एमपी में कांग्रेस की उम्मीद कायम

राजनीति में जय और पराजय का चक्र चलता ही रहता है। भले ही इसका समय निर्धारित नहीं होता।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास से भाजपा ने सत्ता तिकड़म से छीनी थी जब कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की कुटिल नीति से ज्योतिरादित्य सिंधिया बगावत पर मजबूर हुए। इसके बाद जनता की कांग्रेस के प्रति बेरुखी ने उसे विपक्ष में बैठने को मजबूर कर दिया लेकिन पूरी तरह से उम्मीद नहीं तोड़ी। दतिया विधान सभा उपचुनाव में भी उम्मीद कायम रही। कांग्रेस का कब्जा बरकरार रहा। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव का नतीजा सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं माना जा रहा है बल्कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में यह बीजेपी की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी।मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, मंत्रियों और संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने जमकर चुनाव प्रचार किया। बीजेपी ने इसे अपनी संगठनात्मक ताकत की परीक्षा की तरह लड़ा। दतिया में हुआ उपचुनाव सरकार बदलने वाला नहीं था। विधानसभा में बीजेपी के बहुमत पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद दोनों दलों ने इस सीट पर पूरी ताकत झोंक दी थी। यह सीट कांग्रेस की थी और उसी के पास आ गयी।
मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ बीजेपी की अंदरूनी कलह को भी चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की। कांग्रेस ऐसा चुनाव लड़ रही थी, जहां प्रचार खत्म होने से एक दिन पहले ही उसे अपने पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित करना पड़ा।इसके बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हरा दिया। यह वही सीट थी जो कांग्रेस विधायक रहे राजेंद्र भारती की बैंक धोखाधड़ी के एक मामले में दोषसिद्धि के बाद विधानसभा सदस्यता खत्म होने से खाली हुई थी। चुनाव प्रचार के आखिरी दिनों में कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए थे। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव प्रभावित करने की कोशिश का आरोप लगाया। दूसरी तरफ राजेंद्र भारती ने दावा किया कि घनश्याम सिंह के संबंध बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से हैं।
बीजेपी ने दतिया से छह बार विधायक और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया था। उनकी जगह पहली बार चुनाव लड़ रहे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा गया।
हालांकि इन सबके बावजूद कांग्रेस तीसरे राउंड से बढ़त बनाने में सफल रही। एक समय उसकी बढ़त 12 हजार वोट से भी ज्यादा पहुंच गई। हालांकि आखिरी दो राउंड में यह अंतर काफी कम हुआ, लेकिन कांग्रेस ने सीट आखिरकार जीत ली। यह लगातार दूसरी बार है जब दतिया विधानसभा सीट पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को हराया था और अब उपचुनाव में भी बीजेपी यह सीट वापस नहीं जीत पाई। दिलचस्प बात यह है कि दतिया में हुआ उपचुनाव सरकार बदलने वाला नहीं था। विधानसभा में बीजेपी के बहुमत पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके बावजूद दोनों दलों ने इस सीट पर पूरी ताकत झोंक दी। करीब तीन दशक तक दतिया की राजनीति में प्रभाव रखने वाले नरोत्तम मिश्रा को इस बार बीजेपी ने टिकट नहीं दिया। उनकी जगह पहली बार चुनाव लड़ रहे आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया। टिकट की घोषणा के बाद विरोध प्रदर्शन हुए, कुछ पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया और चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा का भावुक होना भी चर्चा का विषय बना।
हालांकि बाद में उन्होंने कार्यकर्ताओं से शांत रहने की अपील की और पार्टी उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार भी किया। इसके बावजूद पूरे चुनाव के दौरान यह सवाल बना रहा कि क्या वर्षों से नरोत्तम मिश्रा के साथ काम करने वाला संगठन उतनी सहजता से नए उम्मीदवार के साथ खड़ा हो पाएगा। चुनाव के नतीजे के पीछे सबसे स्पष्ट कारण यही दिखाई देता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर दतिया के नतीजे को सिर्फ नरोत्तम मिश्रा के टिकट कटने तक सीमित कर दिया जाए तो चुनाव की पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी। पूरे प्रदेश की तरह दतिया के ग्रामीण इलाकों में भी खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे लगातार चर्चा में रहे। खाद, बीज, डीजल की कीमतें और किसानों की परेशानियां चुनाव के दौरान लगातार लोगों के बीच चर्चा का विषय थीं। भोपाल में किसानों के आंदोलन, दिल्ली में हुए आंदोलन, अयोध्या चढ़ावा चोरी विवाद और हाल के स्टूडेंट आंदोलनों जैसे मुद्दों ने भी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में भूमिका निभाई।
दतिया उपचुनाव की एक दिलचस्प बात यह रही कि कांग्रेस भी पूरी तरह एकजुट नहीं थी। चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में पूर्व विधायक राजेंद्र भारती और कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह के बीच आरोप-प्रत्यारोप खुलकर सामने आए। मतगणना से एक दिन पहले कांग्रेस ने राजेंद्र भारती को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित भी कर दिया। इसके बावजूद कांग्रेस सीट बचाने में सफल रही। नतीजों के बाद बीजेपी ने आधिकारिक तौर पर संयमित प्रतिक्रिया दी लेकिन साथ ही वॉर्निंग भी दी है। मध्य प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि पार्टी मतदाताओं के जनादेश को विनम्रता के साथ स्वीकार करती है लेकिन उन्होंने आगे कहा, परिणामों की समीक्षा की जाएगी और समीक्षा में अगर किसी स्तर पर अनुशासनहीनता या कोई कमी सामने आती है तो उसके अनुसार कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी ने पूरी ताकत से चुनाव लड़ा लेकिन कुछ परिस्थितियों की वजह से पार्टी यह सीट अपने पक्ष में नहीं ला सकी। बीजेपी के एक नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी से कहा था दतिया उपचुनाव के नतीजे चिंता की वजह हैं। प्रदेश में पार्टी अभी आंतरिक रूप से एक नहीं है। मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद वाली बात जनता के बीच पहुंची है। इस चुनाव में पार्टी उस तरह से एकजुट होकर लड़ाई नहीं लड़ पाई जिसके लिए हम जाने जाते हैं लेकिन बीजेपी में हम सब एक हैं। इस नतीजे पर मंथन करने के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी।
दतिया उपचुनाव का असर सिर्फ एक विधानसभा सीट तक सीमित रहेगा या नहीं, यह आने वाले समय में साफ होगा लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मोहन यादव के नेतृत्व की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कई सभाएं कीं। हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष बने हेमंत खंडेलवाल के लिए भी इसे संगठनात्मक परीक्षा माना जा रहा था। उपमुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और संगठन के वरिष्ठ नेताओं को भी दतिया में चुनाव प्रचार में लगाया गया। इसके बावजूद पार्टी सीट अपने पक्ष में नहीं ला सकी। कांग्रेस का सीट पर कब्जा बना रहा, यही कांग्रेस के लिए उम्मीद की किरण है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



