ममता का चुनावी खेला

ममता बनर्जी राजनीति में पुख्ता किलेबंदी करती हैं। उनको यह अंदाजा हो चुका था कि चुनाव आयोग कभी भी राज्य विधानसभा चुनावों की घोषणा कर सकता है। चुनाव की तारीखें घोषित होते ही आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती है। इसलिए ममता बनर्जी ने 15 मार्च को विधानसभा चुनाव की तारीेख घोषित होने से पहले ही राज्य में पुरोहितों और मुअज्जिनों के मासिक मानदेय में पांच सौ रुपये की बढ़ोत्तरी कर दी है। दरअसल राज्य के अनुपूरक बजट में महिलाओं के लिए आर्थिक घोषणा की गयी थी। उसी समय मुअज्जिनों ने शिकायत दर्ज करायी थी कि उनको मिलने वाला मानदेय बहुत कम है, उसे बढ़ाया जाना चाहिए। ममता बनर्जी की सरकार पर अल्पसंख्यकों का पक्ष लेने का आरोप भाजपा काफी पहले से लगा रही है। अब यदि केवल मुअज्जिनों का मानदेय बढ़ाया जाता तो भाजपा का आरोप पुख्ता हो जाता और विधानसभा चुनाव में इसे जोर-शोर से उठाया भी जाता। इसलिए ममता बनर्जी की सरकार ने पुरोहितों का मानदेय भी बढ़ा दिया है और पुरोहितों के मानदेय बढ़ाने का भाजपा विरोध नहीं कर पाएगी। इस बढ़ोत्तरी के साथ पुरोहितों और मुआजिनों को प्रतिमाह 2000 रुपए मिलेंगे। हालांकि यह बात चुनाव आयोग की नोटिस मंे भी आ गयी है। पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान कराया जाएगा। भारत के निर्वाचन आयोग के अनुसार असम, केरल और पाण्डुचेरी में एक ही दिन 9 अप्रैल को चुनाव होंगे जबकि तमिलनाडु में 23 अप्रैल को और पश्चिम बंगाल में 23 व 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होगा। सभी चुनावों की मतगणना 4 मई को करायी जाएगी। पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटों पर मतदान होगा और 148 विधायक जीतने वाले की सरकार बन जाएगी। वर्ष 2021 में ममता बनर्जी की पार्टी ने 215 सीटों पर विजय हासिल की थी, जबकि भाजपा को 77 विधायक ही मिल पाये थे।
पश्चिम बंगाल में चुनाव की तारीखों का एलान होते ही सियासी माहौल अचानक गर्म हो गया है। यहां 23 और 29 अप्रैल को वोट डाले जाएंगे और 4 मई को परिणाम आएंगे। इस बार सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि चुनाव सिर्फ दो चरणों में कराए जाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि इस फैसले से सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को भी राहत मिली है और विपक्षी बीजेपी को भी मौका दिखाई दे रहा है। दोनों पार्टियां अपने-अपने हिसाब से इस फैसले को अपने पक्ष में मान रही हैं।
दरअसल, बंगाल की राजनीति में लंबे समय से चुनाव के चरणों को लेकर विवाद होता रहा है। पिछले चुनाव में 7-8 चरणों में मतदान हुआ था, जिसे लेकर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने कड़ा विरोध किया था। टीएमसी का तर्क था कि इतने लंबे चुनाव से प्रशासनिक दबाव बढ़ता है, राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण होता है और केंद्रीय बलों की तैनाती भी असामान्य रूप से लंबी हो जाती है। लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने मतदान को सिर्फ दो चरणों में सीमित कर दिया है। टीएमसी के लिए इस चुनावी ढांचे में कई ऐसी बातें हैं जो पार्टी को राहत देती दिख रही हैं। पहला, पार्टी को अब यह डर नहीं है कि चुनाव लंबा खिंचेगा और हर चरण के साथ राजनीतिक तापमान बढ़ेगा। टीएमसी हमेशा से लंबे चुनाव के खिलाफ रही है। दूसरा, पिछले चुनाव में एक बड़ा विवाद यह भी था कि उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल की सीटों को अलग-अलग तरीके से चरणों में बांटा गया था, जिससे चुनावी प्रभाव को लेकर कई तरह की राजनीतिक व्याख्याएं सामने आई थीं। पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों पर दो चरणों में वोट डाले जाएंगे। पहले चरण में 152 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होगा। वहीं, दूसरे चरण में 142 सीटों