विश्व-लोक

किसानों की आमदनी बढ़ाने की पहल

सरकार द्वारा किसानों के हित में 25 लाख टन गेहूं और 5 लाख टन चीनी के निर्यात को मंजूरी दिया जाना रबी सीजन के बीच एक महत्वपूर्ण नीतिगत कदम माना जा रहा है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है, जब देश में कृषि उत्पादन संतोषजनक रहा है और किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने की चुनौती सरकार के सामने बनी हुई है। इस निर्णय को केवल निर्यात अनुमति भर नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक बाजार में गेहूं और चीनी की मांग में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह हमेशा एक संतुलन का सवाल रहा है कि घरेलू खाद्य सुरक्षा बनाए रखते हुए किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से कैसे जोड़ा जाए। भारत सरकार का यह फैसला इसी संतुलन की कोशिश के तौर पर सामने आया है। सरकार का दावा है कि सरकारी भंडार में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है, जिससे घरेलू जरूरतों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। किसानों के लिए यह निर्णय इसलिए भी अहम है क्योंकि निर्यात बढ़ने से मंडियों में मांग बढ़ेगी और इसके साथ ही कीमतों में सुधार की संभावना बनेगी। खासकर गेहूं उत्पादक राज्यों- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में किसान लंबे समय से लागत बढ़ने और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बावजूद सीमित लाभ की शिकायत करते रहे हैं। निर्यात की अनुमति से निजी व्यापारियों और निर्यातकों की सक्रियता बढ़ेगी, जिसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ सकता है। चीनी के निर्यात को मंजूरी देना भी गन्ना किसानों के लिए राहत की खबर है। चीनी उद्योग लंबे समय से अधिशेष उत्पादन और भुगतान में देरी की समस्या से जूझता रहा है। जब चीनी का निर्यात बढ़ता है, तो मिलों की नकदी स्थिति सुधरती है और इसका फायदा गन्ना किसानों को समय पर भुगतान के रूप में मिलता है। 5 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति से उम्मीद की जा रही है कि चीनी मिलें अपने बकाया भुगतान को तेजी से निपटाने में सक्षम होंगी। हालांकि, इस फैसले पर कुछ आशंकाएँ भी जताई जा रही हैं। खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि निर्यात नीति में किसी भी तरह की जल्दबाजी से घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव पड़ सकता है, खासकर यदि मौसम या उत्पादन में अचानक गिरावट आती है। सरकार के लिए यह जरूरी होगा कि वह निर्यात की निगरानी करे और जरूरत पड़ने पर नीति में लचीलापन दिखाए। कुल मिलाकर, गेहूं और चीनी के निर्यात को
मंजूरी देने का फैसला किसानों के लिए एक सकारात्मक संकेत है। यह बताता है कि सरकार कृषि को केवल उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि बाजार और आय से जोड़कर देखने की कोशिश कर रही है। यदि इस नीति को सावधानी और पारदर्शिता के साथ लागू किया गया, तो यह न केवल रबी सीजन में किसानों का मनोबल बढ़ाएगा, बल्कि भारतीय कृषि को वैश्विक बाजार में एक मजबूत दावेदार के रूप में भी स्थापित कर सकता है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)

 

 

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