लेखक की कलम

शिया एकता का वाहक बना खामनेई का जनाजा

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा केवल एक धार्मिक या राजकीय कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि यह पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति, शिया एकजुटता और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का भी प्रतीक बनकर सामने आई। छह दिनों तक ईरान में चले अंतिम श्रद्धांजलि कार्यक्रमों के बाद जब उनका पार्थिव शरीर पड़ोसी देश इराक के पवित्र शहर नजफ पहुंचा, तो हजारों लोगों ने सड़कों पर उतरकर उन्हें अंतिम विदाई दी। इस अवसर पर उमड़ी भीड़ और विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक संगठनों की मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि खामेनेई का प्रभाव केवल ईरान तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे शिया जगत और पश्चिम एशिया की राजनीति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
नजफ की सड़कों पर बड़ी संख्या में लोग अयातुल्ला खामेनेई के चित्र लेकर एकत्र हुए। जुलूस के दौरान कई लोगों ने अमेरिका और इजराइल के विरोध में नारे लगाए। भीड़ में ईरान और इराक दोनों देशों के झंडे दिखाई दिए, वहीं ईरान समर्थित इराकी संगठनों के झंडे भी बड़ी संख्या में मौजूद थे। यह दृश्य इस बात का संकेत था कि खामेनेई केवल एक राष्ट्रीय नेता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी प्रभावशाली धार्मिक और राजनीतिक व्यक्तित्व माने जाते थे।
नजफ का शिया मुसलमानों के लिए विशेष धार्मिक महत्व है। यह शहर हजरत इमाम अली की दरगाह के कारण विश्वभर के शिया समुदाय की सबसे पवित्र स्थलों में से एक माना जाता है। इमाम अली, पैगंबर मोहम्मद के चचेरे भाई और दामाद थे तथा शिया परंपरा में पहले इमाम माने जाते हैं। ऐसे पवित्र नगर में खामेनेई की अंतिम यात्रा का पहुंचना केवल धार्मिक सम्मान नहीं, बल्कि शिया समुदाय की एकता और भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक माना जा रहा है।
गत 7 जुलाई को खामेनेई का पार्थिव शरीर नजफ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचा, जहां इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और प्रमुख धार्मिक नेताओं ने आधिकारिक रूप से उनका स्वागत किया। इस अवसर पर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन तथा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के वरिष्ठ कमांडर भी उपस्थित रहे। उनकी मौजूदगी इस बात को दर्शाती है कि ईरान इस अंतिम यात्रा को केवल एक शोक समारोह नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय महत्व के आयोजन के रूप में देख रहा है।
जानकारी के अनुसार नजफ के बाद अंतिम यात्रा को कर्बला ले जाया जाएगा। कर्बला शिया मुसलमानों का एक और अत्यंत पवित्र शहर है, जहां इमाम हुसैन की दरगाह स्थित है। इसके बाद पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए ईरान वापस ले जाया जाएगा। नजफ और कर्बला की यात्रा शिया धार्मिक परंपराओं में गहरे आध्यात्मिक महत्व रखती है और इसे श्रद्धा का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।
अयातुल्ला खामेनेई ने कई दशकों तक ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में देश की विदेश नीति, सुरक्षा रणनीति और धार्मिक नेतृत्व को दिशा दी। उनके कार्यकाल में ईरान ने क्षेत्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को मजबूत किया और इराक, सीरिया, लेबनान तथा अन्य क्षेत्रों में अपने प्रभाव का विस्तार किया। यही कारण है कि उनकी अंतिम यात्रा में ईरान समर्थित विभिन्न संगठनों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतिम यात्रा केवल श्रद्धांजलि का कार्यक्रम नहीं, बल्कि ईरान और इराक के बीच गहरे धार्मिक तथा राजनीतिक संबंधों का सार्वजनिक प्रदर्शन भी है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ते लंबे समय से रहे हैं। हर वर्ष लाखों ईरानी श्रद्धालु नजफ और कर्बला की यात्रा करते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच सामाजिक और धार्मिक संपर्क लगातार मजबूत हुआ है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम को क्षेत्रीय राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पश्चिम एशिया पहले से ही कई संघर्षों, सुरक्षा चुनौतियों और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं का केंद्र बना हुआ है। ऐसे समय में किसी प्रभावशाली नेता की अंतिम यात्रा भी राजनीतिक संदेश का माध्यम बन जाती है। जुलूस के दौरान लगाए गए नारे और विभिन्न संगठनों की भागीदारी इस बात का संकेत देते हैं कि क्षेत्रीय तनाव और वैचारिक विभाजन अभी भी समाप्त नहीं हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि खामेनेई के निधन के बाद ईरान की आंतरिक राजनीति और उसकी विदेश नीति में कुछ परिवर्तन संभव हैं, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि नया नेतृत्व किस प्रकार की रणनीति अपनाता है। साथ ही, ईरान के पड़ोसी देशों और वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रिया भी आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
अंततः अयातुल्ला अली खामेनेई की अंतिम यात्रा इतिहास के उन दुर्लभ अवसरों में शामिल हो गई है, जहां धार्मिक आस्था, जनभावना और अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक साथ दिखाई दीं। नजफ और कर्बला जैसे पवित्र शहरों में उमड़ी भीड़ ने यह दर्शाया कि उनका प्रभाव सीमाओं से परे था। वहीं यह घटनाक्रम इस बात की भी याद दिलाता है कि पश्चिम एशिया में धार्मिक प्रतीकों और नेतृत्व का प्रभाव आज भी राजनीति, कूटनीति और क्षेत्रीय संबंधों को गहराई से प्रभावित करता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान का नया नेतृत्व इस विरासत को किस दिशा में आगे बढ़ाता है और इसका क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)

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