लेखक की कलम

उम्मीद और निराशा का दौर

अमेरिका ने पांच दिन के लिए युद्ध रोकने की घोषणा की तो ईरान ने तेल अबीब पर मिसाइलें दागीं। मध्य पूर्व में तनाव के बीच हालात इस ओर इशारा कर कर रहे हैं कि अब मिसाइल अटैक थमने को तैयार हैं। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच हालिया तनाव में आया यह अल्पविराम महज एक रणनीतिक ठहराव नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन के लिए एक निर्णायक अवसर है। पिछले 24 दिनों से इजरायल अमेरिका और ईरान के बीच जारी भयंकर युद्ध के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा पांच दिन के लिए युद्ध विराम की घोषणा करना निःसंदेह वैश्विक स्तर पर एक राहत देने वाली खबर हैं। युद्ध जैसे विनाशकारी परिदृश्य में जब भी संवाद और विराम की संभावना बनती है, वह केवल संबंधित देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए आशा की किरण लेकर आती है। अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई को अस्थायी रूप से रोकने का निर्णय एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा सकता है। इसमें कोई दोमत नहीं है कि अमेरिका और ईरान के बीच संभावित बातचीत और सीमित समय के लिए सैन्य कार्रवाई रोकने के संकेत ने वैश्विक स्तर पर उम्मीद की एक नई किरण जगाई है। इसका कारण है कि यह केवल दो देशों के बीच टकराव का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, राजनीति और मानवता पर पड़ रहा है।
विकासशील देशों के लिए यह संकट और गहरा है, जहां महंगाई पहले ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है। ऐसे में यह युद्ध केवल तीन देशों का मसला नहीं, बल्कि पूरी मानवता के आर्थिक और सामाजिक संतुलन का प्रश्न बन चुका है। सामरिक दृष्टि से देखा जाए तो अमेरिका और इजराइल ने ईरान की सैन्य क्षमताओं को गहरी चोट पहुंचाई है। उसके पूरे नेतृत्व को खत्म कर दिया। ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों और आधारभूत ढांचे को ध्वस्त कर ईरान को करीब 20 से 25 साल पीछे धकेल दिया है।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमले को अस्थायी रूप से टालने का निर्णय, भले ही पांच दिनों के लिए हो, एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत है। यह दिखाता है कि युद्ध के बीच भी बातचीत की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हालांकि, इस निर्णय को लेकर कई सवाल भी उठते हैं, खासकर तब जब ईरान ने किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बातचीत से इनकार किया है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि स्थिति अभी भी अनिश्चितताओं से भरी हुई है। इस संघर्ष की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। माना जा रहा है कि अमेरिका ने काफी मजबूरी में युद्ध विराम का फैसला लिया है। अमेरिका शुरुआती रणनीति में यह मानकर चला था कि सीमित सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान के भीतर जन असंतोष उभरेगा और सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होगा लेकिन यह आकलन गलत साबित हुआ। न तो जनता सड़कों पर उतरी और न ही सत्ता संरचना में कोई तत्काल बदलाव आया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि बाहरी हस्तक्षेप के आधार पर किसी देश की आंतरिक राजनीति को बदलना इतना आसान नहीं है।
युद्ध को आगे बढ़ाने का विकल्प अमेरिका के सामने था, लेकिन इसके साथ कई गंभीर जोखिम जुड़े थे। अफगानिस्तान और इराक के अनुभव पहले से ही अमेरिका के सामने हैं, जहां लंबे सैन्य अभियानों ने न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक रूप से भी भारी कीमत वसूल की। इस पूरे घटनाक्रम में खाड़ी देशों की भूमिका भी अहम रही है। ओमान, कतर और सऊदी अरब जैसे देशों ने स्पष्ट संकेत दिए कि वे इस संघर्ष के विस्तार के पक्ष में नहीं हैं। उनके लिए यह युद्ध आर्थिक और सामरिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है। यदि ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर हमला होता, तो जवाबी कार्रवाई में खाड़ी क्षेत्र के तेल और गैस संसाधन भी निशाने पर आ सकते थे। इससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ता। होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा भी इस संघर्ष के केंद्र में है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मागों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यदि यहां तनाव बढ़ता है या मार्ग पूरी तरह से अवरुद्ध होता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। यही कारण है कि सैन्य विशेषज्ञों ने भी इस क्षेत्र में युद्धपोत भेजने के जोखिमों को लेकर चेतावनी दी है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो इस संघर्ष ने पहले ही वैश्विक बाजारों को झकझोर दिया है। तेल की कीमतों में तेजी, गैस की कीमतों में उछाल और शेयर बाजारों में अस्थिरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता।
भारत जैसे देशों के लिए, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, इसका सीधा असर महंगाई और आर्थिक विकास पर पड़ता है। हालांकि, जैसे ही युद्धविराम की संभावना सामने आई, बाजारों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। तेल की कीमतों में गिरावट और शेयर बाजारों में तेजी यह दर्शाती है कि निवेशक और वैश्विक अर्थव्यवस्था स्थिरता की उम्मीद कर रहे हैं। यह एक संकेत है कि शांति केवल मानवीय दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी अनिवार्य है। फिर भी, यह समझना जरूरी है कि यह पांच दिनों का युद्धविराम एक स्थायी समाधान नहीं है। ट्रंप द्वारा ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमले टालने का निर्णय इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह फैसला दर्शाता है कि कूटनीति की खिड़की अभी बंद नहीं हुई है। पांच दिनों का यह ठहराव केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि संवाद के लिए एक संभावित दरवाजा है। हालांकि,ईरान द्वारा किसी भी बातचीत से इनकार और अपनी शर्तों पर अड़े रहना यह बताता है कि रास्ता अभी आसान नहीं है। ईरान की ओर से रखी गई शर्तें,अमेरिकी सैन्य ठिकानों का बंद होना, होर्मुज जलडमरूमध्य के लिए नए नियम और मीडिया से जुड़े व्यक्तियों पर कार्रवाई स्पष्ट रूप से उसकी रणनीतिक सोच को दर्शाती हैं। यह केवल युद्धविराम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश है। दूसरी ओर, अमेरिका और उसके सहयोगी इन शर्तों को स्वीकार करने की स्थिति में शायद ही हों। ऐसे में गतिरोध की स्थिति बनना स्वाभाविक है। फिर भी, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि तनाव कम होते ही तेल की कीमतों में गिरावट आई है। अब समय आ गया है कि युद्ध की भाषा को छोड़कर बातचीत की भाषा अपनाई जाए। युद्ध विराम इतिहास के पन्नों में एक निर्णायक मोड़ बन सकता है, बशर्ते इसे समझदारी और दूरदृष्टि के साथ पूर्ण विराम में बदला जाए।
मानवता के दृष्टिकोण से देखें तो युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को होता है। चाहे वह ईरान हो, इजरायल हो या कोई अन्य देश युद्ध की कीमत हमेशा निर्दोष नागरिकों को चुकानी पड़ती है। ऐसे में हर वह कदम, जो युद्ध को रोकने की दिशा में उठाया जाता है, स्वागत योग्य है। (मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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