लेखक की कलम

ईरान-चीन की कूटनीतिक सक्रियता

पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध के बीच ईरान और चीन की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। ऐसे समय में जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते तथा युद्धविराम को लेकर बातचीत चल रही है, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का बीजिंग दौरा कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह यात्रा केवल दो देशों के बीच औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का संकेत भी है।
अराघची ने बीजिंग में चीन के शीर्ष राजनयिक और विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की। यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा भी तय है। यानी एक तरफ अमेरिका चीन के साथ अपने संबंधों को स्थिर रखने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ चीन ईरान के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करता दिखाई दे रहा है। इस पूरी कूटनीतिक गतिविधि के केंद्र में पश्चिम एशिया का संघर्ष, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और परमाणु राजनीति है।
ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच हालिया युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बढ़ते खतरे ने वैश्विक तेल आपूर्ति को संकट में डाल दिया। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक चीन के लिए यह स्थिति और भी गंभीर थी। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करता है और ईरानी तेल उसकी आपूर्ति श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में चीन के लिए यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक आवश्यकता भी है।
बीजिंग में हुई बैठक के बाद ईरान ने साफ कहा कि वह बातचीत के लिए गंभीर है, लेकिन अपने “वैध अधिकारों” से पीछे नहीं हटेगा। अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान ने जिस तरह अपनी रक्षा क्षमता दिखाई है, उसी तरह वह कूटनीति के क्षेत्र में भी दृढ़ और गंभीर है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तेहरान केवल “निष्पक्ष और व्यापक” समझौते को ही स्वीकार करेगा। यह बयान दर्शाता है कि ईरान अमेरिका के साथ समझौते के लिए तैयार तो है, लेकिन वह किसी दबाव में झुकने के मूड में नहीं है।
दूसरी ओर चीन ने भी अपने बयान में बेहद संतुलित लेकिन महत्वपूर्ण संदेश दिया। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि पश्चिम एशिया की स्थिति “युद्ध से शांति की ओर संक्रमण के एक महत्वपूर्ण मोड़” पर है। चीन ने साफ कहा कि संघर्ष का दोबारा शुरू होना स्वीकार्य नहीं है और बातचीत जारी रहना बेहद जरूरी है। यह बयान चीन की उस रणनीति को दर्शाता है जिसमें वह खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति और
मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है।
चीन ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सुरक्षित और सामान्य आवाजाही बहाल करने की भी अपील की। यह अपील केवल कूटनीतिक बयान नहीं है, बल्कि चीन की आर्थिक चिंताओं का प्रतिबिंब भी है। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया की बड़ी तेल आपूर्ति गुजरती है और यहां अस्थिरता का सीधा असर चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। युद्ध के दौरान तेल की कीमतों में आई तेज उछाल ने दुनिया को यह एहसास करा दिया कि पश्चिम एशिया का संकट केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव वाला मुद्दा है।
परमाणु मुद्दे पर भी चीन ने एक संतुलित रुख अपनाया। उसने कहा कि वह ईरान की इस प्रतिबद्धता की सराहना करता है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा। साथ ही चीन ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल का
ईरान को वैध अधिकार है। यह रुख अमेरिका से अलग है, क्योंकि वाशिंगटन लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सुरक्षा खतरे के रूप में देखता रहा है। चीन यहां खुद को एक ऐसे साझेदार के रूप में पेश कर रहा है जो ईरान की संप्रभुता
और उसके अधिकारों को स्वीकार करता है।
अमेरिका भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में चीन से आग्रह किया कि वह ईरान पर दबाव डाले ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी के लिए खोला जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपनी आगामी बैठक में ईरान मुद्दे पर चर्चा करेंगे। इसका अर्थ है कि ईरान अब केवल पश्चिम एशिया का विषय नहीं रहा, बल्कि अमेरिका-चीन संबंधों का भी अहम हिस्सा बन चुका है।
चीन की स्थिति इस मामले में बेहद जटिल है। एक ओर वह अमेरिका के साथ व्यापारिक और रणनीतिक संबंधों को बिगाड़ना नहीं चाहता, दूसरी ओर वह ईरान जैसे सहयोगी देश को भी खोना नहीं चाहता। यही कारण है कि चीन ने युद्ध के दौरान अमेरिका की खुलकर आलोचना करने से परहेज किया। विश्लेषकों का मानना है कि चीन चाहता है कि ट्रंप-शी शिखर वार्ता बिना किसी बड़े तनाव के संपन्न हो जाए लेकिन इसके साथ-साथ वह यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि पश्चिम एशिया में उसका प्रभाव कमजोर न पड़े।
विशेषज्ञों के अनुसार, चीन की भूमिका आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप से जुड़े विश्लेषक अली वाइन का कहना है कि पिछली बार भी चीन ने ईरान को बातचीत की मेज तक लाने में भूमिका निभाई थी और इस बार भी वह महत्वपूर्ण कूटनीतिक योगदान दे सकता है। चीन को यह डर भी है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष लंबा खिंचता है, तो खाड़ी देशों के साथ उसके संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में ऊर्जा राजनीति भी बेहद अहम है। आंकड़ों के अनुसार, युद्ध से पहले चीन ईरान के निर्यातित तेल का 80 प्रतिशत से अधिक खरीद रहा था। हाल ही में अमेरिका ने कुछ चीनी रिफाइनरियों पर ईरानी तेल खरीदने को लेकर प्रतिबंध लगाए थे। इसके जवाब में चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध तेज कर दिया और अपने उद्योगों से कहा कि वे इन प्रतिबंधों का पालन न करें। यह कदम बताता है कि चीन अब अमेरिकी आर्थिक दबाव के सामने खुलकर अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता दिखाने लगा है।
कुल मिलाकर, ईरान और चीन की यह नजदीकी केवल दो देशों की साझेदारी नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति का संकेत है। पश्चिम एशिया में युद्ध, ऊर्जा संकट और परमाणु कूटनीति के बीच चीन खुद को एक वैकल्पिक शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहता है। वहीं ईरान भी अमेरिका के दबाव का मुकाबला करने के लिए चीन और रूस जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है।
आने वाले दिनों में ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात, अमेरिका- ईरान वार्ता और होर्मुज की स्थिति तय करेगी कि दुनिया युद्ध की ओर बढ़ेगी या कूटनीति की ओर लेकिन इतना साफ है कि अब पश्चिम एशिया की राजनीति केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन की नई कहानी बन चुकी है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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