काठमांडू में ज्ञानेंद्र शाह की जयकार

काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा के बाहर 13 फरवरी को जो दृश्य सामने आया, उसने नेपाल की राजनीति में दबी पड़ी एक बहस को फिर से सतह पर ला दिया। हजारों की संख्या में जुटे लोग नेपाल के पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के स्वागत में सड़कों पर उतरे और लगभग दो दशक पहले समाप्त की गई राजशाही की बहाली की मांग करने लगे। यह प्रदर्शन केवल एक व्यक्ति के समर्थन का नहीं, बल्कि उस असंतोष की अभिव्यक्ति था जो देश की मौजूदा गणतांत्रिक व्यवस्था को लेकर समाज के एक हिस्से में गहराता जा रहा है। पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह जब पूर्वी नेपाल की यात्रा से लौटकर काठमांडू पहुंचे, तो उन्होंने अपनी गाड़ी की सनरूफ से हाथ हिलाकर समर्थकों का अभिवादन किया। नारे लगाते, राष्ट्रीय झंडे लहराते और फूल बरसाते प्रदर्शनकारियों ने उन्हें “राष्ट्रीय उद्धारक” के रूप में प्रस्तुत किया। भीड़ ने संवैधानिक राजशाही की वापसी की मांग करते हुए कहा कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था देश को स्थिरता और दिशा देने में विफल रही है। दिलचस्प यह रहा कि प्रशासन ने हवाई अड्डे के आसपास बड़े जमावड़े पर रोक लगा रखी थी और पांच से अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध था। इसके बावजूद, समर्थकों की भारी मौजूदगी ने इन आदेशों को लगभग अप्रभावी कर दिया। सुरक्षा बलों की बड़ी तैनाती के बीच प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और किसी गिरफ्तारी की सूचना नहीं मिली, लेकिन यह साफ हो गया कि राजशाही समर्थक भावनाएं अब हाशिये तक सीमित नहीं रहीं। इस प्रदर्शन में राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ कमल थापा, नवराज सुबेदी और दुर्गा प्रसाई जैसे राजशाही समर्थक नेताओं के अनुयायी भी शामिल थे। आयोजकों ने सुबह से ही समर्थकों को जुटाना शुरू कर दिया था। हवाई अड्डे से लेकर पूर्व राजा के निजी आवास तक सड़क के दोनों ओर खड़े लोग यह संकेत दे रहे थे कि राजशाही के प्रति ‘नॉस्टेल्जिया’ एक संगठित रूप ले रहा है। नेपाल में 2006 के जन आंदोलन के बाद 2008 में सदियों पुरानी राजशाही को समाप्त कर देश को गणतांत्रिक व्यवस्था में बदला गया था लेकिन बीते 18 वर्षों में लगातार सरकारें बदलने, आर्थिक संकट, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता के एक वर्ग को निराश किया है। ऐसे में कुछ लोग मानने लगे हैं कि एक संवैधानिक राजा, जो दलगत राजनीति से ऊपर हो, देश को एकता और स्थिरता का प्रतीक दे सकता है।यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब नेपाल में मार्च की शुरुआत में संसदीय चुनाव होने वाले हैं। राजनीतिक अस्थिरता और युवाओं के नेतृत्व में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच यह रैली चुनावी बहस को और तेज कर सकती है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि व्यापक समर्थन के बिना राजशाही की तत्काल बहाली संभव नहीं है, लेकिन यह साफ है कि यह मुद्दा अब केवल अतीत की बात नहीं रहा। काठमांडू हवाई अड्डे पर दिखी भीड़ इस बात का संकेत है कि नेपाल एक बार फिर एक चैराहे पर खड़ा है, जहां एक ओर गणतांत्रिक व्यवस्था की चुनौतियां हैं, तो दूसरी ओर राजशाही की वापसी की मांग।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



