आध्यात्मिक चेतना का महापर्व दीपावली

भारतीय सनातन परंपरा में दीपावली केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकाश, ज्ञान, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक चेतना का महापर्व है। यह पर्व हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, निराशा से आशा की ओर तथा नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। दीपावली का प्रत्येक दीप जीवन में नई ऊर्जा, शुभ संकल्प और सकारात्मक विचारों का प्रतीक है। वर्ष 2026 में दीपावली का मुख्य पर्व ’8 नवंबर, रविवार’ को मनाया जाएगा। इस अवसर पर देशभर में श्रद्धालु विधि-विधान से भगवान गणेश एवं माता महालक्ष्मी का पूजन करेंगे। घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों को दीपों, रंगोली तथा आकर्षक सजावट से सुसज्जित किया जाएगा। इस वर्ष अमावस्या तिथि और लक्ष्मी पूजन के मुहूर्त को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली की संध्या में प्रदोष काल के दौरान भगवान गणेश एवं माता महालक्ष्मी का पूजन विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालुओं को अपने नगर के स्थानीय पंचांग और पूजा की परंपरा के अनुसार मुहूर्त की पुष्टि अवश्य करनी चाहिए।
दीपावली से संबंधित पांच प्रमुख पर्व भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं और जीवन मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। धनतेरस आरोग्य, धन और शुभता की कामना से जुड़ा है। नरक चतुर्दशी स्वच्छता और धार्मिक परंपराओं का प्रतीक है। दीपावली पर माता महालक्ष्मी एवं भगवान गणेश का पूजन किया जाता है। गोवर्धन पूजा प्रकृति, गौसेवा और अन्न के प्रति कृतज्ञता का संदेश देती है, जबकि भाई दूज भाई-बहन के प्रेम और पारिवारिक एकता को समर्पित है। इन पर्वों का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ये हमारी पारिवारिक व्यवस्था, सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूत करते हैं।
सनातन धर्म में माता महालक्ष्मी को धन, वैभव, ऐश्वर्य और शुभता की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। दीपावली की संध्या में भगवान गणेश के साथ माता लक्ष्मी का पूजन कर सुख-समृद्धि, सद्बुद्धि और परिवार के कल्याण की प्रार्थना की जाती है। ज्योतिषीय एवं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली पर स्वच्छता, सात्त्विकता, श्रद्धा और शुभ संकल्प का विशेष महत्व है। घर एवं कार्यस्थल को स्वच्छ रखना, पूजा स्थल को व्यवस्थित करना, दीप प्रज्वलित करना और जरूरतमंदों की सहायता करना इस पर्व की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। यह समझना भी आवश्यक है कि वास्तविक समृद्धि केवल धन-संपत्ति से नहीं आती। ईमानदारी, परिश्रम, अनुशासन, सदाचार और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व भी सुखी एवं सफल जीवन के महत्वपूर्ण आधार हैं।
भारत की सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। देश के अलग-अलग राज्यों में दीपावली मनाने की परंपराएं और स्थानीय रीति-रिवाज भिन्न हो सकते हैं, लेकिन इस पर्व की मूल भावना प्रकाश, सद्भाव, प्रेम और मंगलकामना से जुड़ी हुई है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध मंत्र सामूहिक एकता और समान संकल्प की प्रेरणा देता है-
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
इसका भाव है कि हम सब मिलकर आगे बढ़ें, परस्पर संवाद करें और समाज के कल्याण के लिए एकजुट होकर कार्य करें। दीपावली इस वैदिक भावना को अपने जीवन में उतारने का सुंदर अवसर है। आज आवश्यकता है कि हम धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और मानवता के मूल्यों को भी मजबूत करें।
दीप मंत्र से करें मंगलमय शुरुआत
दीपावली के अवसर पर दीप प्रज्वलित करते समय पारंपरिक दीप मंत्र का पाठ किया जा सकता हैकृ
दीपज्योतिः परंब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते
शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते
यह प्रार्थना जीवन में कल्याण, आरोग्य, शुभता और सद्बुद्धि की कामना को अभिव्यक्त करती है।
पर्यावरण संरक्षण के साथ मनाएं दीपावली
वर्तमान समय में दीपावली को पर्यावरण के अनुकूल मनाना भी हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। मिट्टी के दीपों का उपयोग, जरूरतमंदों की सहायता, स्वच्छता बनाए रखना और पटाखों से होने वाले ध्वनि एवं वायु प्रदूषण को कम करने का प्रयास इस पर्व की खुशियों को अधिक सार्थक बना सकता है।
विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और पशु-पक्षियों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए उत्सव मनाना हमारी संवेदनशीलता और संस्कारों का परिचायक है। दीपावली का वास्तविक संदेश केवल घरों में दीप जलाना नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों को भी प्रकाशमय बनाना है। धार्मिक आस्था के साथ विवेक, कर्म और सामाजिक उत्तरदायित्व का समन्वय ही जीवन को संतुलित एवं सार्थक बनाता है। इसलिए दीपावली को श्रद्धा, सद्भाव, स्वच्छता और सेवा की भावना के साथ मनाएं।
(ज्योतिषाचार्य पं. पुनीत दुबे-हिफी फीचर)



