ईंधन के लिए भारत की तरफ निहार रहे नेपाल व श्रीलंका

ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से पैदा हुए ऊर्जा संकट ने भारत के पड़ोसी देशों को नई दिल्ली की ओर देखने पर मजबूर कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं और मिडिल ईस्ट से सप्लाई बाधित होने के कारण दक्षिण एशिया के कई देशों में ईंधन की किल्लत गहरा रही है। ऐसे हालात में भारत एक भरोसेमंद सप्लायर और संकटमोचक के रूप में उभरता दिख रहा है, हालांकि सरकार ने साफ किया है कि किसी भी मदद का फैसला घरेलू जरूरतों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।
नेपाल, जो अपनी एलपीजी जरूरतों के लिए लगभग पूरी तरह भारत पर निर्भर है, ने इंडियन ऑयल से अतिरिक्त सप्लाई की मांग की है। फिलहाल उसे हर महीने करीब 48,000 टन गैस मिलती है, लेकिन संकट को देखते हुए उसने 3,000 टन बढ़ाने की अपील की है। हालांकि भारत अभी कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक ही सप्लाई कर रहा है। उधर, नेपाल में स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि सरकार ने गैस की राशनिंग शुरू कर दी है और उपभोक्ताओं को आधा सिलेंडर भरने का फैसला लिया गया है, ताकि मौजूदा स्टॉक ज्यादा समय तक चल सके।
इसी प्रकार श्रीलंका के मामले में भारत ने सक्रिय भूमिका निभाते हुए 38,000 मीट्रिक टन पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति की है। यह कदम प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके के बीच बातचीत के बाद उठाया गया। मिडिल ईस्ट के सप्लायरों द्वारा फोर्स मेज्योर लागू करने के बाद श्रीलंका के सामने ईंधन संकट खड़ा हो गया था। हालात ऐसे हैं कि वहां स्कूल, कॉलेज और कई सरकारी संस्थान बंद करने पड़े हैं, ट्रांसपोर्ट सेवाएं सीमित कर दी गई हैं और ईंधन बचाने के लिए हर हफ्ते एक दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है। इस मदद के लिए श्रीलंका ने खुलकर भारत की ‘पड़ोसी फस्र्ट’ नीति की सराहना की है।



