चन्द्रमुखी बसु एक महान शिक्षाविद

देश की जुनूनी महिलाओं की श्रृंखला में हमने इससे पहले महाराष्ट्र की रख्माबाई राउत के बारे मंे बताया था। आज हम चन्द्रमुखी बसु के जीवन की कहानी और उनके संघर्ष को समझेंगे।
चन्द्रमुखी बसु 1860 में देहरादून के एक बंगाली परिवार में जो मूलरूप से ईसाई धर्म को मानने वाले थे जन्मी थीं। उन्होंने सन् 1882 कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक यानी बी.एस. आॅनर्स की परीक्षा पास की थी। वे उस समय ब्रिटिश भारत की पहली दो महिला स्नातकों में से एक थीं। उनके साथ कादम्बिनी गांगुली भी स्नातक हुई थीं। विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में 1883 में उन्हें ये कला में स्नातक की उपाधियाँ दी गई थीं। उनके पिता का नाम भुवन मोहन बोस था।
उस समय का बेथ्यून स्कूल जिसमें वे प्रवेश लेना चाहती थीं, में लड़कियों का प्रवेश स्वीकार नहीं था। उन्होंने अपने पढ़ने के प्रति जुनून से वहाँ प्रवेश भी लिया और ब्रिटिश साम्राज्य की पहली भारतीय परास्नातक महिला तो कहलाईं ही साथ ही उसी काॅलेज के प्रधानाचार्य के पद तक भी पहुंची। यह वह समय था जब कलकत्ता विश्वविद्यालय में महिलाओं के लिये प्रवेश की स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। चन्द्रमुखी ने इसी व्यवस्था को चुनौती दी थी। उस समय समाज का बुद्धिजीवी वर्ग भी इसे भेदभाव नहीं मानता था। इसीलिए चन्द्रमुखी जैसी प्रज्ञावान और साहसी महिलाओं को उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ लड़ना पड़ता था। जो इन्हीं तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा ही रची गई थी। चन्द्रमुखी ने इसी व्यवस्था को चुनौती दी थी। काॅलेज के नियमों में लिखा था कि, किसी भी पर्सन को’ (इन्सान को) प्रवेश दिया जा सकता है बशर्ते वह उपयुक्त नम्बर ले आए। इसके बावजूद कुछ लोग थे जो चन्द्रमुखी का प्रवेश नहीं चाहते थे। लेकिन वे नियम विरुद्ध थे अन्ततः चन्द्रमुखी को प्रवेश देने के लिए उन्हें बाध्य होना पड़ा।
चन्द्रमुखी और उनकी मित्र कादम्बिनी के उच्च शिक्षा ग्रहण करने की लगन की वजह से शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं के लिए नये द्वार खुल गये। सन् 1891 में कुछ ब्रिटिश के लिए नये द्वार खुल गये। सन! 1891 में कुछ ब्रिटिश महिलाओं ने मिलकर एक महिला समिति की स्थापना की। एक स्कूल भी खोला गया था, परन्तु वहाँ भारतीय लड़कियों के प्रवेश पर पाबन्दी थी और इस कारण मात्र ब्रिटिश परिवारों की लड़कियाँ ही वहाँ पढ़ सकती थीं। एक समस्या यह भी थी कि भारतीय समाज के लोग ईसाइयों के स्कूल में हिन्दू लड़कियों को भेजने को धर्म की हानि समझते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतीय छात्रों के लिए कुछ हिन्दू स्कूल ज़रूर खुलवाये। लेकिन लड़कियों के लिए फिर भी कोई कारगर व्यवस्था नहीं हो पायी थी। यह काम आगे चलकर ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और तत्कालीन शिक्षा सचिव बेथ्यून ने अपने जिम्मे ले लिया।
