धामी ने खत्म किया मदरसा बोर्ड

उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अल्पसंख्यक शिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव किया है। इससे मदरसों का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। मदरसों की शिक्षा को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे थे। उत्तराखण्ड ही नहीं उत्तर प्रदेश में भी मदरसों की संदिग्ध गतिविधियां सामने आ रही थीं। यूपी मंे योगी सरकार ने सभी मदरसों की जांच का आदेश दिया था। उत्तराखण्ड में भी इसी प्रकार की शिकायतें मिल रही थीं। धामी सरकार ने मदरसा बोर्ड को ही खत्म कर दिया है। अब उसके स्थान पर राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाया गया है। यह व्यवस्था इसी साल जुलाई से प्रारम्भ होगी। राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के लिए आधुनिक एवं गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम निर्धारित करेगा। इसके साथ ही अल्पसंख्यकों के सभी शिक्षा संस्थानों को उत्तराखण्ड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेना अनिवार्य होगा। इस पर प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं। लोगों का मानना है कि मदरसा बोर्ड समाप्त करने का फैसला सेक्यूलरिज्म की दिशा मंे एक महत्वपूर्ण कदम है। यह भी कहा जा रहा है कि मदरसे मौलवी और इमाम बनाते हैं जबकि सरकारी पैसे से धर्म गुरू नहीं बनाये जा सकते। उत्तराखण्ड मदरसा बोर्ड का गठन दिसम्बर 2011 मंे हुआ था। वर्ष 2016 मंे अधिनियम बना और 2019 मंे मान्यता नियमावली तैयार हुई थी।
उत्तराखंड सरकार ने राज्य की अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव करते हुए 1 जुलाई 2026 से मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के विजन के अनुरूप, अब राज्य की सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को एक ही छत के नीचे लाने के लिए उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन कर दिया गया है। विशेष सचिव डॉ। पराग मधुकर धकाते के अनुसार, यह प्राधिकरण अब सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए आधुनिक और गुणवत्तापूर्ण पाठ्यक्रम (सेलेबस) निर्धारित करेगा। साथ ही, इन सभी संस्थानों को अब उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेना अनिवार्य होगा।
इस नवगठित प्राधिकरण की संरचना को बेहद समावेशी और शैक्षणिक दृष्टिकोण से मजबूत बनाया गया है। प्रोफेसर (सेवानिवृत्त) सुरजीत सिंह गांधी को प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। उनके साथ विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिष्ठित विद्वानों और प्रोफेसरों को बतौर सदस्य शामिल किया गया है, जिनमें प्रोफेसर राकेश कुमार जैन, डॉ. सैयद अली हमीद, प्रोफेसर पेमा तेनजिंग, प्रोफेसर गुरमीत सिंह, डॉ. एल्बा मंड्रेले, प्रोफेसर रॉबिन अमन, चंद्रशेखर भट्ट और राजेंद्र सिंह बिष्ट शामिल हैं। इसके अलावा, महानिदेशक (विद्यालय शिक्षा) और निदेशक (एससीईआरटी) को पदेन सदस्य बनाया गया है, जबकि निदेशक (अल्पसंख्यक कल्याण) पदेन सदस्य सचिव की भूमिका में होंगे।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस निर्णय को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को बेहतर और भविष्योन्मुखी शिक्षा प्रदान करना है। अब यह नवगठित प्राधिकरण तय करेगा कि बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाए और उनका सिलेबस क्या हो। डॉ. पराग मधुकर धकाते ने बताया कि बोर्ड में उच्च स्तर के विद्वानों को मनोनीत करने का उद्देश्य यही है कि एक ऐसा शैक्षणिक ढांचा तैयार किया जा सके, जो अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को आधुनिक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करे। अब सभी अल्पसंख्यक विद्यालय उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों के तहत संचालित होंगे, जिससे पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता और एकरूपता आएगी।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी राज्य के मदरसों में होने वाली फंडिंग पर सख्त निगरानी बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है। विशेष रूप से विदेशी स्रोतों से आने वाली धनराशि की गहन जांच कराई जाएगी, ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर लगाम लगाई जा सके। सरकार के निर्देश पर अब सभी मदरसों के वित्तीय लेन-देन की विस्तृत जांच होगी। इसमें मदरसों को मिलने वाली फंडिंग के स्रोतों का पता लगाना मुख्य उद्देश्य है। अधिकारी न केवल संस्थागत खातों की जांच करेंगे, बल्कि मदरसा संचालकों और प्रबंधकों के निजी बैंक खातों की भी पड़ताल करेंगे। इससे यह स्पष्ट होगा कि धन कहां से आ रहा है और उसका उपयोग कैसे हो रहा है। एक महत्वपूर्ण पहलू मदरसों के भवन निर्माण में लगने वाली राशि का स्रोत पता लगाना भी है। कई मामलों में देखा गया है कि कुछ मदरसों में आय के ज्ञात स्रोतों से मेल नहीं खाती, लेकिन आधुनिक और बड़े भवन बने हुए हैं। ऐसे मदरसों के निर्माण खर्च की जांच विशेष रूप से की जाएगी, ताकि विदेशी फंडिंग या अनियमित स्रोतों से आए धन का उपयोग स्पष्ट हो सके। यह कदम योगी आदित्यनाथ सरकार की उस नीति का हिस्सा है, जिसमें सुरक्षा, पारदर्शिता और कानूनी अनुपालन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। अधिकारियों का कहना है कि जांच एटीएस स्तर की विशेष जांच टीम (एसआईटी) या संबंधित एजेंसियों के माध्यम से की जाएगी, जिसमें जिला स्तर पर भी रिपोर्ट मांगी जाएंगी। मदरसों से जुड़े सभी दस्तावेज, बैंक स्टेटमेंट और दानदाताओं की जानकारी जुटाई जाएगी।
उत्तराखण्ड में करीब 450 पंजीकृत मदरसे हैं, जो शासन को दस्तावेज, बैंक खाते और आय-व्यय का पूरा ब्योरा देते हैं, जबकि 500 से अधिक मदरसे बिना मान्यता संचालित हो रहे हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चों का सत्यापन और आर्थिक स्रोतों की जांच जिला प्रशासन के जरिए कराई जा रही है। यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि इन संस्थानों को किस स्रोत से धन मिल रहा है और उसका उपयोग कहां हो रहा है। सरकार के अनुसार, जसपुर, बाजपुर, किच्छा, काशीपुर, रुद्रपुर, गदरपुर, पछवादून और हरिद्वार जैसे कस्बों में बिना पंजीकरण के मदरसों के संचालन की सूचनाएं मिली हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक सील किए गए गैर-पंजीकृत मदरसों में उधम सिंह नगर के 64, देहरादून के 44, हरिद्वार के 26 और पौड़ी गढ़वाल के 2 मदरसे शामिल हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा था, प्रदेश में अवैध मदरसों, मजार और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी रहेगी। अवैध रूप से बड़े पैमाने पर मदरसों का संचालन गंभीर विषय है जिसकी जांच के लिए अधिकारियों को जरूरी दिशा-निर्देश दिए गए। उत्तराखंड मदरसा शिक्षा परिषद के अध्यक्ष मुफ्ती शमून कासमी ने कहा कि यह कार्रवाई सरकार के आदेश पर प्रशासनिक रूप से हुई है, और यह केवल उन मदरसों पर लागू है जो अवैध हैं। अब धामी सरकार एक पारदर्शी व्यवस्था लागू करने जा रही है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



