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यही मेरा वतन है

(यह मेरी मातृभूमि है-भाग-1)

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक लम्बी संधर्व गाथा है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े हुए लोगों ने अपने-अपने स्तर पर आज़ादी की इस मशाल को जलाए रखने का काम किया। स्वाधीनता आंदोलन की शुरुआत बंगाल से शुरू होकर पूरे देश में फैली जिसने आगे चलकर एक सशक्त मुखर क्रांति का स्वरूप ग्रहण किया। यह आंदोलन एक निरन्तर होने वाले वैचारिक विकास के रूप में जाना गया। इस दौरान जो साहित्य रचा गया जो कविताएं लिखीं गईं वे सभी शिल्प और संवेदना दोनों के स्तर पर उच्चकोटि की थीं। यह सच है कि देश की आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हमारे देश में तत्कालीन प्रबुद्ध कलमकारों ने अपने उत्पीड़न की परवाह न करते हुए जन मानस को सचेत करने, उनमें आततायी विदेशी शासन के कारनामों की पोल खोलने तथा लोगों में जन जागृति की भावना विकसित करने के लिए अपनी लेखनी का अच्छा उपयोग किया था। तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जो सामाजिक साहित्य उस समय रचा गया वह सरकार द्वारा प्रतिबन्धित कर दिया गया था, क्योंकि उन्हें डर था कि लोग बहुत तेजी से उनके विरुद्ध उठ खड़े हों सकते हैं। ये सभी रचनाएं हमारे अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं। इस प्रतिबन्धित साहित्य से नई पीढ़ी का परिचय कराना भी हमारा नैतिक दायित्व है जिसकी शुरुआत हम जल्दी ही करेंगे। जिसके प्रथम चरण में हम प्रेमचंद की पुस्तक सोज़े वतन से कहानी यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।
आज पूरे साठ बरस के बाद मुझे अपने वतन, प्यारे वतन का दर्शन फिर नसीब हुआ। जिस वक्त मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ और किस्मत मुझे पश्चिम की तरफ ले चली, मेरी उतनी जवानी थी। मेरी रगों में ताजा खून दौड़ता था और सीना उमंगों और बड़े-बड़े इरादों से भरा हुआ था। मुझे प्यारे हिन्दुस्तान से किसी जालिम की सख्तियों और इंसाफ के जबरदस्त हाथों ने अलग नहीं किया था। नहीं, जालिम का जुल्म और कानून की सख्तियाँ मुझसे जो चाहें करा सकती हैं मगर मेरा वतन मुझसे नहीं छूट सकता। यह मेरे बुलंद इरादे और बड़े-बड़े मंसूबे थे जिन्होंने मुझे देश निकाला दिया।
मैंने अमेरिका में खूब व्यापार किया, खूब दौलत कमाई और खूब ऐश किया। भाग्य से बीवी भी ऐसी पायी जो अपने रूप में बेजोड़ थी, जिसकी खूबसूरती की चर्चा सारे अमेरिका में फैली हुई थी और जिसके दिल में किसी ऐसे खयाल की गुंजाइश भी न थी कि जिसका मुझसे सम्बन्ध न हो। मैं उस पर दिलोजान से न्योछावर था और वह मेरे लिए सबकुछ थी। मेरे पाँच बेटे हुए, सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट और नेक, जिन्होंने व्यापार को और भी चमकाया और जिनके भोले, नन्हें बच्चे उस वक्त मेरी गोद में बैठे हुए थे जब मैंने प्यारी मातृभूमि का अन्तिम दर्शन करने के लिए कदम उठाया।
मैंने बेशुमार दौलत, वफादार बीवी, सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े, ऐसी-ऐसी अनमोल नेमतें छोड़ दीं, इसलिए कि प्यारी भारतमाता का अन्तिम दर्शन कर लूँ। मैं बहुत बूढ़ा हो गया था। दस और हों तो पूरे सौ बरस का हो जाऊँ, और अब अगर मेरे दिल में कोई आरजू बाकी है तो यही कि अपने देश की खाक में मिल जाऊँ। यह आरजू कुछ आज ही मेरे मन में पैदा नहीं हुई है, उस वक्त भी थी जब कि मेरी बीवी अपनी मीठी बातों और नाजुक अदाओं से मेरा दिल खुश किया करती थी।
जब कि मेरे नौजवान बेटे सवेरे आकर अपने बूढ़े बाप को अदब से सलाम करते थे, उस वक्त भी मेरे जिगर में एक काँटा-सा खटकता था और वह काँटा यह था कि मैं यहाँ अपने देश से निर्वासित हूँ। यह देश मेरा नहीं है, मैं इस देश का नहीं हूँ। धन मेरा था, बीवी मेरी थी, लड़के मेरे थे और जायदादें मेरी थीं मगर जाने क्यों मुझे रह-रहकर अपनी मातृभूमि के टूटे-फूटे झोंपड़े, चार-छः बीघा मौरूसी जमीन और बचपन के लंगोटिया यारों की याद सताया करती थी और अक्सर खुशियों की धूमधाम में भी यह खयाल चुटकी लिया करता कि काश, अपने देश में होता!
