तेल संकट पर भारत की कूटनीति

पश्चिम एशिया में जारी ईरान-अमेरिका तनाव और पर्शियन गल्फ में बढ़ते सैन्य संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। ऐसे कठिन समय में भारत ने न केवल अपनी कूटनीतिक सक्रियता दिखाई है, बल्कि नौसैनिक रणनीति के जरिए अपने हितों की रक्षा करने का स्पष्ट संदेश भी दिया है। हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात से दो एलपीजी टैंकर-एमवी जग वसंत और एमवी पाइन गैस-भारत के लिए रवाना हुए हैं। ये दोनों जहाज ईरान की अनुमति मिलने के बाद संवेदनशील हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर चुके हैं। इन टैंकरों में कुल लगभग 92,000 मीट्रिक टन एलपीजी लदी हुई है, जो भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगी। इनमें सवार भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, क्योंकि पूरे क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों का खतरा लगातार बना हुआ है। इसी के साथ, सऊदी अरब से एक कच्चे तेल का टैंकर-एमटी कालिस्टा भी भारत के लिए रवाना होने की तैयारी में है, जो ओडिशा के पारादीप बंदरगाह पहुंचेगा। यह कदम इस बात का संकेत है कि भारत वैकल्पिक आपूर्ति लाइनों को सक्रिय कर रहा है ताकि ऊर्जा आपूर्ति में किसी प्रकार की बाधा न आए।
इस पूरे ऑपरेशन में भारतीय नौसेना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश त्रिपाठी के नेतृत्व में नौसेना ने खाड़ी क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा दी है। भारतीय युद्धपोत ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी में तैनात किए गए हैं, जो भारतीय जहाजों को एस्कॉर्ट प्रदान कर रहे हैं। हालांकि, ईरान की ओर से भारतीय युद्धपोतों को हॉर्मुज जलडमरूमध्य के भीतर एस्कॉर्ट की अनुमति नहीं दी गई है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नौसेना प्रमुख दिनेश त्रिपाठी को अपनी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की आधिकारिक यात्रा रद्द करनी पड़ी। यह निर्णय इस बात को दर्शाता है कि भारत के लिए इस समय ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बन चुकी है।
इस संकट के बीच एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत ने ईरान को किसी भी प्रकार का अतिरिक्त शुल्क नहीं दिया है, जबकि ऐसी खबरें सामने आ रही थीं कि कुछ जहाजों से भारी ट्रांजिट फीस वसूली जा रही है। ईरान ने भी आधिकारिक तौर पर इन खबरों का खंडन किया है। कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष का असर नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति का हिस्सा बन चुका है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, उन्हें ऐसे संकटों से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनानी पड़ रही है जिसमें कूटनीति, सैन्य शक्ति और आर्थिक योजना, तीनों शामिल हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह संकट और गहराता है या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई समाधान निकलता है।
यह अच्छी बात है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर हलचल तेज हो गई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दी गई समयसीमा को आगे बढ़ाने के फैसले ने संभावित सैन्य टकराव को फिलहाल टाल दिया है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर इसका गहरा असर पड़ रहा है। ट्रंप ने पहले ईरान को चेतावनी दी थी कि यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह नहीं खोला गया, तो अमेरिका ईरान के पावर प्लांट्स पर हमला कर सकता है। लेकिन अब उन्होंने पांच दिनों की अतिरिक्त मोहलत देकर संकेत दिया है कि अमेरिका सैन्य कार्रवाई से पहले कूटनीतिक रास्ते तलाशना चाहता है।
ट्रंप का दावा है कि अमेरिकी प्रतिनिधि एक “सम्मानित” ईरानी नेता के साथ बातचीत कर रहे हैं और ईरान समझौते के लिए इच्छुक है। हालांकि, ईरान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका ने उसके “कड़े रुख” के सामने कदम पीछे खींचे हैं। इसी बीच, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी ट्रंप से बातचीत की पुष्टि की है। उनका कहना है कि अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सैन्य बढ़त को अब एक ऐसे समझौते में बदला जा सकता है जो इजराइल के हितों की रक्षा करे। यह बयान इस ओर इशारा करता है कि युद्ध के बीच भी राजनीतिक समाधान की संभावनाएं जीवित हैं। ईरान की ओर से भी कुछ नरम संकेत मिले हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने कहा कि “मित्र देशों” के माध्यम से अमेरिका की ओर से बातचीत के संकेत मिले हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह संवाद किस स्तर पर और किन शर्तों पर हो सकता है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा संकट को लेकर है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण मार्ग है, लंबे समय से तनाव के केंद्र में रहा है। ईरान ने पहले खाड़ी में समुद्री बारूदी सुरंगें बिछाने और क्षेत्र के ऊर्जा एवं जल ढांचे को निशाना बनाने की धमकी दी थी, जिससे संकट और गहरा सकता था। ट्रंप द्वारा समय सीमा बढ़ाने के फैसले से खाड़ी देशों को फिलहाल राहत मिली है। भारत के लिए भी यह घटनाक्रम बेहद महत्वपूर्ण है। इसी तनाव के बीच भारत के दो एलपीजी टैंकर जग वसंत और पाइन गैस सुरक्षित रूप से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को पार कर चुके हैं। यह भारत की ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक सकारात्मक संकेत है और यह भी दर्शाता है कि संकट के बावजूद सीमित स्तर पर समुद्री गतिविधियां जारी हैं। कुल मिलाकर, यह स्थिति एक “कूटनीतिक खींचतान” की तरह दिखाई दे रही है, जहां सैन्य दबाव और बातचीत दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। आने वाले पांच दिन इस संकट के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं क्या यह तनाव किसी समझौते की ओर बढ़ेगा या फिर एक बड़े टकराव में बदल जाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)



