लेखक की कलम

पुलिस हिरासत में मौतों का सिलसिला?

बेशक राजनीतिक दलों के आका संविधान-संविधान चिल्लाए संसद में हंगामा करें लेकिन देश में संविधान और कानून की हालत को इस तथ्य से समझ सकते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में हर दिन 6 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हो रही हैं। यह आंकड़े तीन साल पहले की सांख्यिकी पर हैं बीते तीन साल में भी स्थिति और बिगड़ी है सुधार होना दूर की बात है। पुलिस हिरासत में मौतों की खबर भारत में जैसे बहुत आम है। लगभग रोज अखबारों में जेल में या पुलिस की हिरासत में मारे जाने वालों की खघ्बर छपती है। पुलिस हिरासत में मौत के मामले में उत्तर प्रदेश पश्चिमी बंगाल, राजस्थान, हरियाणा और बिहार बढ़त बनाए हुए हैं। हालांकि 2022 के बाद देश में हिरासत में मौत का रिकार्ड सार्वजनिक नहीं किया गया है।
उत्तर-प्रदेश में सबसे अधिक मौते कस्टडी के दौरान होती हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल का नाम आता है, जहां आरोपियों की मौतें पुलिस कस्टडी में होती हैं। केंद्र सरकार के मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में उत्तर-प्रदेश में हिरासत में 451 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2021-22 में ये आंकड़ा बढ़कर 501 हो गया था। पश्चिम बंगाल में दूसरे नंबर पर हिरासत में सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। 2020-21 के दौरान वहां पर 185 लोगों की मौतें हुई थी, जबकि 2021-22 के दौरान 257 आरोपियों की मौत हुई थी। बता दें कि भारत में 2020-21 में 1940 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 2021-22 में ये आंकड़ा बढ़कर 2544 पहुंच गया था।
हाल ही में राजस्थान में जो तथ्य सामने आए वो दिल दहलाने वाले हैं। पिछले आठ माह में राजस्थान में ग्यारह लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो गई। राजस्थान में पिछले दो वर्षों में पुलिस हिरासत में 20 व्यक्तियों की मृत्यु हुई है। इनमें से अधिकतर मौतों का कारण तबीयत बिगड़ना बताया गया है।पांच की मौत हृदयाघात से और एक की मौत पुलिस थाने के कुएं में छलांग लगाने से हुई है। शेष 14 मामलों की जांच अभी लंबित है। पुलिस हिरासत में हुई इन मौतों के लिए अब तक किसी भी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया गया है, केवल दो पुलिसकर्मियों को नोटिस जारी किया गया है।
लोकसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जानकारी दी थी कि 2020 से 2022 के बीच 4484 लोगों की मौत हिरासत में हुई थी। मानवाधिकार आयोग ने माना कि 2021-22 में जेलों में 2152 लोग मारे गए। इनमें 155 मौतें पुलिस हिरासत में हुई थीं। हमारे यहां हिरासत में इतनी मौतें क्यों होती हैं? क्या हमारी पुलिस व्यवस्था हिरासत में या जेल काट रहे कैदियों के साथ अमानवीय बरताव करती है? क्या वह कानून का खयाल नहीं रखती? पिछले दिनों कॉमन कॉज का एक सर्वे आया है जो इस मामले में कई सच्चाइयों पर रोशनी डालता है। सर्वे 17 राज्यों के 82 स्थानों पर किया गया है। इनमें अलग-अलग रैंक के 8,276 पुलिसकर्मी शामिल रहे हैं। सर्वे के मुताबिक ज्यादातर पुलिसवाले टॉर्चर और हिंसा को अपने काम के लिए जरूरी मानते हैं लगभग 20 फीसदी पुलिसकर्मी सख्त तौर-तरीकों को बिल्कुल जरूरी मानते हैं ताकि लोगों में डर बना रहे।35 फीसदी पुलिसकर्मियों को ये काफी जरूरी लगता है और 27 फीसदी पुलिसकर्मी मानते हैं कि यौन उत्पीड़न के मामलों में भीड़ की हिंसा जायज होती है। यानी भीड़ किसी रेपिस्ट को मारे-पीट दे तो ठीक है। बच्चों के अपहरण के मामले में 25 प्रतिशत पुलिसकर्मी यही मानते हैं। 22 फीसदी पुलिसवाले मानते हैं कि खतरनाक अपराधियों को मार देना उन पर मुकदमा चलाने से बेहतर है। 30 फीसदी पुलिसवाले गंभीर मामलों में थर्ड डिग्री टॉर्चर को सही मानते हैं। जबकि 9 फीसदी यहां तक मानते हैं कि छोटे-मोटे अपराधों में भी ये सही है। 11 फीसदी पुलिसकर्मी मानते हैं कि आरोपियों के परिवारवालों को थप्पड़ मारना या पीटना बिल्कुल जायज है, जबकि 30 फीसदी मानते हैं कि ये कभी-कभी जरूरी है।
