गौरवशाली भारतीय गणतंत्र

हमें गर्व है कि इस बार हम लोग 77वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद हमने लेाकतंत्र अर्थात् जनतंत्र को अपनाते हुए अपना संविधान बनाया। इसके लिए एक सभा का आयोजन किया गया था और लम्बे समय तक विचार मंथन के बाद 26 नवम्बर 1949 को संविधान तैयार हुआ था। देश का संविधान आधिकारिक तौर पर 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था। इसलिए प्रतिवर्ष 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस मनाते हैं और देश की आजादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वाले, संघर्ष करने वालों को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए भारत की अखंडता को बनाये रखने का संकल्प लेते हैं। हमंे बिस्मिल की भी याद आती है, जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत
को चैलेंज करते हुए कहा था
‘सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है’। बाल गंगाधर राव तिलक का स्मरण आता है जिन्होंने नारा दिया था- स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा का जयगान करने वाले श्यामलाल गुप्त भी याद आते हैं और गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर का स्मरण भी होता है जिन्होंने जन-गणमन अधिनायक जय हे का राष्ट्रगान दिया जो आज भी ससम्मान गाया जाता है।
भारत के गणतंत्र की यात्रा 1930 से शुरू हुई थी और 1930 से 1947 तक 30 जनवरी को ही स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता रहा। इसके बाद 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर से यूनियन जैक को हटाकर भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया। देश का संविधान तैयार करने के लिए एक समिति गठित की गयी जिसने 2 साल 11 महीने 17 दिन मंे 26 नवम्बर 1949 को संविधान तैयार किया। इसे 26 जनवरी 1950 से हम भारतीयों ने स्वयं पर लागू किया। भारत को गणतंत्र राष्ट्र बनाने के बारे में कांग्रेस के लाहौर सत्र में 31 दिसम्बर 1929 को रात मे विचार किया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित अटल बिहारी बाजपेयी ने जिस राबी की शपथ को एक कविता मंे अधूरा बताया है, उसीे राबी के तट पर भारत के रणबांकुरों ने शपथ ली थी कि 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाएंगे। ताकि ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता की मांग की जा सके। इस शपथ मंे क्रांतिकारी भी शामिल थे।
हमारे देश भारत की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो हमंे दुनिया भर मंे नहीं मिलतीं। इनमंे सबसे बड़ी है अनेकता मंे एकता। यहां हर जाति, धर्म वर्ग, सम्प्रदाय के लोग एक साथ मिलजुलकर रहते हैं और तीज त्योहार भी मनाते हैं। इस देश मंे ही एक-दूसरे की संस्कृति का सम्मान भी किया जाता है। यहां की जलवायु और मौसम दुनिया भर मंे नहीं मिलते। भारत के पारंपरिक व्यंजन भी दुनिया भर में देश की शान बढ़ाते हैं। सरसों के साग के साथ मक्के की रोटी और रसभरी जलेबी। भारत के इस छोर से उस छोर तक संस्कृति की विभिन्नताओं को साफतौर पर देखा जा सकता है। हिन्दी के साथ मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया, कन्नड़, तमिल और तेलुगु के साथ आमार सोनार बांग्ला वाली बंगाली की मिठास सहज ही आकर्षित कर लेती है। भारत का ही गणतंत्र है जहां सभी को अपनी बात कहने की पूरी स्वतंत्रता है। इसलिए हमंे अपने गणतंत्र पर गर्व है।
