लेखक की कलम

कर्नाटक में भी राज्यपाल क्षुब्ध

संविधान के तहत राज्यों में सर्वोच्च राज्यपाल अब विवादों में ज्यादा घिरते जा रहे हैं। राज्य विधानसभा का सत्र प्रारम्भ होने से पहले ही राज्यपाल को अभिभाषण पढ़ना होता है। ध्यान देने की बात है कि राज्यपाल उस अभिभाषण को सिर्फ पढ़ता है जो राज्य सरकार तैयार करती है। राज्य में केन्द्र से इतर दल की सरकार होने पर ऐसी नौबत आती है जब राज्यपाल इफ-बट करने लगते हैं। राज्य सरकार अपनी शिकायतें केन्द्र के प्रति दिखाती है तो राज्यपाल इसे पसंद नहीं करते। इसी के चलते तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में राज्यपाल ने अभिभाषण नहीं पढ़ा। तमिलनाडु में एम स्टालिन की द्रमुक सरकार है तो आंध्र प्रदेश मंे तेलुगुदेशम की सरकार है। तेलुगुदेशम (टीडीपी) केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का ही हिस्सा है, फिर भी राज्यपाल को सरकार के अभिभाषण मंे कुछ आपत्तिजनक लगा। अब कर्नाटक की कांग्रेस सरकार केन्द्र सरकार की आलोचना का पुट डाल दिया तो राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कहा है कि वे ऐसे अभिभाषण को नहीं पढ़ेंगे। यह प्रवृत्ति अच्छी नहीं है। प्रधानमंत्री जब ऐसे राज्यों में किसी कार्यक्रम में जाते हैं और मुख्यमंत्री भी उस कार्यक्रम में मौजूद रहते हैं तो सरकार की आलोचना भी होती है। मुख्यमंत्री को उसे सुनना पड़ता है। कर्नाटक में अब तक डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच कुर्सी को लेकर खींचतान ही चर्चा का विषय थी। अब राज्यपाल गहलोत का दुराग्रह मुख्य चर्चा का विषय बन गया है।
कर्नाटक में राज्यपाल और रमैया सरकार के बीच ठन गई है। साल का पहला विधानसभा सत्र शुरू होने जा रहा था। हालांकि, हर बार साल का पहला सत्र बजट सत्र होता है लेकिन इस बार कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मनरेगा कानून को बदल देने के केंद्र सरकार के फैसले पर चर्चा के लिए विधानसभा का ये विशेष सत्र बुलाया है। इस सत्र की स्पीच को लेकर राज्यपाल और सरकार के बीच ठन गई। साल का पहला सत्र होने के नाते परम्परा के मुताबिक गवर्नर थावरचंद गहलोत को सत्र के पहले दिन विधानमंडल के संयुक्त सम्बोधन के लिए आमंत्रित किया गया। इसके लिए जो स्पीच कॉपी सरकार की ओर से गवर्नर को भेजी गई उसमें मनरेगा बिल को बदल कर लाये गये नए जी राम जी बिल की खामियों को गिनाया गया है, साथ ही भद्रा परियोजना में केंद्र सरकार की ओर से वित्तीय मदद को लेकर उदासीनता और जीएसटी को लेकर गैर भाजपा शासित प्रदेशों के साथ किये जा रहे सौतेले व्यवहार के बारे में भी लिखा गया है।
अभिभाषण को पढ़ने के बाद गवर्नर ने चीफ सेक्रेटरी से स्पीच से 11 ऐसे पेरेग्राफ को हटाने की सलाह दी थी जो केंद्र और राज्य सरकार के बीच संघर्ष की वजह बनी है। हालांकि राज्य सरकार ने गवर्नर को ब्रीफ किया कि हाई लेवल समिति ने ये फैसला किया है कि इस स्पीच में कुछ तकनीकी मामूली बदलाव किये जाने संभव हंै लेकिन पैराग्राफ को डिलीट नहीं किया जा सकता है। इसके बाद गवर्नर ने 21 जनवरी को संयुक्त संबोधन में आने में अपनी असहमति व्यक्त कर दी। कर्नाटक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है ऐसे में सरकार के पास कोर्ट का रुख करने का विकल्प है। सरकार ने एडवोकेट जनरल शशि किरण शेट्टी को दिल्ली भेज दिया अगर राज्यपाल सदन को सम्बोधित करने नहीं आते हैं तो सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है।
