समयानुकूल राजनीति

राजनीति के पंडित कौटिल्य ने राज्य को एक जीव माना और उसके सात आवश्यक अंग बताए- 1. राजा,
2. अमात्य (मंत्री/अधिकारी), 3. जनपद (भूमि और प्रजा), 4. दुर्ग (किला),
5. कोष (खजाना), 6. दंड (सेना), और 7. मित्र (सहयोगी)। यह उनकी परराष्ट्र नीति और युद्ध-शांति से जुड़ा सिद्धांत है। इसके अनुसार, एक राजा को अपने पड़ोसी राज्य को स्वाभाविक शत्रु और पड़ोसी के पड़ोसी को मित्र मानकर कूटनीतिक संबंधों का संचालन करना चाहिए। कौटिल्य का मानना था कि प्रजा के सुख में राजा का सुख है। एक आदर्श राजा को हमेशा जन-कल्याण, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और धर्म का पालन करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय इसी नीति पर चल रहे हैं और प्रजा के सुख को ही सर्वोपरि मानते हैं। वह अन्य विपक्षी दलों से हटकर पॉलिटिक्स कर रहे हैं। वह बीजेपी का विरोध कर रहे हैं, लेकिन पीएम मोदी और केंद्र सरकार के साथ तालमेल भी बनाकर रख रहे हैं। उनकी राजनीति में न ज्यादा दोस्ती है, न ज्यादा बैर। वह एकदम नफा-नुकसान की राजनीति खेलते नजर आ रहे हैं। पिछले 12 वर्षों में, नरेंद्र मोदी सरकार और विपक्ष-शासित कई राज्यों के बीच अक्सर सार्वजनिक टकराव की स्थिति रही है। डीएमके के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार ने अक्सर केंद्र पर फंड रोकने और राज्य के हितों के खिलाफ नीतियां थोपने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर केंद्र से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए), 2013 में प्रस्तावित बदलावों पर फिर से विचार करने का आग्रह किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि इन बदलावों से राज्य के लगभग 70 लाख सबसे गरीब और कमजोर लोगों को मिलने वाले अनाज के हक में भारी कटौती हो सकती है। तमिलनाडु में अभी हर महीने 65,261 मीट्रिक टन अनाज मुफ्त दिया जाता है। थलपति विजय ने तर्क दिया कि अनाज के कोटे को परिवार-आधारित व्यवस्था से बदलकर प्रति व्यक्ति आवंटन (जिसमें परिवार के लिए अधिकतम सीमा तय हो) करने से तमिलनाडु जैसे राज्यों को नुकसान होगा, जिन्होंने परिवार नियोजन कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया है और इसलिए वहां परिवार का आकार छोटा है। मुख्यमंत्री विजय के अनुसार, तमिलनाडु को अभी केंद्र सरकार से अंत्योदय अन्न योजना (एएवाय) लाभार्थियों के लिए हर महीने 65,261 मीट्रिक टन अनाज मुफ्त मिलता है। प्रस्तावित संशोधन के तहत, यह आवंटन घटकर लगभग 42,040 मीट्रिक टन रह जाएगा, जिससे राज्य भर के गरीब परिवारों को मिलने वाली खाद्य सहायता में भारी कमी आएगी। विजय ने तमिलनाडु की मजबूत सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) बनाए रखने की लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता पर भी जोर दिया, जिसके तहत अक्सर केंद्र के तय नियमों से ज्यादा खाद्य सुरक्षा लाभ दिए जाते हैं।
इससे एक बात तो साफ है कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय को अगर आप सियासत के कच्चे खिलाड़ी समझ रहे हैं तो यह आपकी भूल है। वह अन्य विपक्षी दलों की राह पर न चलकर एकदम नई तरह की पॉलिटिक्स कर रहे हैं। हर नफा-नुकसान का हिसाब लगाकर फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं। थलपति न ज्यादा दोस्ती न ज्यादा बैर के फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं। थलपति विजय अन्य विपक्षी दलों की राजनीति से बिल्कुल अलग तरह की सियासत खेल रहे हैं। उनकी राजनीति में बीजेपी का विरोध जरूर देखा जा रहा है लेकिन पीएम मोदी और केंद्र सरकार के साथ तालमेल भी देखा जा रहा है। थलपति विजय ने राजनीति में जैसे ही कदम रखा, तो उन्होंने बीजेपी के खिलाफ हुंकार भर दी। इसी साल 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने बार-बार भाजपा पर सत्ता को केंद्रित करने, हिंदी और राष्ट्रीय शिक्षा नीति थोपने और तमिलनाडु के अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाया लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी का नाम लेने से बचते नजर आए। थलपति विजय ने वैचारिक और नीतिगत मुद्दों पर बीजेपी का विरोध जारी रखते हुए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार के साथ तालमेल लगातार बनाए रखा है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को प्रशासनिक रिश्तों पर हावी होने देने के बजाय, तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री ने राजनीति में कट्टरता से किनारा किया है। उन्होंने अपने कामकाज से कट्टरता को अलग रखने की कोशिश की है। एक ऐसा संतुलन है जो हाल के केंद्र-राज्य संबंधों में शायद ही कभी देखने को मिला हो।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार यह तरीका विपक्ष की राजनीति के लिए एक नया मॉडल बन सकता है। जहां जरूरी हो वहां ही विरोध करें और जहां फायदा हो वहां एकदम सहयोग वाली राजनीति अपनाएं। एक ऐसा मॉडल जो पिछले लगभग एक दशक से विपक्ष-शासित राज्यों में काफी हद तक नदारद रहा है। पिछले 12 वर्षों में, नरेंद्र मोदी सरकार और विपक्ष-शासित कई राज्यों के बीच अक्सर सार्वजनिक टकराव की स्थिति रही है। डीएमके के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार ने अक्सर केंद्र पर फंड रोकने और राज्य के हितों के खिलाफ नीतियां थोपने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। इस मामले में पश्चिम बंगाल सबसे आगे रहा। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बार-बार केंद्र पर आर्थिक भेदभाव का आरोप लगाया और प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई कई बैठकों में शामिल नहीं हुईं। दिल्ली में सत्ता में रहते हुए अरविंद केजरीवाल ने भी अक्सर भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर संवैधानिक और प्रशासनिक तरीकों से उनके प्रशासन के कामकाज में बाधा डालने का आरोप लगाया। हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस सरकार का मोदी सरकार से मतभेद होता रहा। झारखंड के मुख्य मंत्री हेमंत सोरेन को भी मोदी सरकार से शिकायत रही है।
अब थलपति विजय की राजनीति अलग दिखाई दे रही है। उनकी सरकार ने भाजपा के प्रति अपने वैचारिक विरोध को कमजोर नहीं किया है। वह तीन-भाषा नीति को अस्वीकार करती है, शिक्षा निधि को नई नीति से जोड़ने का विरोध करती है, और संघवाद और राज्य स्वायत्तता पर तमिलनाडु के पारंपरिक रुख को बरकरार रखती है। जो बदला है, वह मोदी सरकार के साथ संवाद का तरीका है। विजय ने नई दिल्ली के साथ बातचीत कम करने के बजाय उसे बढ़ाने का विकल्प चुना है।
केंद्र सरकार के प्रस्तावित संशोधन का मकसद मौजूदा अंत्योदय अन्न योजना (एएवाय) के तहत मिलने वाले अनाज के कोटे में बदलाव करना है। अभी परिवार के आकार की परवाह किए बिना हर परिवार को प्रति माह 35 किलोग्राम अनाज मिलता है, जिसे बदलकर प्रति व्यक्ति प्रति माह 7 किलोग्राम करने का प्रस्ताव है, लेकिन एक परिवार के लिए अधिकतम सीमा 35 किलोग्राम ही रहेगी। विजय का तर्क है कि इस प्रस्ताव का तमिलनाडु पर बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि वहां परिवार का औसत आकार केवल 3.54 सदस्य है। नतीजतन, कई सबसे गरीब परिवारों को अभी की तुलना में काफी कम अनाज मिलेगा। मुख्यमंत्री के अनुसार तमिलनाडु में अभी 18.64 लाख एएवाय राशन कार्ड हैं, जिनसे 69.27 लाख लाभार्थियों को लाभ मिलता है। इनमें विधवाएं, दिव्यांगजन, बिना नियमित आय वाले वरिष्ठ नागरिक, आदिवासी परिवार, भूमिहीन खेतिहर मजदूर, दिहाड़ी मजदूर और जानलेवा बीमारियों से पीड़ित लोग शामिल हैं। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