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी एके जैन ने कहा कि हिरासत में मौत को लेकर जो आरोप हैं उनमें से कुछ सही भी हैं। समाज तय करता है कि उसे किस तरह का पुलिस बल मिले। पुलिस फोर्स में बड़ी संख्या में रिक्तियां हैं। पुलिस कर्मियों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। ये भी एक कारण है कि वो शॉटकर्ट रास्ता अपनाते हैं। तकनीकी की कमी भी एक बड़ी चुनौती रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि न्यायिक सुधार की भी काफी जरूरत है जिससे की पुलिसकर्मियों पर प्रेशर कम हो।
वरिष्ठ अधिवक्ता यशवंत सिंह ने कहा कि ये बात सही है कि न्यायिक व्यवस्था में सुधार की बेहद जरूरत है। उन्होंने कहा कि पुलिस वर्ग को 2 भागों में बांटने की जरूरत है। एक भाग का काम कानून व्यवस्था देखना होगा वहीं दूसरे भाग का काम यह हो कि वो सिर्फ जांच करे। साइंटिफिक जांच तब ही हो पाएगी जब आप स्वयं जानकार होंगे। साथ ही पुलिस कर्मियों की मानसिकता को भी ठीक करना होगा। इसके लिए उनके ऊपर से वर्क प्रेशर कम करना बेहद जरूरी है।
पुलिस हिरासत में रखने के नियम की बात करें तो ये नियम संविधान और दंड संहिता प्रक्रिया के जरिए निर्धारित किए गए हैं। नियम कहता है कि गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर उस शख्स को निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना चाहिए। बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के किसी शख्स को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता है। वहीं अगर मामला गंभीर है तो ऐसे केस में पुलिस पूछताछ के लिए 15 दिनों की रिमांड दे सकती है। हालांकि बाद में इसे बढ़ाया भी जा सकता है। हिरासत में रहने के दौरान उस आरोपी को उचित सुविधा और सुरक्षा दी जानी चाहिए।
इसके अलावा 48 घंटे में उसकी चिकित्सकीय जांच भी होनी चाहिए। अगर हिरासत के दौरान आरोपी के साथ प्रताड़ना की जा रही है तो उसे शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। हिरासत या गिरफ्तारी के बाद उस शख्स कोगिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर उस शख्स को निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना चाहिए। बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के किसी शख्स को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता है। वहीं अगर मामला गंभीर है तो ऐसे केस में पुलिस पूछताछ के लिए 15 दिनों की रिमांड दे सकती है। हालांकि बाद में इसे बढ़ाया भी जा सकता है। हिरासत में रहने के दौरान उस आरोपी को उचित सुविधा और सुरक्षा दी जानी चाहिए। इसके अलावा 48 घंटे में उसकी चिकित्सकीय जांच भी होनी चाहिए। अगर हिरासत के दौरान आरोपी के साथ प्रताड़ना की जा रही है तो उसे शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है। हिरासत या गिरफ्तारी के बाद उस शख्स को उसके अधिकारों के बारे में सूचित करना चाहिए। आरोपी को अपने वकील से बात करने का अधिकार है और किसी भी पूछताछ से पहले वकील से सलाह लेने का भी अधिकार है।
यहां बता दें कि पुलिस हिरासत में हुई मौतों के संबंध में एक यह बात भी नोट करने वाली है इनमें लगभग सभी मामलों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण ज्ञात न होना और विसरा सुरक्षित रखा जाना अंकित किया जाता है जबकि मृतक के परिवार द्वारा लिखाई गई प्रथम सूचना रिपोर्ट में मृतक के साथ पुलिस द्वारा मारपीट करने का स्पष्ट आरोप लगाया जाता है तथा उसके फलस्वरूप मौत होने की बात कही जाती है, जिससे मृत्यु का कारण स्पष्ट तौर पर ज्ञात हो जाना चाहिए।
इस प्रकार पोस्टमार्टम रिपोर्ट से एक भ्रामक स्थिति पैदा हो जाती है, जिसका लाभ आरोपी पुलिस कर्मचारियों को ही मिलता है। इसलिए यह बेहतर होगा कि यदि पुलिस हिरासत में हुई मौत के मामले में पोस्टमार्टम में मृत्यु का कारण ज्ञात न होना अंकित किया जाता है तो एक बोर्ड द्वारा पुनः पोस्टमार्टम किए जाने की मांग की जानी चाहिए ताकि मृत्यु का कारण स्पष्ट हो सके। इससे पुलिस वालों को मृत्यु का कारण ज्ञात न होने से मिलने वाले लाभ पर भी रोक लगेगी और दोषियों को सजा भी मिलेगी जो पुलिस हिरासत में होने वाली मौतों को रोकने में सहायक होगी। (मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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