इस विवाद के बीच राज्यपाल थावरचंद गहलोत 22 जनवरी को विधानसभा पहुंचे। हालांकि, उन्होंने स्पीच का सिर्फ एक अंश ही पढ़ा और इसके बाद असेम्बली से निकल गए। इस वजह से कांग्रेस के विधायकों ने विधानसभा में प्रोटस्ट शुरू कर दिया। राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मुद्दे पर कहा- गवर्नर ने अपने संवैधानिक कर्तव्य का पालन नहीं किया है, गवर्नर केंद्र की कठपुतली की तरह काम नहीं कर सकते हैं। वहीं, स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुण्डु राव ने कहा- ऐसा नहीं होना चाहिये। गवर्नर का कर्तव्य है, ये ही परम्परा है। केरल, तमिलनाडु, बंगाल और अब यहां भी हो रहा है। जहां भी गैर भाजपा सरकार है वहां गवर्नर संवैधानिक तरीके से काम नहीं करते हैं। अब ये तय होना चाहिए कि राज्य में गवर्नर होना भी चाहिए या फिर उसकी जरूरत नहीं है।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मनरेगा कानून को बदले जाने को लेकर 22 जनवरी से विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया था। चूंकि यह साल 2026 का पहला सत्र है इसीलिए परम्परा के मुताबिक सरकार ने गवर्नर को संयुक्त अभिभाषण के लिए आमंत्रित किया था। संसदीय कार्य मंत्री एचके पाटिल ने कहा कि वे राज्यपाल से मुलाकात कर इस बारे में उनसे चर्चा करेंगे। इस बीच एचके पाटिल राज्यपाल से मुलाकात करने कर्नाटक लोक भवन पहुंचे थे लेकिन बात नहीं बनी।
इससे पहले तमिलनाडु और केरल में भी ऐसा ही हुआ। यहां अभिभाषण की भाषा और संवैधानिक भूमिका को लेकर गंभीर विवाद हुए। अब कर्नाटक में भी वैसा ही देखने को मिला है। राज्यपाल ने अपने अभिभाषण के मसौदे में बदलाव की मांग की है। अभिभाषण का मसौदा राज्य सरकार द्वारा तैयार किया जाता है जिसे राज्यपाल विधानसभा के संयुक्त सत्र में पढ़ते हैं। हालांकि राज्यपाल थावर चंद गहलोत के इनकार के पीछे क्या ठोस वजह है इस पर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
बता दें कि केरल विधानसभा में 20 जनवरी को तब एक अभूतपूर्व स्थिति उत्पन्न हो गई, जब मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने सदन में राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर के संबोधन समाप्त करने के तुरंत बाद आरोप लगाया कि उन्होंने राज्य मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित नीतिगत भाषण को पूरी तरह नहीं पढ़ा। विजयन ने कहा कि छोड़े गए अंशों में भाजपा-शासित केंद्र सरकार की राजकोषीय नीति की आलोचना करने वाले हिस्से और राजभवन में लंबित विधेयकों से संबंधित संदर्भ शामिल थे। मुख्यमंत्री विजयन के अनुसार, राज्यपाल ने दस्तावेज के 12वें पैरा का शुरुआती हिस्सा और 15वें पैरा के अंतिम हिस्से को नहीं पढ़ा। उन्होंने कहा कि इसके अलावा, 157 पैरा और 72 पृष्ठों वाले नीतिगत भाषण के 16वें पैरा में राज्यपाल द्वारा एक पंक्ति जोड़ी गई।
विजयन ने सदन को बताया कि जिन अंशों को राज्यपाल ने नहीं पढ़ा, उनमें एक यह था “इन सामाजिक और संस्थागत उपलब्धियों के बावजूद, केरल को केंद्र सरकार की एक के बाद एक प्रतिकूल कार्रवाइयों के कारण गंभीर राजकोषीय दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जो राजकोषीय संघवाद के संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करता है।” उनके अनुसार, राज्यपाल द्वारा नहीं पढ़े गए अन्य अंश यह था “राज्य सदन द्वारा पारित विधेयक लंबे समय तक लंबित रहे हैं। इन मुद्दों पर मेरी सरकार ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया है, जिन्हें संविधान पीठ के पास भेजा गया है।” अर्लेकर द्वारा किए गए जोड़ के संदर्भ में, विजयन ने कहा कि राज्यपाल ने पैराग्राफ 16 के दूसरे हिस्से में “मेरी सरकार मानती है” जोड़ दिया, जो इस प्रकार है- “कर का बंटवारा और वित्त आयोग अनुदान राज्यों का संवैधानिक अधिकार है, यह कोई दान नहीं है और इस जिम्मेदारी से जुड़े संवैधानिक निकायों पर किसी भी तरह का दबाव संघीय सिद्धांतों को कमजोर करता है।”
तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन.रवि ने 20 जनवरी को विधानसभा में द्रमुक सरकार द्वारा तैयार परंपरागत अभिभाषण पढ़ने से इसलिए ‘इनकार’ कर दिया, क्योंकि उसमें कई ‘अप्रमाणित दावे और भ्रामक बयान’ शामिल थे। लोकभवन ने यह दावा किया। राज्यपाल के सदन से बाहर निकलने के तुरंत
बाद विधानसभा में मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन द्वारा पेश एक प्रस्ताव पारित किया
गया, जिसमें कहा गया कि केवल
सरकार द्वारा तैयार परंपरागत अभिभाषण ही आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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