लेखक की कलम

तमिलनाडु में अमर्यादित मतभेद

लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है। सभी को अपनी विचारधारा प्रकट करने का अधिकार है लेकिन इसकी भी एक मर्यादा होनी चाहिए। राजनीति में अलग-अलग विचारधारा को लेकर ही राजनीतिक दल बने हैं। इसलिए केन्द्र और राज्यों मंे पृथक दल की सरकारों मंे मतभेद कुछ ज्यादा ही दिखाई पड़ते हैं। इन मतभेदों से राष्ट्रपति और राज्यपालों को अलग रहना चाहिए लेकिन राज्यपालों से इस प्रकार की अक्सर शिकायत रहती है कि केन्द्र से इतर राज्य सरकार के फैसले पर उनका विरोध दर्ज होता है। यहां भी एक संवैधानिक मर्यादा है। देश की सबसे बड़ी अदालत अर्थात् सुप्रीम कोर्ट मंे भी यह मामला विचाराधीन रहा है। इसके विपरीत कुछ ऐसे संदर्भ सामने आते हैं जब यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि मतभेद की मर्यादा कौन तोड़ रहा है? द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (डीएमके) शासित राज्य तमिलनाडु मंे राज्यपाल आरएन रवि और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की सरकार के बीच अक्सर तकरार होती रहती है लेकिन 20 जनवरी को तमिलनाडु विधानसभा में राज्यपाल आरएन रवि अपना अभिभाषण बिना पढ़े वहां से चले आये। राज्यपाल का आरोप है कि उनका माइक बार-बार बंद कर दिया जाता था। हालंाकि राज्य सरकार ने इसके लिए तकनीकी कारण बताया है और इसे पूरी तरह झुठलाया भी नहीं जा सकता। दरअसल, यहां पर ध्यान देने की बात यह भी है कि राज्यपाल को वही अभिभाषण पढ़ना होता है जो राज्य सरकार तैयार करके देती है। अभिभाषण में केन्द्र सरकार और राज्यपाल पर भी यदि आरोप लगाये गये हों तो राज्यपाल के सामने असमंजस की स्थिति जरूर आती है अभिभाषण जब पढ़ा ही नहीं गया तो इस मामले मंे स्पष्ट रूप से कुछ कहा भी नहीं जा सकता। माइक का खराब होना और माइक बंद किया जाना- इस सच्चाई को सामने लाना होगा। यहां राज्यपाल और सरकार के बीच गंभीर विवाद हैं।
तमिलनाडु विधानसभा का 2026 का पहला सत्र 20 जनवरी से शुरू हो गया है। हालांकि, सत्र के पहले ही दिन सदन में एक बार फिर से राज्यपाल और सरकार के बीच विवाद देखने को मिला। इस बार भी राज्यपाल आरएन रवि ने अपना भाषण नहीं पढ़ा और विधानसभा की कार्यवाही को छोड़कर चले गए। राज्यपाल ने सदन में राष्ट्र गान के अपमान का आरोप लगाया है। इसके साथ ही उनके माइक को भी बार-बार बंद करने का आरोप लगाया गया है। इसके बाद सीएमएसमके स्टालिन ने सदन में राज्यपाल के खिलाफ एक खंडन प्रस्ताव रखा और इस बात पर जोर दिया कि विधानसभा के नियम सरकार की ओर से दी गई अभिभाषण की कॉपी में किसी भी तरह के बदलाव या छेड़छाड़ करने का अधिकार राज्यपाल को नहीं देते हैं। सीएम ने एक बार फिर दोहराया कि देश में राज्यपाल का पद खत्म हो जाना चाहिए।
तमिलनाडु लोकभवन की ओर से राज्यपाल आरएन रवि द्वारा विधानसभा में असेंबली भाषण पढ़ने से क्यों मना किया, इसके कारण बताए गए हैं।
इनमें राज्यपाल का माइक बार-बार बंद किया जा रहा था और उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा था। भाषण में कई बिना सबूत वाले दावे और गुमराह करने वाले बयान हैं। लोगों को परेशान करने वाले कई जरूरी मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है। यह दावा कि राज्य ने 12 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का भारी निवेश आकर्षित किया है, सच से बहुत दूर है। संभावित निवेशकों के साथ कई एमओयू सिर्फ कागजों पर ही रह गए हैं। असल निवेश इसका बहुत छोटा हिस्सा है। निवेश डेटा दिखाते हैं कि तमिलनाडु निवेशकों के लिए कम आकर्षक होता जा रहा है। चार साल पहले तक तमिलनाडु, राज्यों में, विदेशी डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट पाने वाला चैथा सबसे बड़ा राज्य था। आज यह छठे स्थान पर बने रहने के लिए संघर्ष कर रहा है।
इसी प्रकार महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि पाक्सो रेप की घटनाओं में 55 फीसद से ज्यादा और महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं में 33 फीसद से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। नशीले पदार्थों और ड्रग्स का बड़े पैमाने पर चलन और स्कूल स्टूडेंट्स सहित युवाओं में ड्रग्स के दुरुपयोग के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी एक बहुत ही गंभीर चिंता का विषय है। एक साल में ड्रग्स के दुरुपयोग के कारण 2000 (दो हजार) से ज्यादा लोगों ने, जिनमें ज्यादातर युवा थे, आत्महत्या कर ली। यह हमारे भविष्य को गंभीर रूप से खतरे में डाल रहा है। इसे लापरवाही से नजरअंदाज किया जा रहा है। दलितों के खिलाफ अत्याचार और दलित महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा तेजी से बढ़ रही है। हालांकि, इसे पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है। हमारे राज्य में एक साल में लगभग 20,000 (बीस हजार) लोगों ने आत्महत्या की-लगभग 65 आत्महत्याएं हर दिन। देश में कहीं और स्थिति इतनी गंभीर नहीं है। तमिलनाडु को भारत की आत्महत्या वाली राजधानी कहा जा रहा है। फिर भी, यह सरकार को चिंतित नहीं करता है। इसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है और शिक्षण संस्थानों में बड़े पैमाने पर कुप्रबंधन है, जिसका हमारे युवाओं के भविष्य पर बुरा असर पड़ रहा है। 50 फीसद से ज्यादा फैकल्टी पद सालों से खाली हैं और गेस्ट फैकल्टी परेशान हैं। हमारे युवा अनिश्चित भविष्य की ओर देख रहे हैं। ऐसा लगता है कि सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और इस मुद्दे को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। कई हजार ग्राम पंचायतें काम नहीं कर रही हैं क्योंकि सालों से चुनाव नहीं हुए हैं।
राज्य में कई हजार मंदिर बिना ट्रस्टी बोर्ड के हैं और सीधे राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे हैं। लाखों-करोड़ों भक्त मंदिरों के कुप्रबंधन से बहुत दुखी और निराश हैं।
इंडस्ट्री चलाने के दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले खर्चों की वजह से उद्योग सेक्टर बहुत ज्यादा तनाव में हैं। मुद्दे को पूरी तरह से नजरअंदाज किया जा रहा है।
इन कारणों से ही पता चलता है कि राज्य सरकार के प्रति दुराग्रह ज्यादा है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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