मगर जिस वक्त बम्बई में जहाज से उतरा और काले कोट-पतलून पहने, टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलते मल्लाह देखे, फिर अंग्रेजी दुकानें, ट्रामें और मोटर-गाड़ियाँ नजर आयीं, फिर सड़क वाली पटरियाँ और मुँह में चुरुट दबाये आदमियों से मुठभेड़ हुई, फिर रेल का स्टेशन, और रेल पर सवार होकर अपने गाँव को चला, प्यारे गाँव को जो हरी-भरी पहाड़ियों के बीच में आबाद था, तो मेरी आँखों में आँसू भर आये। मैं खूब रोया, क्योंकि यह मेरा प्यारा देश न था, यह वह देश न था जिसके दर्शन की लालसा मेरे दिल में लहरें लिया करती थी। यह कोई और देश था। यह अमेरिका था, इंग्लिस्तान था, मगर प्यारा भारत नहीं।
रेलगाड़ी जंगलों, पहाड़ों, नदियों और मैदानों को पार करके मेरे प्यारे गाँव के पास पहुँची जो किसी जमाने में फूल-पत्तों की बहुतायत और नदी-नालों की प्रचुरता में स्वर्ग से होड़ करता था। मैं गाड़ी से उतरा तो मेरा दिल बाँसों उछल रहा था-अब अपना प्यारा घर देखूँगा, अपने बचपन के प्यारे साथियों से मिलूँगा। मुझे उस वक्त यह बिल्कुल याद न रहा कि मैं नब्बे बरस का बूढ़ा आदमी हूँ। ज्यों-ज्यों मैं गाँव के पास पहुँचता था, मेरे कदम जल्द-जल्द उठते थे और दिल में एक ऐसी खुशी लहरें मार रही थी जिसे बयान नहीं किया जा सकता। हर चीज पर आँखें फाड़-फाड़कर निगाह डालता- अहा, यह वही नाला है जिसमें हम रोज घोड़े नहलाते और खुद गोते लगाते थे मगर अब इसके दोनों तरफ काँटेदार तारों की चहारदीवारी खिंची हुई थी और सामने एक बंगला था जिसमें दो-तीन अंग्रेज बन्दूकें लिये इधर-उधर टहल रहे थे। नाले में नहाने या नहलाने की सख्त मनाही थी।
गाँव में गया और आँखें बचपन के साथियों को ढूँढ़ने लगीं मगर अफसोस, वह सबके सब मौत का निवाला बन चुके थे और मेरा टूटा-फूटा झोंपड़ा जिसकी गोद में बरसों तक खेला था, जहाँ बचपन और बेफिक्रियों के मजे लूटे थे, जिसका नक्शा अभी तक आँखों में फिर रहा है, वह अब एक मिट्टी का ढेर बन गया था। जगह गैर-आबाद न थी। सैकड़ों आदमी चलते-फिरते नजर आये, जो अदालत और कचहरी और थाने-पुलिस की बातें कर रहे थे। उनके चेहरे बेजान और फिक्र में डूबे हुए थे और वह सब दुनिया की परेशानियों से टूटे हुए मालूम होते थे। मेरे साथियों के-से हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर, गोरे-चिट्टे नौजवान कहीं न दिखाई दिये। वह अखाड़ा जिसकी मेरे हाथों ने बुनियाद डाली थी, वहाँ अब एक टूटा-फूटा स्कूल था और उसमें गिनती के बीमार शक्ल-सूरत के बच्चे जिनके चेहरों पर भूख लिखी थी, चिथड़े लगाये बैठे ऊँघ रहे थे। नहीं, यह मेरा देश नहीं है। यह देश देखने के लिए मैं इतनी दूर से नहीं आया। यह कोई और देश है, मेरा प्यारा देश नहीं है।
उस बरगद के पेड़ की तरफ दौड़ा जिसकी सुहानी छाया में हमने बचपन के मजे लूटे थे, जो हमारे बचपन का हिंडोला और जवानी की आरामगाह था। उस प्यारे बरगद को देखते ही रोना-सा आने लगा और ऐसी हसरत-भरी, तड़पाने वाली और दर्दनाक यादें ताजी हो गयीं कि घंटों जमीन पर बैठकर रोता रहा। यही प्यारा बरगद है जिसकी फुनगियों पर हम चढ़ जाते थे, जिसकी जटाएँ हमारा झूला थीं और जिसके फल हमें सारी दुनिया की मिठाइयों से ज्यादा मजेदार और मीठे मालूम होते थे। वह गाँव के बाँहें फैलाकर खेलने वाले हमजोली जो कभी रूठते थे, कभी मनाते थे, वह कहाँ गये? आह, मैं बेचारा मुसाफिर क्या अब अकेला हूँ? क्या मेरा कोई साथी नहीं?
इस बरगद के पास अब थाना और पेड़ के नीचे एक कुर्सी पर कोई लाल पगड़ी बाँधे बैठा हुआ था। उसके आसपास दस-बीस और लाल पगड़ी वाले हाथ बाँधे खड़े थे और एक अभागा अकाल का मारा आदमी जिस पर अभी-अभी चाबुकों की बौछार हुई थी, पड़ा सिसक रहा था। मुझे खयाल आया, यह मेरा प्यारा देश नहीं है, यह कोई और देश है, यह यूरोप है, अमेरिका है, मगर मेरा प्यारा देश नहीं है, हरगिज नहीं।-क्रमशः (हिफी)

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