मोदी की इजराइल यात्रा के निहितार्थ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 27-28 फरवरी को इजराइल जाने की संभावित खबर ने भारत की पश्चिम एशिया नीति में एक बार फिर नई हलचल पैदा कर दी है। यह यात्रा मोदी के तीसरे कार्यकाल में इजराइल की पहली यात्रा होगी और लगभग 9 साल के अंतराल के बाद होने जा रही है। इजराइल ने पहले ही प्रधानमंत्री को आमंत्रण भेज दिया है। यह दौरा ऐसे समय में प्रस्तावित है जब क्षेत्र में गाजा युद्ध के बाद संवेदनशीलता बनी हुई है, वहीं भारत-इजराइल संबंध रक्षा, तकनीक और व्यापार के मोर्चे पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
इस दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करना है। विशेषकर रक्षा, टेक्नोलॉजी, कृषि, साइबर सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग के क्षेत्रों में। हाल के महीनों में भारत और इजराइल के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद बढ़ा है। प्रधानमंत्री मोदी और इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच इस महीने बातचीत हुई, जो दो महीनों में दूसरी बार थी। दोनों पक्षों ने आतंकवाद के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की नीति दोहराई। नेतन्याहू ने भारतीय पक्ष को गाजा पीस प्लान की प्रगति पर जानकारी दी, जबकि भारत ने क्षेत्र में “न्यायसंगत और टिकाऊ शांति” के समर्थन को दोहराया। भारत ने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले की निंदा करने वाले शुरुआती देशों में जगह बनाई थी, लेकिन साथ ही गाजा में मानवीय कानून के पालन की लगातार बात करता रहा है। यही भारत की संतुलित कूटनीति का संकेत है।
इस संभावित यात्रा का एक बड़ा संदर्भ व्यापार और आर्थिक साझेदारी भी है। दोनों देश लंबे समय से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए ) की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। टार्म्स ऑफ रेफरेंस साइन होने के बाद अब औपचारिक वार्ताओं की शुरुआत हो चुकी है। फरवरी में एक इजराइली प्रतिनिधिमंडल दिल्ली आने वाला है। ऐसे में प्रधानमंत्री की यात्रा एफटीए को राजनीतिक समर्थन और गति दे सकती है जिससे निवेश, स्टार्टअप सहयोग और हाई-टेक इंडस्ट्री के लिए नए रास्ते खुलेंगे।
विशेष रूप से इस यात्रा को आईएमईसी (इण्डिया-मिडल इस्ट-युरोप कॉरिडोर ) के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसकी घोषणा नवंबर 2023 में दिल्ली में जी 20 के दौरान हुई थी। इजराइल, भारत और यूरोप के बीच आर्थिक-लॉजिस्टिक नेटवर्क के इस नए कॉरिडोर में एक अहम कड़ी है। मोदी की यात्रा इसे रणनीतिक “फिलिप” दे सकती है, खासकर तब जब वैश्विक सप्लाई चेन नए भू-राजनीतिक दबावों से गुजर रही है।
मोदी की पिछली इजराइल यात्रा जुलाई 2017 में हुई थी, जब वे इजराइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। उस दौरे की खास बात यह थी कि नेतन्याहू ने मोदी का लगभग पूरी यात्रा में साथ दिया जो सामान्यतः अमेरिकी राष्ट्रपति जैसे नेताओं को ही मिलता है। 2017 की यात्रा ने भारत की नीति में “डी -हाइफनेशन ” यानी इजराइल और फिलिस्तीन को अलग-अलग दृष्टि से देखने की नई शैली को भी रेखांकित किया, क्योंकि मोदी ने उस दौरान रामल्ला जाकर फिलिस्तीनी नेतृत्व से मुलाकात नहीं की थी।
कुल मिलाकर, फरवरी में प्रस्तावित यह दौरा केवल एक राजनयिक यात्रा नहीं होगा, बल्कि यह संकेत देगा कि भारत पश्चिम एशिया में रणनीतिक साझेदारी, सुरक्षा सहयोग और आर्थिक कनेक्टिविटी को एक साथ साधने की कोशिश कर रहा है। सवाल बस इतना है कि क्या यह यात्रा भारत को क्षेत्रीय स्थिरता में भी एक निर्णायक भूमिका की ओर ले जाएगी या यह केवल रणनीतिक हितों तक सीमित रहेगी?(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



