लेखक की कलम

पर्यावरण को खाक कर रहा दावानल

जंगल की आग बेहद विनाशकारी प्राकृतिक व मानवजनित आपदा है। बेकाबू दावानल चंद घंटों में हजारों हेक्टेयर वन भूमि, मूल्यवान पेड़ों और वन्यजीवों को राख में बदल देती है, जिससे पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है और भारी बर्बादी होती है। जंगल की आग के प्रभाव और नुकसान कई स्तरों पर महसूस किए जाते हैं। वन्यजीवों की मौत हो जाती है आग की चपेट में आने से कई जानवर, पक्षी और उनके बच्चे जिंदा जल जाते हैं। जो बच जाते हैं, उनके प्राकृतिक आवास और भोजन स्रोत नष्ट हो जाते हैं। आग के धुएं से भारी मात्रा में जहरीली गैसें जैसे कार्बन डाइऑक्साइड निकलती हैं, जिससे आसपास के क्षेत्रों में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं, सांस लेने में दिक्कत और वायु प्रदूषण होता है। बेशकीमती लकड़ियां, औषधीय पौधे और वनस्पतियां जलकर नष्ट हो जाती हैं। इसके अलावा, आग वाली जगह पर मिट्टी की उपजाऊ क्षमता खत्म हो जाती है।कई बार यह आग रिहायशी इलाकों तक पहुंच जाती है, जिससे लोगों के घर, खेत और मवेशी नष्ट हो जाते हैं। जानमाल का भारी खतरा पैदा हो जाता है। जंगल की आग में अकेले उत्तराखंड में वर्ष 2015 से अब तक 36 लोगों की जान ले चुकी है, जबकि 76 लोग घायल हुए।
विश्वभर में पर्यावरण के तेजी से असंतुलित और विषाक्त होते जाने के परिणाम अब गंभीर रूपों में सामने आते जा रहे हैं। ये प्रभाव रोकने के बावजूद भले ही सामान्य लोग इनका अनुभव नहीं कर पा रहे हों लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा किए जाने वाले शोधों और अनुसंधानों में इन्हें लेकर कोई भ्रम या अनिश्चितता नहीं है। विडंबना यह है कि सारी बातें साफ तौर पर सामने रख दिए जाने के बावजूद आम लोग ही नहीं बल्कि सरकारें तक सुधरने के लिए तैयार नहीं हैं। शोध बताता है कि आग से पैदा होने वाला प्रदूषण वायु गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। जंगलों की आग से निकलने वाले धुएं में सिर्फ कार्बन डाइऑक्साइड ही नहीं बल्कि कई ऐसे कार्बनिक यौगिक भी होते हैं जो ज्यादा खतरनाक सिद्ध हो रहे हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी माना है कि गंगा के मैदानों की धुंध और अमेजन के जंगलों से उठने वाला धुआं वायु प्रदूषण को लगातार बढ़ा रहा है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। संगठन ने एक उदाहरण के माध्यम से बताया है कि दो साल पहले अमेजन में लगी आग से निकला धुआं हजारों किलोमीटर दूर बसे शहरों तक पहुंचा और वहां की हवा को गंभीर रूप से प्रदूषित कर दिया। ऐसा ही एक अध्ययन बताता है कि 2001 के बाद से जंगलों की आग से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में करीब साठ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। यह भी बताया गया है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के बाहर मौजूद जंगलों में भी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में गंभीर इजाफा हुआ है। इन क्षेत्रों में हर साल करीब पचास करोड़ टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में जा रहा है। आमतौर पर जंगलों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है जिसके कारण उनके संरक्षण की दिशा में कदम भी नहीं उठाए जाते। विकसित देशों तक का यही हाल है। नतीजा यह है कि वनाग्नि जैसी घटनाएं होती हैं। बुझाने के उपाय न होने के कारण यह आग फैलती जाती है और पर्यावरण खतरनाक रूप से प्रदूषित होता जाता है।