पर 29 अप्रैल को मतदान होगा, जबकि चुनाव के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने के लिए किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन को कुल 294 सीटों में से कम से कम 148 सीटों की आवश्यकता होती है। यह सदन की कुल सदस्य संख्या का आधा से एक अधिक है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान होने के साथ ही आईएएनएस-मैटराइज का ओपिनियन पोल भी आ गया है। ओपिनियन पोल में पश्चिम बंगाल में किसके सिर पर सत्ता का ताज सजेगा, इसको लेकर राज्य की जनता की राय ली गई है। ओपिनियन पोल के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में लगातार चैथी बार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सत्ता पर काबिज होने का अनुमान जताया गया है। वहीं, भाजपा के पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार ज्यादा सीटें जीतने के आसार ओपिनियन पोल में जताए गए हैं। आईएएनएस-मैटराइज के ओपिनियन पोल के अनुसार, पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से ममता बनर्जी की टीएमसी के 155 से 170 सीटें जीतने का अनुमान लगाया गया है। इसके अलावा, भाजपा के 100 से 115 सीटें जीतने का दावा इस पोल में किया गया है। वहीं, अन्य के खाते में 5 से 7 सीटें आ सकती हैं।
चुनावी तारीखों की घोषणा के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ने पत्रकारों के सवालों के जवाब दिए। इस दौरान चुनाव आयोग से फ्रीबीज (मुफ्त की रेवड़ियां) को लेकर सवाल किया गया। इस सवाल पर चुनाव आयोग ने कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद से सभी राज्यों में आचार संहिता लागू हो गई है। इससे पहले की गई कोई भी घोषणा राज्य सरकार का निर्णय है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, सबसे पहले मैं यह क्लियर करना चाहता हूं कि आदर्श आचार संहिता चुनावी तारीखों की घोषणा के बाद अब लागू हुई है। इसी प्रेस कॉफ्रेंस में फ्रीबीज से जुड़े एक अन्य सवाल के जवाब में सीईसी ने कहा, लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य और केंद्र सरकार को इस बात की पूरी आजादी है कि वो आचार संहिता की घोषणा से पहले कोई भी नीति बना सकते हैं, घोषणाएं कर सकते हैं लेकिन आचार संहिता लागू होने के बाद किसी भी तरह की घोषणा नहीं होती है। ममता बनर्जी ने मानदेय और बकाया डीए के भुगतान की घोषणा की है।
मालूम हो कि 15 मार्च को शाम 4 बजे शुरू हुए प्रेस कॉफ्रेंस में बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई। इससे करीब एक घंटे पहले ममता बनर्जी ने पुरोहितों और मुअज्जिनों के मासिक मानदेय में रु. 500 की वृद्धि की है। साथ ही उन्होंने राज्यकर्मियों के बकाया डीए के भुगतान की भी घोषणा की। पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों की चुनावी तारीखों के ऐलान से पहले सीएम ममता बनर्जी ने गजब दांव खेला है। सीएम ने घोषणा करते हुए बताया कि मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि हमने अपने पुरोहितों और मुअज्जिनों के मासिक मानदेय में घ्500 की वृद्धि की है। ममता ने कहा उनकी सेवाएं हमारे समाज और समुदायों के आध्यात्मिक जीवन को मजबूती देती हैं। इस संशोधन के बाद अब उन्हें रु. 2,000 प्रति माह दिए जाएंगे।साथ ही पुरोहितों और मुअज्जिनों की ओर से जमा किए गए सभी नए आवेदन भी राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत कर दिए गए हैं। ममता ने कहा हम इस बात पर गर्व करते हैं कि हम ऐसा वातावरण बना रहे हैं जहां हर समुदाय और हर परंपरा का सम्मान और सशक्तिकरण हो।हमारा प्रयास है कि हमारी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संरक्षकों को वह पहचान और सहयोग मिले जिसके वे हकदार हैं। ममता ने जो चुनावी खेल खेला है, उससे चुनाव आयोग भी फिलहाल चित दिख रहा है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