1878 में विश्वविद्यालय के बदले हुये संकल्प के कारण चन्द्रमुखी को आगे की पढ़ाई करने की अनुमति मिल गई। जब उन्होंने एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की तो कादम्बिनी गांगुली को इस नियम का लाभ मिला। यद्यपि चन्द्रमुखी इस परीक्षा को दो वर्ष पूर्व ही पास कर चुकी थीं पर वह उसके लाभ से वंचित रहीं और पहली ग्रेजुएट महिला का खिताब कादम्बिनी गांगुली को मिल गया।
बाद में अनेक शोधकर्ताओं ने साबित किया कि चन्द्रमुखी बोस ने विश्वविद्यालय की इस परीक्षा को पहले ही पास कर लिया था। काफी बहस के बाद आखिरकार इस भूल को सुधारा गया और चन्द्रमुखी बोस के नाम का पूर्व तिथि का ही 2013 में प्रमाण पत्र जारी किया। इस प्रकार वह कादम्बिनी गांगुली से 15 माह पूर्व पास होने वाली पहली ग्रेजुएट महिला मानी गईं।
चन्द्रमुखी को सन् 1883 में विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह के दौरान औपचारिक डिग्री सौंपी गई थी। इसीलिए 13 मार्च सन् 1883को वहाँ के एक प्रमुख समाचार पत्र ‘द इंग्लिश मैन’ में दो हिन्दू मूल की लड़कियों को डिग्री दिये जाने के समाचार को बहुत विस्तार से प्रकाशित हुआ था। इस ऐतिहासिक दीक्षान्त समारोह की यह घटना काफी समय तक चर्चा का विषय बनी। चन्द्रमुखी 1884 में एम.ए. की परीक्षा पास करके ब्रिटिश साम्राज्य की प्रथम पोस्ट ग्रेजुएट महिला बनी। उस समय के प्रमुख समाज सुधारक ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने उनका सम्मान किया था। इसके बाद उन्होंने बेथ्यून काॅलेज में सहायक लेडी सुपरिण्टेडेण्ट के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की। वे आगे चलकर उसी काॅलेज की प्रधानाचार्या बनीं। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसा वातावरण सृजित किया जिससे ज्यादा से ज्यादा लड़कियाँ शिक्षित हो सकें। उन्होंने उन्नीसवीं सदी के रूढ़िवादी बंगाली समाज की कठिन परिस्थितियों और उनके विरोध का प्रतिरोध करते हुए भी लड़कियों के लिए अपने काॅलेज के द्वार खोल दिये। कहते हैं उनके समय में जितनी अधिक लड़कियों ने उच्च शिक्षा ग्रहण की और उसमें रुचि दिखाई ऐसा फिर अनेक वर्षों तक नहीं हुआ।
लगातार तनाव में रहकर अधिक कार्य करते रहने और तनाव के कारण चन्द्रमुखी का स्वास्थ्य खराब रहने लगा था तब उन्होंने 11 अक्टूबर सन् 1901 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। उनके त्यागपत्र पर ‘इण्डियन मैसेंजर’ अखबार ने दुःख प्रकट करते हुये ‘स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को न भुलाई जाने वाली घटना’ बताया था। त्यागपत्र देने के बाद वे फिर से देहरादून चली गईं जहाँ उनका स्वास्थ्य बेहतर होने लगा। सन् 1903 में पण्डित केशवानन्द के साथ उन्होंने गृहस्थ जीवन शुरू किया। बाद में वे चन्द्रमुखी मामगेन के नाम से जानी गईं। 1929 में उनके पति का देहान्त हो गया। उसके बाद बच्चों और परिवार की सारी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई थी। उनके सौतेले बेटे भी थे जिनको उन्होंने वास्तविक मां की तरह ही स्नेह दिया। उनके बच्चे इस बात की सराहना करते थे। अन्तिम समय में वे बहुत कमजोर हो गई थीं। उनके बेटो ने उनकी बहुत अच्छी देखभाल की थी। अन्ततः 3 फरवरी 1944 को देहरादून में ही इस महान शिक्षाविद् का निधन हो गया।
(कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)



