लेखक की कलम

किसान की मेहनत का तिरस्कार

किसानों को हम अन्न देवता यूं ही नहीं कहते। वे खेत से लेकर खलिहान तक पसीना बहाकर, वारिश में भीगकर और सर्दियों में ठिठुरते हुए अनाज उगाते हैं। यह अनाज सिर्फ किसानों का पेट नहीं भरता है बल्कि हम सभी की भूख उसी से बुझती है। किसान सिर्फ अपने लिए अनाज या सब्जी और फल नहीं पैदा करता है। यह ठीक है कि इसका उसे मूल्य मिलता है लेकिन भूख लगने पर सिक्के और कागज के नोट नहीं खाये जा सकते। किसान की मेहनत से उगाया गया अनाज तिरस्कृत होता है तो न सिर्फ अन्न देवता को कष्ट होता है बल्कि यह एक तरह का पाप है। मध्य प्रदेश में जिस तरह खुले में रखा धान खराब हुआ है, उसे देखकर बहुत तकलीफ होती है। इस प्रकार का अपराध करने वालों को भी सजा मिलनी चाहिए। भारतीय खाद्य निगम के अनुसार अब 77 फीसद अनाज की बरबादी रोकी जा रही है लेकिन हर साल करोड़ों का अनाज बरबाद हो रहा है।
मध्य प्रदेश के पन्ना जिले से सरकारी अनाज के रखरखाव को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। यहां बड़ागांव और लक्ष्मीपुर खरीदी केंद्रों में हजारों क्विंटल धान महीनों से खुले आसमान के नीचे पड़ा हुआ है। लगातार बारिश और उचित भंडारण के अभाव में धान खराब होने लगा है। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि कई जगह अनाज के ढेरों से कोंपलें और पौधे निकल आए हैं। यह स्थिति न केवल सरकारी लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि किसानों से खरीदे गए अनाज की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। मामला सामने आने के बाद खाद्य विभाग भी सक्रिय हुआ है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि शिकायत और जानकारी उनके संज्ञान में आई है। पूरे मामले की जांच कराई जाएगी और यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। सरकारी धान की बर्बादी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर हजारों क्विंटल अनाज खुले में कैसे पड़ा रहा, इसकी जिम्मेदारी किसकी है और हुए नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
बताया जाता है कि बड़ागांव और लक्ष्मीपुर खरीदी केंद्रों में बड़ी मात्रा में धान खुले में रखा हुआ था। बारिश का पानी लगातार धान पर गिरता रहा, लेकिन उसे सुरक्षित गोदामों तक पहुंचाने या उसके संरक्षण के लिए समय पर जरूरी इंतजाम नहीं किए। इसका नतीजा यह हुआ कि धान की गुणवत्ता प्रभावित होने लगी और बड़ी मात्रा में अनाज खराब हो गया। खराब रखरखाव की सबसे बड़ी तस्वीर यह है कि कई स्थानों पर धान के ढेरों से अंकुर फूटने लगे हैं। अनाज में नमी बढ़ने के कारण उसमें से छोटे-छोटे पौधे उग आए हैं। यह इस बात का संकेत है कि धान लंबे समय से खुले में पड़ा रहा और उसकी सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार एजेंसियों ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
सरकार किसानों से समर्थन मूल्य पर धान खरीदती है और उसके सुरक्षित भंडारण की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसियों को सौंपती है लेकिन इस मामले में लापरवाही की वजह से सरकारी अनाज खराब हो रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि समय रहते धान का उठाव कर सुरक्षित गोदामों में रखा जाता तो यह नुकसान टाला जा सकता था। अब खराब हो रहे धान से शासन को लाखों रुपये की आर्थिक क्षति होने की आशंका जताई जा रही हैस्थानीय नागरिकों का कहना है कि हर साल खरीदी के बाद भंडारण व्यवस्था को लेकर दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति कुछ और ही नजर आती है। उनका सवाल है कि जब अनाज की सुरक्षा के लिए पूरी व्यवस्था और बजट उपलब्ध है, तो फिर इतनी बड़ी मात्रा में धान खुले में क्यों पड़ा रहा।
भारतीय खाद्य निगम द्वारा खरीदे गए अनाज के मूल्य में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2025-26 में खराब हुए अनाज के मूल्य में लगभग 77 फीसद की कमी आई है। प्राकृतिक आपदाओं को अनाज खराब होने का मुख्य कारण बताया गया है। सरकार ने आधुनिक साइलो के निर्माण और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया है। देश में हर साल करोड़ों टन गेहूँ और चावल की खरीद भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से की जाती है। यही अनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली, कल्याणकारी योजनाओं और आपातकालीन जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा जाता है। इतने बड़े स्तर पर भंडारण होने के कारण हर वर्ष कुछ मात्रा में अनाज खराब होने की घटनाएँ भी सामने आती हैं, जिससे सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान होता है।
हालांकि, वर्ष 2025-26 में इस नुकसान में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। संसद में सरकार ने बताया कि खराब हुए अनाज के मूल्य में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 77 फीसद की गिरावट आई है। सरकार का कहना है कि अनाज खराब होने का कारण भंडारण क्षमता की कमी नहीं, बल्कि चक्रवात, बाढ़ और मूसलाधार बारिश जैसी प्राकृतिक घटनाएँ रहीं। इसके साथ ही आधुनिक साइलो के निर्माण और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है।
खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों की राज्य मंत्री निमुबेन जयंतीभाई बांभणिया ने संसद में लिखित उत्तर में बताया कि चक्रवात, बाढ़, मूसलाधार बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाएँ अनाज को नुकसान पहुँचाने के प्रमुख कारण हैं। कई बार अत्यधिक बारिश या बाढ़ जैसी परिस्थितियों में सुरक्षित भंडारण के बावजूद अनाज प्रभावित हो जाता है। सरकार के अनुसार, इन परिस्थितियों से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए लगातार निगरानी और प्रबंधन की व्यवस्था की जाती है।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में खराब हुए अनाज का मूल्य 13.9 करोड़ रुपये था, जो 2025-26 में घटकर 3.2 करोड़ रुपये रह गया। यानी एक वर्ष में नुकसान के मूल्य में लगभग 77 फीसद की कमी दर्ज की गई। यह गिरावट बताती है कि नुकसान को सीमित करने के लिए किए गए प्रयासों का असर देखने को मिला है। हालांकि सरकार ने यह भी माना कि प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है। सरकार ने संसद में स्पष्ट किया कि भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में भंडारण क्षमता की कमी के कारण अनाज का कोई नुकसान नहीं हुआ। यानी खराब हुए अनाज को भंडारण स्थान की कमी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। सरकार का कहना है कि उपलब्ध भंडारण व्यवस्था के अनुरूप ही अनाज रखा जाता है और नुकसान के मामलों की अलग-अलग जाँच कराई जाती है।
संसद में साझा किए गए आँकड़ों के अनुसार, हाल के वर्षों में सबसे अधिक नुकसान 2023-24 में हुआ, जब खराब हुए अनाज का मूल्य 14.5 करोड़ रुपये रहा। इसके बाद 2024-25 में यह 13.9 करोड़ रुपये दर्ज किया गया। वहीं 2021-22 और 2022-23 में नुकसान 2.5 करोड़ रुपये रहा था। वर्ष 2025-26 में नुकसान घटकर 3.2 करोड़ रुपये रह जाना इस बात का संकेत है कि नुकसान कम करने के प्रयासों का असर दिख रहा है।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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