एक गणराज्य या गणतंत्र सरकार का एक ऐसा रूप है जिसमें देश को एक ‘सार्वजनिक मामला’ माना जाता है, न कि शासकों की निजी संस्था या सम्पत्ति। एक गणराज्य के भीतर सत्ता के प्राथमिक पद विरासत में नहीं मिलते हैं। यह सरकार का एक रूप है जिसके अन्तर्गत राज्य का प्रमुख राजा नहीं होता। प्राचीनकाल में दो प्रकार के राज्य कहे गए हैं। एक राजाधीन और दूसरे गणाधीन। राजाधीन को एकाधीन भी कहते थे। जहाँ गण या अनेक व्यक्तियों का शासन होता था, वे ही गणाधीन राज्य कहलाते थे। इस विशेष अर्थ में पाणिनि की व्याख्या स्पष्ट और सुनिश्चित है। उन्होंने गण को संघ का पर्याय कहा है (संघोद्धौ गणप्रशंसयो (अष्टाध्यायी 3,3,86)। साहित्य से ज्ञात होता है कि पाणिनि और बुद्ध के काल में अनेक गणराज्य थे। तिरहुत से लेकर कपिलवस्तु तक गणराज्यों का एक छोटा सा गुच्छा गंगा से तराई तक फैला हुआ था। बुद्ध शाक्यगण में उत्पन्न हुए थे। लिच्छवियों का गणराज्य इनमें सबसे शक्तिशाली था, उसकी राजधानी वैशाली थी किंतु भारतवर्ष में गणराज्यों का सबसे अधिक विस्तार वाहीक (आधुनिक पंजाब) प्रदेश में हुआ था।
पंजाब के उत्तरपश्चिम और उत्तरपूर्व में भी अनेक छोटे-मोटे गणराज्य थे, उनका एक श्रृखला त्रिगर्त (वर्तमान काँगड़ा) के पहाड़ी प्रदेश में विस्तारित हुआ था जिन्हें पर्वतीय संघ कहते थे। दूसरा श्रृखला सिंधु नदी के दोनों तटों पर गिरिगहवरों में बसने वाले महाबलशाली जातियों का था जिन्हें प्राचीनकाल में ग्रामीणाय
संघ कहते थे। वे ही वर्तमान के कबायली हैं। इनके संविधान का उतना अधिक विकास नहीं हुआ जितना
अन्य गणराज्यों का। वे प्रायः लूटमार कर जीविका चलाने वाले थे। इनमें
भी जो कुछ विकसित थे, उन्हें
पूग और जो पिछड़े हुए थे उन्हें ब्रात कहा जाता था। संघ या गणों का एक तीसरा गुच्छा सौराष्ट्र में विस्तारित हुआ था। उनमें अंधकवृष्णियों का
संघ या गणराज्य बहुत प्रसिद्ध था। कृष्ण इसी संघ के सदस्य थे अतएव शांतिपूर्व में उन्हें अर्धभोक्ता राजन्य कहा गया है।
भारतीय गणशासन के संबंध में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। गण के निर्माण की इकाई कुल थी। प्रत्येक कुल का एक एक व्यक्ति गणसभा का सदस्य होता था। उसे कुलवृद्ध या पाणिनि के अनुसार गोत्र कहते थे। उसी की संज्ञा वंश्य भी थी। प्रायः ये राजन्य या क्षत्रिय जाति के ही व्यक्ति होते थे। ऐसे कुलों की संख्या प्रत्येक गण में परंपरा से नियत थी, जैसे लिच्छविगण के संगठन में 7707 कुटुंब या कुल सम्मिलित थे। उनके प्रत्येक कुलवृद्ध की संघीय उपाधि राजा होती थी। सभापर्व में गणाधीन और राजाधीन शासन का विवेचन करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि साम्राज्य शासन में सत्ता एक व्यक्ति के हाथ में रहती है। किंतु गण शासन में प्रत्येक परिवार में एक एक राजा होता है। (गृहे गृहेहि राजानः स्वस्य स्वस्य प्रियंकराः, सभापर्व, 14,2)। इसके अतिरिक्त दो बातें और कही गई हैं। एक यह कि गणशासन में प्रजा का कल्याण दूर दूर तक व्याप्त होता है। दूसरे यह कि युद्ध से गण की स्थिति सकुशल नहीं रहती। गणों के लिए शम या शांति की नीति ही थी। यह भी कहा है कि गण में परानुभाव या दूसरे की व्यक्तित्व गरिमा की भी प्रशंसा होती है और गण में सबको साथ लेकर चलनेवाला ही प्रशंसनीय होता है। आज हमारे पड़ोस में ही पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका में गण अर्थात् जनता को अपने तंत्र पर भरोसा नहीं रह गया, हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं तब भारत के गणतंत्र पर गर्व होता है।
(मनीषा-हिफी फीचर)



