तावड़े लगाएंगे यूपी में हैट्रिक

महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता और कुशल चुनावी रणनीतिकार विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया गया है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने 18 अगस्त को उन्हंे अपनी नई टीम में महामंत्री का दायित्व भी सौंपा है। तावड़े के पास संगठन और चुनाव प्रबंधन का लम्बा अनुभव है। बिहार मंे 2022 मंे उन्हंे प्रभारी बनाया गया। भाजपा को विधानसभा मंे 89 विधायक मिले हैं और पहली बार वहां भाजपा की सरकार बनी है। वह केरल मंे विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रभरी थे और वहां भाजपा का जनाधार बढ़ा है। भाजपा ने पहली बार केरल में खाता खोला है। अब यूपी मंे भाजपा सरकार की हैट्रिक लगाने की जिम्मेदारी उन पर डाली गयी है। गुजरात के नेता जगदीश ईश्वर भाई पटेल सह-प्रभारी के रूप मंे तावड़े का सहयोग करेंगे।
बीजेपी के अध्यक्ष नितिन नवीन ने 18 अगस्त को अपनी नई टीम का ऐलान किया था। अगले ही दिन उन्होंने तीन चुनावी राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात में नए प्रभारियों की नियुक्ति कर दी है। पार्टी महासचिव विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई है, महासचिव सतीश पूनिया पंजाब के प्रभारी बनाए गए हैं, जबकि तरुण चुघ को गुजरात का प्रभार दिया गया है। उत्तर प्रदेश के लिए तावड़े की नियुक्ति के जरिए बीजेपी बड़े लक्ष्य की तरफ नजर बनाए हुए है, इस बार पार्टी राज्य में हैट्रिक लगाने के उद्देश्य से मैदान में उतरेगी। बिहार में बतौर प्रभारी तावड़े ने जोरदार रणनीति बनाई और राज्य में बड़ी जीत दर्ज करने में अहम भूमिका निभाई थी। ऐसे में अब उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी गई है, उनके साथ जगदीश ईश्वर भाई पटेल को सह प्रभारी बनाया गया है।
बीजेपी का उत्तर प्रदेश पर सबसे ज्यादा फोकस है। पार्टी ने लगातार दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव जीते, लेकिन 2024 के पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को झटका लगा। ऐसे में राज्य में हैट्रिक लगाने की उसकी रणनीति को जमीन पर उतारना विनोद तावड़े के लिए चुनौती रहेगी। वे पिछले कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश में सक्रिय रहे हैं। चाहे योगी मंत्रिपरिषद का विस्तार हो या प्रदेश अध्यक्ष पंकज चैधरी की टीम का गठन करना, इन सबमें उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई है। इसके अलावा प्रदेश स्तर पर कई नियुक्तियों में भी तावड़े की छाप दिखी है। सरकार और संगठन के बीच सामंजस्य बेहतर करने और तालमेल बढ़ाने के लिए तावड़े सक्रिय रहे हैं। वे सबको साथ लेकर चलने वाले माने जाते हैं। ऐसे में गुटबाजी की शिकार होने से उत्तर प्रदेश बीजेपी को वे संभाल सकते हैं।
इससे पहले विनोद तावड़े ने बिहार के प्रभारी के तौर पर अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया था। वहां उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक संगठनात्मक रणनीतिकार की रही। ध्यान रहे 2022 में जब बीजेपी ने उन्हें बिहार का प्रभारी बनाया था, तब वहां का सियासी माहौल चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने जदयू को फिर से एनडीए गठबंधन में वापस लाने और सीट बंटवारे को सहज बनाने में मुख्य मध्यस्थ और समन्वयक की भूमिका निभाई। इसके अलावा तावड़े ने बिहार में बूथ स्तर पर बीजेपी के कैडर को मजबूत करने, अलग-अलग जिलों में राज्य कार्यकारी बैठकों के माध्यम से कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने और सामाजिक-जातीय समीकरणों को साधने के लिए काम किया था। बिहार में एनडीए के दूसरे घटक दल जिसमें जदयू, लोजपा (रामविलास), हम, आरएलएम के बीच आपसी तालमेल बनाए रखने और चुनाव रणनीतियों को जमीनी स्तर पर लागू कराने की जिम्मेदारी तावड़े के कंधों पर थी। वह राज्य में केंद्रीय नेताओं के दौरों, स्टार प्रचारकों की बैठकों और पार्टी के प्रमुख नैरेटिव को जनता तक पहुंचाने की रणनीति तैयार करने में पहली पंक्ति में रहे। विधानसभा चुनाव में प्रचंड विजय के बाद नीतीश कुमार की जगह राज्य में बीजेपी का पहली बार मुख्यमंत्री बनवाने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई। इससे पहले वह हरियाणा के प्रभारी भी रह चुके हैं।
