बंगाल की विजय के नायक

(मनीषा-हिफी फीचर)
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पश्चिम बंगाल में तीन विधायकों से शुरुआत करके 206 विधायक 2026 के विधानसभा चुनाव में जुटा लिये हैं। इतना ही नहीं लगातार तीन कार्यकाल पूरे करने वाली ममता बनर्जी अपने गृह क्षेत्र भवानीपुर में पराजित हो गयीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ भाजपा के अन्य नेताओं ने भी इसके लिए अथक प्रयास किया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ब्रांड का वहां स्पष्ट असर भी देखा गया। योगी आदित्यनाथ ने जिन क्षेत्रों में जनसभाएं कीं वहां की तीन दर्जन से अधिक सीटों पर भाजपा को विजयश्री हासिल हुई है। इसके अलावा इस विजय में पर्दे के सामने जितनी मेहनत हुई है उससे कहीं ज्यादा पर्दे के पीछे कवायद की गयी। इसमें भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल की कोर टीम के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रही।
पश्चिम बंगाल में भाजपा की इस बड़ी जीत का श्रेय काफी हद तक भूपेंद्र यादव और सुनील बंसल के संगठन कौशल को जाता है। उत्तर प्रदेश से राष्ट्रीय महासचिव बनाए जाने के बाद ही सुनील बंसल को पश्चिम बंगाल का जिम्मा सौंपा गया था। हालांकि, बंगाल चुनाव में जीत के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश की अपनी पुरानी टीम पर ही भरोसा जताया। पिछले छह महीनों से उत्तर प्रदेश के दर्जनभर भाजपा नेता सुनील बंसल की कोर टीम का हिस्सा रहे और बंगाल के कोने-कोने में चुपचाप काम करते रहे। अब उनकी इस ‘टीम यूपी’ ने भाजपा को बंगाल में जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई है। उत्तर प्रदेश के संगठन की टीम के के कई प्रमुख चेहरे सुनील बंसल के साथ ‘मिशन बंगाल’ में कई महीनों से सक्रिय थे और माइक्रो मैनेजमेंट को मजबूत कर रहे थे। इन नेताओं की जिम्मेदारी हर बूथ पर माइक्रो मैनेजमेंट, डाटा प्लानिंग, बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं के बीच मतभेदों को खत्म करना थी। उत्तर प्रदेश से योगी सरकार के चार मंत्री, एक पूर्व कैबिनेट मंत्री और लगभग 1500 प्रमुख कार्यकर्ता पिछले अक्टूबर से ही बंगाल में डटे हुए थे। माना जा रहा है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी सुनील बंसल को बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। संभावना है कि उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा जाए।
उल्लेखनीय है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान, जब अमित शाह उत्तर प्रदेश के प्रभारी बने थे, तभी उन्होंने पहली बार सुनील बंसल के संगठन कौशल को पहचाना था। उस चुनाव में बंसल ने अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में मिली प्रचंड जीत का श्रेय भी उनके खाते में गया। यहां तक कि 2022 के विधानसभा चुनाव में भी वे भाजपा के संगठन महामंत्री रहे। अब बंगाल की जीत के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि 2027 के चुनाव में भी उन्हें बड़ी भूमिका मिल सकती है।
आठ साल तक संगठन मंत्री और चार साल से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रहते किसी ने इन्हें टीवी डिबेट में नहीं देखा। करीब 12 साल के राजनीतिक सफर में समाचार पत्रों में उनके साक्षात्कार तो दूर बयान तक नहीं छपे। वह भी तब, जब उन्हें उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकसभा और विधानसभा
के दो-दो चुनावों में जीत का शिल्पकार करार दिया गया। गृह मंत्री अमित शाह के बेहद करीबी सुनील बंसल ने
अपनी मौन रणनीति से पूरब में भाजपा के लिए अब तक अभेद्य किला रहे पश्चिम बंगाल को अपनी व्यूह रचना से भेद दिया। वह भी तब, जब करीब दो साल पहले उसी पश्चिम बंगाल में पार्टी को मिली करारी हार के बाद उनकी प्रतिभा और क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे थे।
लोकसभा चुनाव में मिली शिकस्त को बंसल ने चुनौती के रूप में स्वीकार किया। बंग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना को जमीनी स्तर पर मुद्दा बना कर तृणमूल के भोद्रोलोक और बंगाल अस्मिता से जुड़े वोट बैंक को तोड़ने के लिए बांचते चाई- बीजेपी ताई ( जीना है तो भाजपा जरूरी) का नारा गढ़ा जो देखते ही देखते पार्टी का प्रमुख नारा बन गया। जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने के लिए बंसल ने कई प्रयोग किए। इसके लिए 1.65 लाख घर-घर बैठकें आयोजित करने के साथ ही हर विधानसभा में कमल मेलाओं का आयोजन और फुटबॉल मैच आयोजित कराए। इस दौरान हिंसा के कारण वोट देने से वंचित रहने वाले बूथों की पहचान की, जिससे हिंसामुक्त चुनाव में मदद मिली।
बंसल ने ऐसे वर्ग को चिन्हित किया जो बीते कई चुनाव से वोट नहीं डाल पा रहे थे। उनकी टीम का दावा है कि इस चुनाव में करीब 10 फीसद ऐसे मतदाताओं ने वोट डाले जो इससे पहले मतदान केंद्रों तक नहीं पहुंच पाते थे। तृणमूल के ताकतवर महिला वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए उन्होंने संदेशखाली व आरजीकर दुष्कर्म मामले को महिला स्वाभिमान और सम्मान से जोड़ने की सफल रणनीति बनाई।
भाजपा नेताओं के मछली खाने जैसे दृश्य पार्टी को बंगाल अस्मिता से जोड़ने के लिए बंसल की ही बनाई रणनीति थी। इसके साथ ही उन्होंने तृणमूल की सिंडिकेट राजनीति पर भी जमीनी स्तर पर प्रहार की रणनीति तैयार की और सबसे अहम टिकट वितरण में स्थानीय लोगों को तरजीह दी। पश्चिम बंगाल में अब मिली सफलता ने सवालों को
पीछे छोड़ दिया है और राष्ट्रीय राजनीति में बंसल के कद को और बड़ा कर दिया है।
इसी प्रकार संघ के कार्यकर्ता घर-घर जाकर पार्टी के लिए जन समर्थन
जुटा रहे थे और ममता बनर्जी की एक समुदाय के पक्ष में ध्रुवीकरण का कार्य कर रहे थे। आज से 15 साल पहले पश्चिम बंगाल में साढे़ चार सौ के करीब ही संघ की शाखाएं लगती थीं जबकि जनसंघ के संस्थापकों मेें श्यामा प्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल के ही नेता हुआ करते थे। इस बार जब वहां विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब संघ की पांच हजार से अधिक शाखाएं चल रही हैं। इस प्रकार भाजपा की इस विजय में संघ का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत स्वयं संघ की गतिविधियों की समीक्षा कर रहे थे। संघ प्रमुख ने बहुत पहले जनता की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया था।
पश्चिम बंगाल में संगठन और आरएसएस की माइक्रो प्लानिंग ने भारतीय जनता पार्टी की जीत की
जमीन काफी ज्यादा मजबूत की।
खुशी की बात है कि संघ के शताब्दी वर्ष में उसकी राजनीतिक शाखा
भारतीय जनता पार्टी पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने जा रही है। (हिफी)



