प्रशांत किशोर को सुप्रीम फटकार

सफल चुनावी रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर (पीके) को उनके अपने बिहार ने ठुकरा दिया, जिसको संवारने का वादा करके वह 2025 के विधानसभा चुनाव मंे उतरे थे। प्रशांत किशोर ने सुनियोजित तरीके से राजनीत में कदम रखा। पहले वह पैदल यात्रा पर निकले और जनता की नब्ज टटोली। इसके बाद पीके ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्म दिवस पर जनसुराज नामक पार्टी का ऐलान किया। राज्य की 243 विधानसभा सीटों मंे से 238 सीटों पर अपने प्रत्याशी भी उतारे लेकिन एक भी विधायक नहीं मिल पाया। प्रशांत किशोर की अपनी विधानसभा करगहर मंे भी 1.52 फीसद वोट मिल पाये थे। जनसुराज के प्रत्याशी की यहां भी जमानत जब्त हो गयी। प्रशांत किशोर के 98 फीसद उम्मीदवारों की जमानत नहीं बच पायी थी। अब प्रशांत किशोर आरोप लगाते हैं कि चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार की सरकार ने महिलाआंे के खाते मंे पैसे डलवाये थे। इस वजह से चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ। चुनाव आयोग से भी इसकी शिकायत की गयी थी लेकिन उसने सुनवाई करने से ही मना कर दिया। प्रशांत किशोर ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई। वहां सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जाॅयमाल्या बागची की बेंच ने उनको फटकार लगाई। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि जब जनता आपको नकार दे तब लोकप्रियता पाने के लिए अदालत का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को कड़ी फटकार लगाई है और कहा है कि चुनाव हारने के बाद किसी को अदालत का सहारा नहीं लेना चाहिए। बिहार चुनाव 2025 में करारी हार के बाद प्रशांत किशोर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि महिला रोजगार योजना के पैसे मतदान से ठीक पहले महिलाओं के खाते में आए। इस वजह से चुनाव प्रभावित हुआ। हालांकि, चुनाव आयोग ने याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि जब जनता आपको नकार दे तो अदालत का इस्तेमाल लोकप्रियता पाने के लिए नहीं करना चाहिए।जन सुराज पार्टी की ओर से दायर याचिका पर 6 फरवरी को सुनवाई हुई। इस याचिका में बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को अवैध बताते हुए रद्द करने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा हम नोटिस जारी नहीं कर सकते। सीजेआई ने कहा कि चुनाव याचिका में एक चुनाव को मुद्दा बनाया जाता है। आप एक ही याचिका में पूरा चुनाव रद्द करने की बात कर रहे हैं। इसकी योग्यता नहीं है।
जन सुराज पार्टी का पक्ष रख रहे वकील ने कहा कि यह बहुत गंभीर मुद्दा है। अदालत को इसमें हस्तक्षेप कर जवाब तलब करना चाहिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, चुनाव हारने के बाद अदालत का सहारा न लें। मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। उन्होंने सवाल किया कि आपकी राजनीतिक पार्टी को कितने वोट मिले? अदालत ने कहा कि जब जनता चुनाव में नकार देती है, तो फिर अदालत के मंच का इस्तेमाल लोकप्रियता पाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सीजेआई ने साफ कहा कि कोई चाहे तो योजना को चुनौती दे सकता है, लेकिन यहां मुख्य मांग चुनाव को रद्द करने की है। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित राज्य में हाईकोर्ट मौजूद है और याचिकाकर्ता को पहले वहीं जाना चाहिए।