विनोद तावड़े मूल रूप से महराष्ट्र से आते हैं। वह लंबे समय से संगठन में कई अहम पदों पर रहे हैं, वे छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से सक्रिय रूप से जुड़े रहे है। वह 1980 के दशक में वह आरएसएस में पूरे समय के कार्यकर्ता के रूप में उभरे। मराठा समुदाय से आने वाले विनोद तावड़े 2014 से 2019 तक देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं। वह महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य रहे और 2011 से 2014 तक विधान परिषद में विपक्ष के नेता की भूमिका निभाई। वह 1999 में सबसे कम उम्र के नेताओं में से एक के रूप में मुंबई बीजेपी के अध्यक्ष बने थे। इसके अलावा उन्होंने महाराष्ट्र बीजेपी के प्रदेश महासचिव के रूप में भी कई सालों तक काम किया है। पार्टी ने उन्हें 2026 में महाराष्ट्र से राज्यसभा भेजा है। विनोद तावड़े संगठन में बीजेपी के अहम रणनीतिकार माने जाते हैं। संगठनात्मक स्तर पर उनके इसी कुशल प्रबंधन और बिहार में पार्टी के प्रदर्शन को देखते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने उन पर लगातार भरोसा जताया और उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के पद पर बनाए रखा। सुनील बंसल के अलावा वे अकेले ऐसे महासचिव हैं जो टीम नड्डा के बाद टीम नवीन में भी बने हुए हैं।
यह एक तरह से पार्टी के अंदर विनोद तावड़े की दमदार वापसी है। इसे समझना हो तो आज से साढ़े चार साल पहले अक्टूबर 2019 को देखना होगा। तब विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने बोरीवली सीट से उनका टिकट काट दिया था। तब उन्होंने कहा, मैं आत्मनिरीक्षण करूंगा कि पार्टी ने मुझे बोरीवली से क्यों नहीं खड़ा किया। पार्टी के दृष्टिकोण को भी समझने की कोशिश करूंगा। अगर मुझसे गलती हुई तो मैं इसे सुधारूंगा। अगर पार्टी कुछ गलत कर रही है तो वे लोग उसे भी सुधारेंगे, लेकिन अभी इस बारे में सोचने का समय नहीं है। चुनाव नजदीक हैं और मैं पार्टी के लिए काम कर रहा हूं।
उस समय विनोद तावड़े महाराष्ट्र सरकार में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री थे, लेकिन फिर भी पार्टी ने उनकी जगह मुंबई के बोरीवली विधानसभा क्षेत्र से एकदम नए चेहरे सुनील राणे को उम्मीदवार बनाया था। तब ये कयास लगाया गया कि विनोद तावड़े का राजनीतिक करियर खत्म हो गया है लेकिन पार्टी उनकी परीक्षा ले रही थी। यही कारण है कि पांच साल के अंदर विनोद तावड़े एक बार फिर पार्टी के लिए अहम जिम्मेदारियां निभाते दिख रहे हैं। सन् 2019 में पार्टी ने उनका टिकट काटा, तावड़े ने लोकसभा के लिए 195 उम्मीदवारों की सूची की घोषणा की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी से उम्मीदवारी की घोषणा भी शामिल थी।
पिछले महीने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना प्रमुख राज ठाकरे जब दिल्ली आए तो उनकी पहली मुलाकात विनोद तावड़े से ही हुई। राज ठाकरे और विनोद तावड़े के अमित शाह से मिलने जाने की खबर न सिर्फ मराठी बल्कि पूरे मीडिया में छाई रही। दरअसल विनोद तावड़े चुनाव के अहम समय के दौरान दिल्ली में बीजेपी के अहम नेता थे और अब यूपी में दायित्व निभाएंगे।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



