1971 की त्रासदी को मिले वैश्विक मान्यता

साल 1971 की वह काली रात, जब 25 मार्च को पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में हिंसा और दमन का सिलसिला शुरू हुआ, आज एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा में है। अमेरिका के ओहायो से डेमोक्रेट सांसद ग्रेग लैंड्समैन ने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें उस समय बंगाली हिंदुओं के खिलाफ हुए अत्याचारों को “नरसंहार” और “युद्ध अपराध” के रूप में मान्यता देने की मांग की गई है। यह प्रस्ताव न केवल ऐतिहासिक न्याय की मांग करता है, बल्कि उन लाखों पीड़ितों की पीड़ा को वैश्विक पहचान दिलाने का प्रयास भी है, जिन्हें दशकों से भुला दिया गया था।
25 मार्च 1971 की रात, पाकिस्तान सरकार ने शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया और इसके साथ ही सैन्य कार्रवाई ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ की शुरुआत हुई। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तानी सेना और उसके सहयोगी संगठनों, विशेषकर जमात-ए-इस्लामी से जुड़े कट्टरपंथी तत्वों ने पूर्वी पाकिस्तान में व्यापक हिंसा चलाई। प्रस्ताव के अनुसार, इस दौरान बंगाली हिंदुओं को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। बड़े पैमाने पर हत्याएं, सामूहिक बलात्कार, जबरन धर्म परिवर्तन और विस्थापन की घटनाएं सामने आईं। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस हिंसा के लिए किसी एक पूरे समुदाय को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि यह संगठित सैन्य और उग्रवादी कार्रवाई का परिणाम था। इस ऐतिहासिक घटना का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज ‘ब्लड टेलीग्राम’ भी है, जिसे ढाका में अमेरिकी वाणिज्य दूत आर्चर ब्लड ने वॉशिंगटन भेजा था। इस टेलीग्राम में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि पाकिस्तानी सेना और उसके समर्थक व्यवस्थित रूप से बंगालियों और हिंदुओं की हत्या कर रहे हैं। यह अमेरिकी प्रशासन के उस समय के रुख के खिलाफ एक साहसिक विरोध भी था, जिसने इस मुद्दे को ‘आंतरिक मामला’ बताकर हस्तक्षेप से दूरी बना ली थी।ग्रेग लैंड्समैन द्वारा पेश यह प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति से अपील करता है कि वह इन घटनाओं को औपचारिक रूप से ‘नरसंहार’, ‘युद्ध अपराध’ और ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ के रूप में मान्यता दें। यह कदम न केवल ऐतिहासिक सच्चाई को स्वीकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण होगा, बल्कि भविष्य में ऐसे अत्याचारों को रोकने के लिए भी एक मजबूत संदेश देगा।
1971 का यह अध्याय केवल बांग्लादेश के इतिहास का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मानवता के लिए एक चेतावनी भी है कि सत्ता और कट्टरता का गठजोड़ किस तरह निर्दोष लोगों के जीवन को तबाह कर सकता है। आज, जब यह मुद्दा फिर से वैश्विक मंच पर उठ रहा है, तो यह उम्मीद की जा सकती है कि न्याय और स्मृति की यह लड़ाई अब एक नए मुकाम तक पहुंचेगी।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



