नास्तिकों के हस्तक्षेप पर सुप्रीम सवाल

हमंे हिन्दू होने पर गर्व है क्यांेकि हमारा धर्म सिर्फ कर्मकांड नहीं बल्कि सुखद और शांतिमय जीवन जीने की एक ऐच्छिक पद्धति है। कुछ सम्प्रदाय हैं जहां धर्म न मानने का कोई विकल्प नहीं है लेकिन सनातन धर्म मंे नास्तिक होने से कोई नहीं रोक सकता। सरल शब्दों मंे कहंे तो हम किसी देवी या देवता अथवा दोनों के प्रति विश्वास करते हैं तो कोई दूसरा इनमंे से किसी पर भी विश्वास नहीं रखता। वह इनका अस्तित्व ही नहीं मानता। ऐसे लोगों को ही हमारे हिन्दू धर्म में नास्तिक कहा जाता है। इन नास्तिकों पर किसी प्रकार का दबाव आस्था रखने वाले नहीं डाल सकते तो धर्म को न मानने वाले भी अनुचित दबाव के हकदार नहीं हैं। हमारे देश की सबसे बड़ी अदालत अर्थात् सर्वोच्च न्यायालय मंे भी एक ऐसा ही मामला विचाराधीन है। मंदिरों ंके कुछ नियम हैं। दक्षिण भारत का एक प्रसिद्ध मंदिर सबरीमाला है जहां 10 से 55 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था क्योंकि भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है। इस प्रतिबंध के विरोध मंे इंडियन यंगलायर्स एसोसिएशन ने याचिका दाखिल की और सन् 2018 मंे सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी। हालंाकि मंदिर की परम्परा मंे अब भी वह नियम शामिल है और श्रद्धालु अपनी मर्जी से उसका पालन भी करते हैं लेकिन मामला अदालत मंे पहुंचने के बाद महिलाओं ने मंदिर मंे प्रवेश किया था। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ की सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना ने गंभीर सवाल उठाया था। उन्हांेने कहा कि कोई व्यक्ति जो पूजा या मंदिर से जुड़ा हुआ ही नहीं है, वह ऐसे मामले लेकर कोर्ट कैसे आ सकता है? जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जब कोई भक्त इस पर खुद सवाल नहीं उठा रहा तो गैरभक्त की याचिका पर कोर्ट क्यों विचार करे? सालिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने भी यह सवाल उठाया था कि क्या कोई गैर आस्थावान किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है? खास बात यह कि यह मामला सिर्फ सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं है बल्कि इससे सामाजिक और धर्मिक मुद्दे भी जुड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट इस पर सुनवाई कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान अहम सवाल उठे हैं। 9 जजों की संविधान पीठ की सदस्य जस्टिस बीवी नागरत्ना ने 8 अप्रैल 2026 को मूल याचिकाकर्ता इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन को याचिका दाखिल करने के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े किए। दरअसल, इसी याचिका पर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी। इससे पहले 10 से 55 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध था, क्योंकि भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा, कोई व्यक्ति जो पूजा या मंदिर से जुड़ा ही नहीं है, वह कोर्ट कैसे आ सकता है? जब कोई भक्त खुद इस पर सवाल नहीं उठा रहा, तो गैर भक्त की याचिका पर कोर्ट क्यों विचार करे? क्या उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ था? उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई एसोसिएशन बिना सीधे संबंध के याचिका दाखिल करती है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत उसे प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज किया जा सकता है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों में यह महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या कोई गैर-आस्थावान व्यक्ति किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है। सबरीमाला मामले में सुनवाई के दौरान एसजी तुषार मेहता ने कहा, ऐसे कई मंदिर हैं जहां पुरुषों को जाने की इजाजत नहीं है, क्योंकि यह देवी भगवती का मंदिर है, इसलिए इससे कुछ खास धर्म और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। कुछ मंदिर हैं, जिनकी डिटेल मैंने बताई हैं, जहां पुरुष पुजारियों को महिला भक्तों के पैर धोने का धार्मिक अधिकार है। पुष्कर मंदिर जैसे मंदिर हैं, जो देश का एकमात्र ब्रह्मा मंदिर है, जहाँ शादीशुदा पुरुषों को जाने की इजाजत नहीं है।
केरल में एक मंदिर ऐसा भी है, जहां यह रिवाज है कि पुरुष महिलाओं के कपड़े पहनकर अंदर जाते हैं। जैसा कि मैंने डिटेल में पढ़ा है, वे ब्यूटी पार्लर जाते हैं और उनकी परिवार की महिला सदस्य उन्हें साड़ी और दूसरे कपड़े पहनाने में मदद करती हैं। वहां सिर्फ पुरुष ही जाते हैं, तो यह पुरुष-केंद्रित या महिला-केंद्रित धार्मिक मान्यताओं का सवाल नहीं है। इस मामले में, यह महिला केंद्रित है। दूसरा, आर्टिकल 25 और 26 और उनके मतलब के बारे में एक सवाल था। एक दिन पहले, मैंने इस पर काफी बहस की थी। मैंने कहा था कि मैं इसे आखिर में उठाऊंगा नहीं तो, मैं दूसरे इश्यू खत्म नहीं कर पाता। मुझे उसके लिए टाइम नहीं मिला। मैं दोबारा बहस नहीं कर रहा हूं। असल में, मैंने इसका जवाब दे दिया है।
उन्होंने 2018 के फैसले में दिए गए इंदु मल्होत्रा के असहमति वाले निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का सीधा उल्लंघन नहीं हुआ था। वहीं, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि 2018 के फैसले में कोर्ट ने माना था कि यदि कोई गंभीर संवैधानिक प्रश्न उठता है, तो कोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है, भले ही याचिकाकर्ता का सीधा संबंध न हो। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि याचिका दाखिल करने के अधिकार का मुद्दा था, तो 2006 में ही याचिका खारिज हो जानी चाहिए थी। मामले में अब यह केंद्रीय फोकस बन गया है। क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धार्मिक समूह से संबंधित नहीं है, उस समूह की परंपराओं को चुनौती दे सकता है? सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यदि कोर्ट लोकस पर फैसला करता है, तो फिर मामले के अन्य संवैधानिक प्रश्नों पर भी विस्तार से सुनवाई होनी चाहिए।
सबरीमाला मंदिर मामला केरल के भगवान अयप्पा मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर सदियों पुराने प्रतिबंध से संबंधित है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को हटा दिया था, लेकिन फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं के बाद, मामला अब 9-न्यायाधीशों की बड़ी संवैधानिक पीठ के पास लंबित है, जो आस्था बनाम लैंगिक समानता पर सुनवाई कर रही है। विवाद की जड़ यह है कि मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है, क्योंकि भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी (कठोर ब्रह्मचारी) माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट फैसला ने 28 सितंबर 2018 को 5-जजों की बेंच ने 4-1 के बहुमत से महिलाओं के प्रवेश को अनुमति दी। कोर्ट ने इसे समानता (अनुच्छेद 14) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) के खिलाफ माना था। इस मामले में 2018 के फैसले के बाद हुए हिंसक विरोध और पुनर्विचार याचिकाओं के बाद, मामला बड़ी पीठ को भेजा गया। अब 2026 में, अदालत इस बात की जांच कर रही है कि क्या यह प्रथा आवश्यक धार्मिक प्रथा है और क्या धार्मिक आस्था के मामलों में कोर्ट को दखल देना चाहिए।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



