सुप्रीम कोर्ट का एक दुर्लभ फैसला

मौत के बाद इंसान का क्या होता-यह हम लोग नहीं जानते। कुछ लोग ऐसा ज्ञान भले ही बताएं जो अंध विश्वास ही कहा जाएगा लेकिन मौत से पहले इंसान क्या होता है यह हम सब प्रत्यक्ष देखते भी हैं और अनुभव भी करते हैं। इसलिए जीवित रहते इंसानियत की दृष्टि से फैसले लिये जाने चाहिए। जीवन में कभी-कभी असमंजस भरे पल आते हैं जब यह फैसला करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है कि क्या करना चाहिए। उत्तर प्रदेश के ही गाजियाबाद निवासी हरीश राणा और उनके परिजनों के सामने भी ऐसे ही असमंजस भरे पल आ गये। एक किशोर पिछले 13 साल सेे अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़ा था। वह सौ फीसद दिव्यांगता का शिकार हो चुका था लेकिन उसकी मौत नहीं हुई। बिस्तर पर पड़े रहने से शरीर घाव से भर गया था और सेवा करने वालों के हाथ भी थक चुके थे। ऐसे में परिजनों ने हरीश राणा की इच्छा मृत्यु की याचना देश की सबसे बड़ी अदालत से की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अब तक इस प्रकार की इजाजत किसी को नहीं दी है लेकिन कानून ने इंसानियत को तरजीह दी। सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। देश का यह पहला मामला बताया जा रहा है। यह फैसला उन तमाम लोगों तक पहुंचना चाहिए जिनके परिजन वर्षों से बिस्तर पर पड़े हुए हैं और ब्रेन डेथ का इंतजार कर रहे हैं। कम से कम दो मामलों के बारे में मैं स्वयं जानता हूं। उनके बारे में बाद में बताऊंगा, पहले हरीश राणा की दर्दनाक कहानी का उल्लेख कर रहे हैं।
भारत की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले करीब 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव युथनेसिया (इच्छा मृत्यु) देने की मांग पर फैसला सुनाते हुए उसे इच्छा मृत्यु की मंजूरी दे दी है। कोर्ट ने कहा है कि हरीश राणा को एआईआईएम के पैलिएटिव केयर में भर्ती किया जाएगा ताकि मेडिकल ट्रीटमेंट वापस लिया जा सके। बता दें कि भारत में ये पैसिव यूथेनेसिया का पहला मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को पैसिव युथनेसिया यानी इच्छा मृत्यु की मंजूरी देते हुए कहा कि ये निश्चित किया जाना चाहिए कि डिग्निटी के साथ इस प्रक्रिया को पूरा किया जाए। बता दें कि पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के घरवालों से बात भी की थी। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पारदीवाला ने कहा था कि यह बेहद दुःखद रिपोर्ट है। यह हमारे लिए मुश्किल फैसला है पर हम इस लड़के को यूं अपार दुःख में नहीं रख सकते। हम उस स्टेज में हंै जहां आज हमें आखिरी फैसला लेना होगा।
गाजियाबाद के हरीश राणा करीब 13 साल से अचेत अवस्था में पड़े हुए हैं। जानकारी के मुताबिक, चंडीगढ़ में रह कर पढ़ाई कर रहे हरीश 2013 में अपने हॉस्टल की चैथी मंजिल से गिर गए थे। इससे उनके सिर में गंभीर चोंटें आईं थी। उसके बाद से वह लगातार बिस्तर में अचेत हालत में थे। लगातार बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनके शरीर पर घाव बन गए है।हरीश राणा के माता-पिता बेटे के ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके हैं। हरीश 100 फीसदी दिव्यांगता के शिकार हो चुके हैं। ऐसे में उनके माता-पिता ने ही कोर्ट से उसे इच्छा मृत्यु देने की मांग की थी। एम्स की रिपोर्ट के मुताबिक हरीश राणा के ठीक होने की उम्मीद नहीं थी। ध्यान रहे कुछ लोग ऐसी बीमारी के भी शिकार हो जाते हैं कि वो चल-फिर नहीं सकते। वो देख-सुन सकते हैं। समझ सकते हैं। महसूस कर सकते हैं। मगर अपने एहसास को बयां नहीं कर सकते। इस बीमारी को एएलएस या एमायोट्रॉफिक लैटेरल स्क्लेरोसिस कहते हैं।
