यूएनएससी सदस्यता अभियान

भारत ने वर्ष 2028-29 के कार्यकाल के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) की गैर-स्थायी सदस्यता हासिल करने के उद्देश्य से अपना आधिकारिक चुनाव अभियान शुरू कर दिया है। इस अवसर पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में भारत की शांति स्थापना में भूमिका, विकासशील देशों के साथ साझेदारी, नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता और बहुपक्षवाद में विश्वास को रेखांकित किया। भारत का यह अभियान ऐसे समय में शुरू हुआ है जब दुनिया कई भू-राजनीतिक संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रही है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा कि भारत का उद्देश्य केवल सुरक्षा परिषद की सदस्यता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि सभी देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रभावी ढंग से उठाना भी है। उन्होंने कहा कि भारत एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करता रहा है। यही कारण है कि भारत आज विश्व समुदाय के बीच एक विश्वसनीय और संतुलित साझेदार के रूप में उभरकर सामने आया है।
भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य पहले भी कई बार रह चुका है। हाल ही में वर्ष 2021-22 के दौरान भारत ने परिषद की गैर-स्थायी सदस्यता निभाई थी। उस कार्यकाल में भारत ने समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग, शांति स्थापना अभियानों में सुधार और विकासशील देशों के हितों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। अब 2028-29 के लिए शुरू किया गया अभियान भारत की उसी सक्रिय भूमिका को आगे बढ़ाने का प्रयास माना जा रहा है।
विदेश मंत्री ने भारत के संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों में योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पिछले सात दशकों में भारत ने 2.9 लाख से अधिक सैनिक और पुलिसकर्मी विभिन्न संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में भेजे हैं। भारतीय शांति सैनिकों ने अफ्रीका, एशिया और अन्य संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शांति बहाल करने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और मानवीय सहायता पहुंचाने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। अनेक भारतीय सैनिकों ने संयुक्त राष्ट्र के मिशनों के दौरान सर्वोच्च बलिदान भी दिया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने हमेशा सम्मान की दृष्टि से देखा है।
जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत का विकास मॉडल केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। भारत ने एशिया, अफ्रीका, प्रशांत द्वीप देशों और लैटिन अमेरिका के कई देशों के साथ विकास साझेदारी को मजबूत किया है। क्षमता निर्माण, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, कृषि और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भारत ने अनेक विकासशील देशों को तकनीकी और वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराया है। कोविड-19 महामारी के दौरान वैक्सीन मैत्री पहल के माध्यम से भारत ने दर्जनों देशों को टीके और आवश्यक दवाइयां उपलब्ध कराकर अपनी वैश्विक जिम्मेदारी का परिचय दिया था।
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की मांग करता रहा है। वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों को दर्शाती है, जबकि आज की वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक वास्तविकताएं काफी बदल चुकी हैं। भारत का तर्क है कि दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले लोकतांत्रिक देश, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को परिषद में पर्याप्त स्थान मिलना चाहिए। इसी उद्देश्य से भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार की भी वकालत करता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति, वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी विश्वसनीय भूमिका इस चुनाव अभियान को मजबूती प्रदान कर सकती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने जी-20 की अध्यक्षता, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन और वैश्विक दक्षिण शिखर सम्मेलन जैसी पहलों के माध्यम से अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया है। इससे अनेक देशों के साथ उसके संबंध और अधिक मजबूत हुए हैं।
हालांकि सुरक्षा परिषद की गैर-स्थायी सदस्यता का चुनाव भी आसान नहीं माना जाता। संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य देशों का व्यापक समर्थन प्राप्त करना आवश्यक होता है। इसलिए भारत आने वाले महीनों और वर्षों में विभिन्न देशों के साथ अपने कूटनीतिक संपर्क और सहयोग को और मजबूत करेगा। विकास सहयोग, आर्थिक साझेदारी और बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी इस अभियान के महत्वपूर्ण आधार होंगे।
भारत की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य एक ऐसे वैश्विक वातावरण का निर्माण करना है जिसमें संवाद, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता हो। आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट और तकनीकी असमानता जैसे मुद्दों पर भारत लगातार वैश्विक सहयोग की आवश्यकता पर बल देता रहा है। यदि भारत एक बार फिर सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य चुना जाता है, तो इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने की उसकी क्षमता और बढ़ेगी।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि भारत की विदेश नीति का मूल मंत्र वसुधैव कुटुंबकम् की भावना पर आधारित है। भारत का मानना है कि विश्व की जटिल चुनौतियों का समाधान किसी एक देश द्वारा नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयासों और साझेदारी के माध्यम से ही संभव है। यही सोच भारत को बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में निरंतर सक्रिय बनाए हुए है।
भारत द्वारा 2028-29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की गैर-स्थायी सदस्यता का चुनाव अभियान शुरू करना केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में अपनी बढ़ती भूमिका को रेखांकित करने का प्रयास भी है। यदि भारत इस चुनाव में सफल होता है, तो उसे वैश्विक शांति, सुरक्षा, विकास और बहुपक्षीय सहयोग से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर एक बार फिर प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा। यह अभियान भारत की उस व्यापक विदेश नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य एक अधिक न्यायसंगत, समावेशी और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में सक्रिय योगदान देना है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