बिहार में 6 और 11 नवंबर 2025 को मतदान हुए थे। वहीं, महिला रोजगार योजना की लाभार्थियों के खाते में 26 सितंबर से पैसे आने शुरू हो गए थे। अक्टूबर में भी अलग-अलग महिलाओं के खाते में पैसे आए थे। इसी वजह से चुनाव आयोग में आरजेडी ने शिकायत कर इसमें रोक लगाने की मांग की थी। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजेे सारे पूर्वानुमानों पर भारी पड़े। चुनाव से पहले जहां अधिकांश पूर्वानुमानों में एनडीए को स्पष्ट बहुमत बताया जा रहा था वहीं 14 तारीख के रिजल्ट ने सबको चैंका दिया। एनडीए के फेवर में ऐसी सुनामी चलेगी इसका अंदाजा नहीं था। मतदाताओं ने सत्ता विरोधी लहर को धत्ता बताते हुए एनडीए के फेवर में एकतरफा मतदान किया। एनडीए को जहां कुल 202 सीटें मिलीं वहीं महागठबंधन 36 सीटों तक सिमट गया। बीजेपी 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी वहीं जेडीयू 85 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही। आरजेडी को बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। उसके खाते में केवल 25 सीटें आईं। इससे पूर्व 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने मामूली अंतर से चुनाव में जीत हासिल की थी लेकिन 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने महागठबंधन को करारी शिकस्त दी। 2020 के चुनाव में एनडीए की कुल सीटों का आंकड़ा बहुमत के आंकड़े से केवल तीन सीटें ज्यादा थीं। इस बार एनडीए ने शानदार प्रदर्शन करते हुए महागठबंधन धूल चटा दी है।
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम बहुत ही कांटे की टक्कर वाला था, जिसमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। 10 नवंबर 2020 को घोषित हुए इन नतीजों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 125 सीटें मिलीं, जो 243 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 122 सीटों के आँकड़े से 3 ज्यादा थीं। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद 75 सीटें जीतकर 2020 में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। 2015 की तुलना में जद(यू) की सीटों में भारी गिरावट देखी गई, जो 71 से घटकर 43 रह गईं।
चुनाव में एक्स फैक्टर मानी जा रही प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी (जसुपा) 243 सदस्यीय सदन में खाता खोलने में भी विफल रही है।पूर्व राजनीतिक रणनीतिकार द्वारा गठित इस पार्टी को बेरोजगारी, पलायन और उद्योगों की कमी जैसे मुद्दों पर जोरदार प्रचार के बावजूद मतदाताओं का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल सका। प्रशांत किशोर ने 238 सीटों पर कैंडिडेट उतारे, उसमें से 233 सीटों मतलब 98ः सीटों पर जमानत जब्त हो गई। पार्टी को कुल वोट का 1 परसेंट भी हासिल नहीं हुआ। मायावती की बसपा जिसे बिहार में बड़ी ताकत नहीं माना जाता, उसने भी इससे ज्यादा वोट लिया और उसका वोट शेयर 1.52 परसेंट रहा। प्रशांत किशोर रोहतास जिले से आते हैं जहां विधानसभा की 7 सीटें हैं। उनके अपने जिलों की सभी सीटों पर भी पार्टी अपनी जमानत नहीं बचा पाई है। उनकी अपनी विधानसभा करगहर में पार्टी को सिर्फ 7.42 फीसद वोट मिला है।
नियमों के अनुसार, किसी भी उम्मीदवार को जमानत बचाने के लिए कुल डाले गए वोटों का कम से कम छठवां हिस्सा हासिल करना आवश्यक है। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए जमानत राशि 10,000 रुपये और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए यह 5,000 रुपये निर्धारित है। निर्धारित नियम के अनुसार वोट नहीं पाने पर जमानत राशि जब्त हो जाती है। जन सुराज पार्टी को जहां पूरे राज्य में 3.44 फीसद वोट मिले, वहीं वह जिन 238 सीटों पर चुनाव लड़ी उनमें से 68 सीटों पर नोटा से भी पीछे रह गई। इसका मतलब है कि लगभग 28.6 फीसद सीटों पर ‘नोटा’ को जनसुराज से अधिक वोट मिले, जो किसी भी नई पार्टी के लिए गंभीर चुनौती का संकेत है। इससे अच्छा प्रदर्शन तो असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम का है।
प्रशांत किशोर ने पहले दावा किया था कि उनकी पार्टी 150 सीट जीतेगी। बाद में उन्होंने यह भी कहा था कि सीट अर्जित करने वाले दलों की सूची में जसुपा या तो सबसे ऊपर होगी या सबसे नीचे, लेकिन ‘मध्य स्थिति’ की कोई संभावना नहीं है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



