हिमंत ने भाजपा का बढ़ाया जनाधार

असम की राजनीति में हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक नया अध्याय जोड़ दिया है। भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत ने न केवल राज्य की सत्ता को मजबूती दी है, बल्कि राजनीतिक विमर्श को भी नई दिशा दी है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस जीत को “अभूतपूर्व” बताते हुए इसे जनता के विश्वास का परिणाम बताया। राज्य की 126 सदस्यीय विधानसभा में 102 सीटों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत यह संकेत देती है कि असम में भाजपा की पकड़ लगातार मजबूत हो रही है।
यह जीत सामान्य नहीं थी। पिछली बार 2021 के चुनावों में जहां भाजपा को 60 सीटें मिली थीं, वहीं इस बार उसने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 102 सीटों का आंकड़ा छू लिया। यह केवल संख्या में वृद्धि नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव और जनसमर्थन का विस्तार भी है। हिमंत बिस्वा सरमा ने स्पष्ट कहा कि यह परिणाम आसान नहीं था और इसके पीछे सरकार के कामकाज और लोगों का भरोसा दोनों शामिल हैं।
चुनावी जीत के साथ ही राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री ने कांग्रेस नेता गौरव गोगोई पर तीखा हमला करते हुए कहा कि भाजपा ने उन्हें “ब्याज सहित जवाब दिया है।” जोरहाट सीट से गौरव गोगोई की हार, जहां उन्हें भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने 23,000 से अधिक वोटों से हराया, कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।
इस हार के पीछे केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हिमंत बिस्वा सरमा ने बार-बार गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न के कथित पाकिस्तान संबंधों को मुद्दा बनाया। राज्य सरकार द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने भी इन आरोपों की जांच की, जिसमें “चैंकाने वाले तथ्यों” का दावा किया गया। हालांकि, इन आरोपों की सत्यता और उनके राजनीतिक प्रभाव पर बहस जारी है।
मुख्यमंत्री ने विपक्ष द्वारा लगाए गए चुनावी गड़बड़ी के आरोपों को भी सिरे से खारिज किया। उनका कहना था कि “वोट चोरी” जैसे आरोप केवल उन राज्यों में लगाए जाते हैं जहां भाजपा जीतती है। उन्होंने सवाल उठाया कि केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में इस तरह के आरोप क्यों नहीं सुनाई देते। यह बयान इस बात को दर्शाता है कि चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास और अविश्वास की राजनीति अब राष्ट्रीय स्तर पर भी एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
असम के राजनीतिक परिदृश्य में एक और महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है- धार्मिक और जातीय राजनीति से आगे बढ़ने का दावा। हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि असम अब “एक समुदाय के रूप में वोट करता है” और भाजपा को हिंदू तथा मुस्लिम दोनों समुदायों का समर्थन मिला है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस की बची हुई सीटें मुख्यतः मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से आई हैं, जो इस दावे को एक जटिल आयाम देता है।
भाजपा की इस जीत का एक कारण उसकी चुनावी रणनीति और संगठनात्मक मजबूती भी है। मुख्यमंत्री ने चुनाव को “त्योहार” बताते हुए
कहा कि असम में लोकतंत्र को उत्सव की तरह मनाया जाता है। यह दृष्टिकोण मतदाताओं को जोड़ने और राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने में सहायक रहा है।
इसके साथ ही, मुख्यमंत्री ने अपने और पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल के बीच अच्छे संबंधों का भी जिक्र किया। यह भाजपा के भीतर नेतृत्व की एकजुटता को दर्शाता है, जो अक्सर अन्य दलों में देखने को नहीं मिलती।
पश्चिम बंगाल के संदर्भ में भी हिमंत बिस्वा सरमा ने टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वहां के लोग लंबे समय से भाजपा को वोट देना चाहते थे, लेकिन डर के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे थे। हालांकि, इस दावे के समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है, फिर भी यह बयान भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति को दर्शाता है।
अंततः, असम चुनाव परिणाम केवल एक राज्य की जीत-हार की कहानी नहीं हैं। यह भारतीय राजनीति में बदलते रुझानों, मतदाताओं की प्राथमिकताओं और राजनीतिक दलों की रणनीतियों का प्रतिबिंब है। भाजपा की लगातार तीसरी जीत यह संकेत देती है कि उसने राज्य में एक स्थायी राजनीतिक आधार बना लिया है।
हालांकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विपक्ष अपनी कमजोरियों का विश्लेषण करे और मजबूत विकल्प के रूप में उभरे। लोकतंत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा आवश्यक होती है, और एक मजबूत विपक्ष ही सत्ता को जवाबदेह बनाता है।
असम की जनता ने इस चुनाव में जो जनादेश दिया है, वह स्पष्ट और निर्णायक है। अब यह जिम्मेदारी सरकार की है कि वह अपने वादों को पूरा करे और जनता के विश्वास को बनाए रखे। यदि ऐसा होता है, तो यह जीत केवल राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि सुशासन का उदाहरण भी बन सकती है।(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