भारत में वर्तमान में भीषण गर्मी और सूखे के कारण जम्मू-कश्मीर (राजौरी के नौशेरा क्षेत्र) और हिमाचल प्रदेश (चंबा और कांगड़ा के नैना देवी क्षेत्र) के जंगलों में आग लगने की कई घटनाएं सामने आई हैं। इसके अलावा उत्तराखंड (चमोली और गढ़वाल क्षेत्र) के पहाड़ी इलाकों में भी अक्सर जंगलों में आग की समस्या बनी हुई है।जम्मू-कश्मीर में राजौरी जिले के नौशेरा और बिंदी के जंगलों में भारी आग लगने के कारण चारों तरफ धुंआ फैल गया था, जिसे बुझाने के लिए दमकल और बचाव दल तैनात किए गए थे।हिमाचल प्रदेश में चंबा के सलोनी क्षेत्र और कांगड़ा के नैना देवी मंदिर के पास के जंगलों में भीषण आग की घटनाएं दर्ज की गई हैं।उत्तराखंड के चमोली के आदि बद्री क्षेत्र और कुमाऊं-गढ़वाल की पहाड़ियों में आग लगने के कारण काफी वन संपदा का नुकसान हुआ है।उत्तराखंड में इस साल 15 फरवरी से अब तक जंगल की आग की करीब 400 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिससे 331 हेक्टेयर से अधिक वन संपदा जलकर राख हो गई है। इस भीषण आग की चपेट में आने से कई बहुमूल्य वनस्पतियां, जीव-जंतु नष्ट हुए हैं और कुछ लोगों की जान भी जा चुकी है। गढ़वाल मंडल सबसे अधिक प्रभावित हुआ है, जहाँ 241 हेक्टेयर से अधिक का वन क्षेत्र जला है। इसके मुकाबले कुमाऊं मंडल में स्थिति थोड़ी बेहतर रही, जहाँ करीब 64 हेक्टेयर वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है। चमोली, पिथौरागढ़, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जिले आग से सबसे ज्यादा प्रभावित है। बारिश की कमी, लंबे समय तक सूखा मौसम और लगातार बढ़ता तापमान जंगलों में आग लगने के मुख्य कारण है।
उत्तराखंड के जंगलों में लग रही आग विकराल होती जा रही है।इस दृष्टि से पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़, टिहरी, देहरादून, नैनीताल व उत्तरकाशी जिले अधिक संवेदनशील बनकर उभरे हैं। इन्हीं जिलों में जंगल सर्वाधिक धधक रहे हैं। ऐसे में चिंता और चुनौती दोनों ही बढ़ गए हैं। वर्तमान में राज्य के आठ जिलों के जंगलों में धधक रही आग का बड़ा कारण वहां पसरे चीड़ वन हैं। चीड़ की सूखी पत्तियों (पिरुल) की जमीन में जमा परत आग में घी का काम कर रही है। पहाड़ी ढलानों और तेज हवा के कारण आग कुछ ही समय में बड़े क्षेत्र को अपने आगोश में ले रही है।
अल्मोड़ा, नैनीताल और पौड़ी में आबादी के करीब फैले घने चीड़ वन खतरे को और बढ़ा रहे हैं। उत्तरकाशी और टिहरी में कम वर्षा और बढ़ता तापमान जंगलों को सूखा बना रहा है। पिथौरागढ़ के जंगलों में भी आग की घटनाएं बढ़ रही हैं।
इस आग के पीछे मानवीय लापरवाही एक बड़ी वजह हैजंगलों में लगने वाली आग (दावानल) के लिए किसानों द्वारा खेतों में लगाई जाने वाली आग एक बहुत बड़ा और प्रमुख कारण है। अक्सर किसान खेत के अवशेषों (पराली/फसल के डंठल) को जल्दी साफ करने या नई फसल बोने के लिए खेतों में आग लगाते हैं। यदि सावधानी न बरती जाए, तो यह आग पास के जंगलों तक फैल जाती है। जंगल में बिखरे सूखे पत्तों को सफाई के लिए लगाई जाने वाली एक तिल्ली बेकाबू आग का कारण बन जाती है सरकार दूर लगातार ग्रामीणों को जागरूक करने और सजा के प्रावधान के बावजूद कुछ लोग अभी भी लापरवाही की तिल्ली जलाते हैं। इसका मुख्य कारण बढ़ता तापमान और लापरवाही माना गया है। इसलिए जंगलों की सुरक्षा के उपाय खोजे जाने और उनमें लगने वाली आग को समय रहते
बुझाने की व्यवस्था किया जाना जरूरी है। वरना इस आग से निकलने वाले धुएं का प्रदूषण न जाने कितनी गंभीर समस्याएं पैदा करता रहेगा। जंगलों में आग को रोकने और उसके नुकसान को कम करने के लिए तत्काल और दीर्घकालिक उपायों का संयोजन आवश्यक है। (मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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