ज्ञान का अनन्त प्रवाह है अखबार

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के सभी सरकारी बेसिक और माध्यमिक स्कूलों में छात्रों के लिए अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। शिक्षा विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, स्कूलों की सुबह की प्रार्थना सभा में 10 मिनट का समय अखबार पठन के लिए तय किया गया है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों अखबारों को शामिल किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य छात्रों में पढ़ने की आदत विकसित करना, स्क्रीन टाइम कम करना, सामान्य ज्ञान बढ़ाना और आलोचनात्मक सोच को मजबूत करना है। ज्यादातर अभिभावकों का भी यही कहना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य करने
संबंधी फैसला लेकर सराहनीय कदम उठाया है।
इसमंे कोई दो राय नहीं कि मोबाइल और सोशल मीडिया की लत ने यंगिस्तान को पढ़ाई से दूर कर दिया है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चे वर्चुअल दुनिया में ऐसे खो गए हैं कि उन्हें अपने आस पड़ोस में क्या हो रहा, इसकी कोई खबर तक नहीं रहती। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल देखना शुरू कर देते हैं और शाम तक यही प्रक्रिया चलती रहती है। कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों के हाथों में मोबाइल थमा दिया। अब यह कहीं न कहीं बच्चों के भविष्य में रुकावट बन रहा है। बच्चे अब पढ़ाई और खेल मैदान से दूर होते जा रहे हैं। समय-समय पर प्रबुद्ध लोगों ने मोबाइल फोन के बढ़ते प्रचलन पर चिंता जताई है। सोशल मीडिया और इंटरनेट की लत युवाओं को न केवल पढ़ाई से दूर कर रही है, बल्कि युवा वर्ग खेल के मैदान से भी दूर होता जा रहा है। अभिभावकों को इस विषय पर ध्यान देने की खासी जरूरत है। पढ़ने की लत डालकर लाड प्यार में बच्चों और युवाओं का भविष्य बर्बाद होने से बचाया जा सकता है।
उत्तर प्रदेश की सरकार ने इस हालात से निबटने के लिए प्राथमिक कदम उठाया है। इससे विद्यार्थियों को कई फायदे होंगे। देश के हर स्कूल में प्रार्थना सभा के दौरान कुछ समय अखबार पढ़ने के लिए निर्धारित होना चाहिए। आज जब डिजिटल माध्यमों पर हद से ज्यादा निर्भरता बढ़ गई है और फेक न्यूज का तेजी से प्रचार-प्रसार हो रहा है, तब अखबार ही जागरूकता का सबसे बड़ा जरिया है। जो बच्चे रोजाना अखबार पढ़ते हैं, उनका शब्दज्ञान बेहतर हो जाता है। उनमें पढ़ने की आदत तो विकसित होती ही है, वे अपने विचारों को अधिक कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त कर पाते हैं। ऐसे विद्यार्थी एकाग्रचित्त होकर अध्ययन कर पाते हैं। परीक्षा में उत्तर लिखते समय इसका फायदा होता है। प्रायः ऐसे प्रयासों को यह कहकर खारिज किया जाता है कि स्कूली बच्चों का खबरों की दुनिया से कोई लेना-देना नहीं होता, लिहाजा उन्हें सिर्फ पाठ्य-पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। वास्तव में यह धारणा सही नहीं है। भले ही अखबारों में छपने वाली खबरों का स्कूली पढ़ाई और परीक्षाओं से ज्यादा संबंध न हो, लेकिन उन्हें पढ़ने-सुनने से विद्यार्थियों के सोचने-समझने का नजरिया बदलता है। चाहे उन्हें शुरुआत में कई खबरें समझ में न आएं। एक समय ऐसा आएगा, जब वे खबरों में रुचि लेने लगेंगे। उनकी समझ बढ़ेगी। आज स्कूलों में कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें फिल्मी सितारों के बारे में तो बहुत कुछ मालूम है। वे देश के प्रमुख पदों पर सेवारत लोगों के नाम नहीं जानते।
ये बच्चे जब भविष्य में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं तो बहुत मुश्किलों का सामना करते हैं। इन्हें सामान्य ज्ञान और सम-सामयिक घटनाओं के बारे में कई किताबें पढ़नी पड़ती हैं। इसमें काफी समय लगता है। स्कूलों में अखबार पढ़ना अनिवार्य कर देने से इन बच्चों का भला हो जाएगा। कई लोग कहते हैं- बच्चे स्कूलों में अखबार पढ़ेंगे तो बाकी पढ़ाई कब करेंगे? क्या इससे कक्षाओं के कालांश बाधित नहीं होंगे? ऐसी आशंकाएं निराधार हैं। प्रार्थना सभा में अखबार की बड़ी खबरें पढ़ने में 10 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा। अगर कोई ऐसी खबर है, जिससे सामान्य ज्ञान आदि का प्रश्न बनाया जा सकता है तो उसे स्कूल के नोटिस बोर्ड पर लिखा जा सकता है। बाद में, बच्चे वहां से अपनी नोटबुक में लिख सकते हैं। इससे उनके पास कुछ ही दिनों में महत्त्वपूर्ण जानकारी का भंडार हो जाएगा। शनिवार को छुट्टी से पहले और विशेष अवसरों पर इन प्रश्नों पर आधारित प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा सकता है। उनमें विजेता विद्यार्थियों को पुरस्कृत करने से उनका उत्साह बढ़ेगा। ये बच्चे फेक न्यूज और साइबर ठगी से लड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। असली खबर क्या है, अफवाह क्या है, साइबर ठग कैसे लोगों को शिकार बना रहे हैं – इन सवालों के जवाब इन्हें अखबारों से मिल जाएंगे। हाल के वर्षों में आईएएस, आईपीएस, सेना के वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और वैज्ञानिक तक साइबर ठगों के
शिकार बन गए, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि बदलते दौर के साथ अपराधों के तौर-तरीके बदल रहे हैं। अगर वे रोजाना अखबार पढ़ते तो उन्हें इस बात की जानकारी होती। पांच रुपए का अखबार और उसे पढ़ने के लिए दिया गया समय,
ऐसा निवेश है जो भविष्य में
आपके करोड़ों रुपए बचा सकता है। किशोर हों या बुजुर्ग, अखबार पढ़ने को अपनी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
संभव है कि देश के दूसरे प्रदेशों में भी राज्य सरकारों द्वारा यूपी सरकार के तर्ज पर तमाम स्कूलों में बच्चों को नवीनतम ज्ञान से अपडेट रखने के लिए अखबारों के पठन-पाठन के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे। यह कोविड के बाद से सर्कुलेशन से जूझ रहे अखबारों के लिए भी संजीवनी का काम करेगा।(मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)



