरोप में दोषसिद्धि शामिल थी। न्यायमूर्ति कांत ने 25 वर्षीय कारावास की सजा की आनुपातिकता पर तीन न्यायाधीशों की पीठ की राय लिखी। उन्होंने कहा कि आईपीसी की धारा 57 किसी भी तरह से आजीवन कारावास की सजा को 20 वर्ष तक सीमित नहीं करती है। इसलिए, उन्होंने मृत्युदंड को 25 वर्ष के वास्तविक कारावास में परिवर्तित करने के फैसले को बरकरार रखा।
जस्टिस सूर्यकांत का न्यायिक सफर हमेशा बड़े राष्ट्रीय मुद्दों के केंद्र में रहा है। अपनी सादगी, तेज कानूनी समझ और संविधान की भावना को प्राथमिकता देने वाले जस्टिस सूर्यकांत 53वें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया हैं। सुप्रीम कोर्ट में रहते हुए उन्होंने कई ऐसे फैसलों पर काम किया जिन्होंने न सिर्फ कानून बल्कि राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित किया। इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक स्वतंत्रता, चुनावी पारदर्शिता, न्यायिक संघवाद और लैंगिक समानता जैसे क्षेत्र शामिल रहे। जस्टिस सूर्यकांत उस बेंच का हिस्सा थे जिसने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखा। यह हाल के वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक फैसला माना गया, जिसने केंद्र-राज्य संबंधों और राष्ट्रीय एकीकरण पर स्थायी प्रभाव छोड़ा। उन्होंने उस बेंच में अहम भूमिका निभाई जिसने राजद्रोह कानून पर रोक लगाते हुए निर्देश दिया कि सरकार इसके पुनरीक्षण तक 124 ए के तहत नई एफआईआर दर्ज न करे। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए बड़े कदम के रूप में देखा गया।
अवैध रूप से हटाई गई एक महिला सरपंच को बहाल करने का आदेश, बार एसोसिएशनों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का ऐतिहासिक निर्देश, महिला अधिकारों और न्यायिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व पर निर्णायक रुख भी सीजेआई सूर्यकांत के नाम है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button