कुछ ऐसा ही हुआ था जर्मनी की वालट्रॉट फैनरिक के साथ। उनके पति जोआचिम ने बताया कि 2007 में जमीन पर गिरे सिक्के को उठाते वक्त वालट्रॉट के साथ जाने क्या हुआ कि वो गिर पड़ीं और फिर नहीं उठ सकीं। तीन महीने बाद उन्हें पता चला कि वालट्रॉट को एमायोट्रॉफिक लैटेरल स्क्लेरोसिस या एएलएस है। दोनों की जिंदगी तो तबाह सी हो गई। ये हादसा मई 2007 में पेश आया था। वालट्रॉट के सांस लेने के सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया था। जोआचिम कहते हैं कि जब उन्हें ये पता चला तो वो सारा दिन अस्पताल में रोते फिरते रहे। वो समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर इतनी जल्दी जिंदगी कैसे बदल गई। कुछ महीने पहले फैनरिक दंपति हाथों में हाथ डाले बागों की सैर किया करते थे। डॉक्टरों ने बताया कि वालट्रॉट पूरी तरह से कोमा में चली गई उसी हाल में वो अर्से तक रहीं। ऐसा नहीं कि वालट्रॉट को कुछ महसूस नहीं होता। उन्हें कमरे की गर्मी सर्दी का एहसास होता था। एक जगह पर बरसों से पड़े रहने का दर्द भी होता था। वो लोगों की बातें भी सुन सकती थीं। मगर उनका दिमाग क्या सोच रहा है? ये किसी को पता नहीं चलता था। प्रमुख लाइलाज बीमारियों में कैंसर, अल्जाइमर, पार्किंसंस, एचआईवी एड्स, मधुमेह, अस्थमा, सिकल सेल एनीमिया और मल्टीपल स्केलेरोसिस शामिल हैं।
11 मार्च 2026 को अल्जाइमर रोग, जिसकी पहचान सबसे पहले 1906 में डॉ. एलोइस अल्जाइमर ने की थी, एक प्रगतिशील तंत्रिका संबंधी विकार है जो स्मृति और संज्ञानात्मक कार्यों को नष्ट कर देता है। दशकों के शोध के बावजूद, इसके सटीक कारण अभी भी अज्ञात हैं और उपचार केवल इसकी प्रगति को धीमा कर सकते हैं, रोक नहीं सकते। विश्वभर में 5.5 करोड़ से अधिक लोग मनोभ्रंश से पीड़ित हैं और अल्जाइमर इसका सबसे आम कारण है।
इसी प्रकार एमएस, जिसका पहली बार वर्णन 1868 में जीन-मार्टिन चारकोट ने किया था, एक ऑटोइम्यून बीमारी है जिसमें प्रतिरक्षा प्रणाली तंत्रिका तंतुओं के सुरक्षात्मक आवरण पर हमला करती है, जिससे मस्तिष्क और शरीर के बीच संचार बाधित होता है। यह वैश्विक स्तर पर 28 लाख से अधिक लोगों को प्रभावित करता है, जिससे अक्सर विकलांगता हो जाती है। रोग-संशोधक उपचार (डीएमटी) 1990 के दशक में सामने आए, जो रोग की प्रगति को धीमा करने में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुए।
माना जाता है वर्तमान प्रगति रोग-संशोधक उपचार (डीएमटी) रोग की प्रगति को धीमा कर सकते हैं और पुनरावृत्ति को कम कर सकते हैं। भविष्य की उम्मीद क्षतिग्रस्त तंत्रिकाओं की मरम्मत और उनके कार्य को बहाल करने के लिए स्टेम सेल थेरेपी सहित पुनर्योजी चिकित्सा पर शोध किया जा रहा है।इसी क्रम में सेरेब्रल पाल्सी को सबसे पहले विलियम लिटिल ने 1860 के दशक में सेरेब्रल पैरालिसिस के रूप में वर्णित किया था। यह विकासशील मस्तिष्क में क्षति के कारण होने वाले गति और शारीरिक मुद्रा को प्रभावित करने वाले विकारों का एक समूह है। हालांकि यह प्रगतिशील नहीं है, इसके लक्षण व्यापक रूप से भिन्न हो सकते हैं और जीवन की गुणवत्ता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। इस प्रकार
तमाम असाध्य बीमारियां हैं जो
हमारे देश में मध्यम श्रेणी के परिवार को तोड़ देती है। मरीज तो कष्ट झेलता
ही है।(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



