नीतीश ने भी अपनाया परिवारवाद

राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी नीतीश कुमार ने भी अंततः परिवारवाद को अपना ही लिया। यह बात कुछ अटपटी लगती है लेकिन सच्चाई से बचा भी तो नहीं जा सकता। नीतीश कुमार ने जब राज्यसभा जाने की मर्जी जतायी थी, तभी सियासत में इस बात की चर्चा हो रही थी कि इसके पीछे एक नहीं कई कारण हैं। भाजपा भी कब तक इंतजार करती। उसके विधायक जद(यू) से अधिक पहले भी थे और अब भी हैं। इस बार अंतर बहुत मामूली रह गया तो भाजपा के कान खड़े हो गये। बिहार को अपने हाथ से भाजपा छोड़ना नहीं चाहती इसलिए नीतीश कुमार से दोस्ताना सौदेबाजी हो गयी है। इसी सौदेबाजी के तहत उनके बेटे निशांत कुमार ने जद(यू) की सक्रिय सदस्यता ग्रहण कर ली है। वह यहीं सीमित नहीं रहेंगे बल्कि चर्चा है कि उनको डिप्टी सीएम बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री इस बार भाजपा का होगा। निशांत को जद(यू) का सक्रिय सदस्य बना दिया गया, उस समय सभी बड़े नेता मौजूद थे लेकिन नीतीश कुमार नहीं थे। इसका कारण यही कि परिवारवाद की आलोचना करने वाले नीतीश से यह सवाल पूछा जा सकता था कि अपने बेटे निशांत को विरासत क्यों सौंप रहे हैं। लालू के परिवारवाद और नीतीश के परिवारवाद में अंतर ही क्या रह गया है। रही बात भाजपा की तो उसने परिवारवाद की आलोचना के साथ ही परिवारवाद को अपनाने की सियासी कला सीख ली है। भाजपा नेताओं के बेटे-बेटी धड़ल्ले से राजनीति कर रहे हैं। बिहार मंे निशांत का युग शुरू हो रहा है। इसकी नींव 24 जनवरी को डाली गयी जब सरस्वती पूजा के कार्यक्रम मंे निशांत को देख नीतीश हैरान रहे गये थे।
निश्चित रूप से बिहार की राजनीति एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। नीतीश कुमार अब राज्य का नेतृत्व छोड़ राज्य सभा जाने की तैयारी कर चुके हैं जबकि उनके बेटे निशांत ने औपचारिक तौर पर 8 मार्च को पटना में आयोजित एक भव्य समारोह में जनता दल यूनाइटेड की सदस्यता ग्रहण की। एक ओर जहां निशांत की एंट्री को नीतीश के उत्तराधिकार के प्लान के रूप में समझा जा रहा है तो वहीं इसे जेडीयू को एकजुट रखने की मजबूरी भी माना जा रहा है। निशांत कुमार ने पटना स्थित जेडीयू के ऑफिस में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इस दौरान पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता मौजूद रहे, जिनमें ललन सिंह, विजय चैधरी, संजय झा, श्रवण कुमार मुख्य थे। हैरानी की बात ये है कि बेटे निशांत कुमार के जेडीयू में शामिल होने के दौरान जो कार्यक्रम हुआ, उसमें नीतीश कुमार नहीं आए। ऐसे में इस बात की सियासत में काफी चर्चा रही। नीतीश कुमार ने हमेशा राजनीति में परिवार का विरोध किया। परिवारवाद को लेकर वे अक्सर अपने मित्र लालू प्रसाद पर भी आरोप लगाते रहे हैं लेकिन अचानक उनके बेटे निशांत की एंट्री ने लोगों को चैंकाया भी है। निशांत सालों तक कैमरे और सक्रिय राजनीति से दूर रहे लेकिन अचानक सत्ता के केंद्र में उनका आना एक संयोग नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी काफी अहम है।
निशांत कुमार ने कहा, पिताजी ने राज्यसभा जाने का निर्णय लिया है। ये उनका निजी फैसला है। मैं उसे स्वीकार करता हूं और उनका आदर करता हूं। हम सब मेरे पिता नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में काम करेंगे। पार्टी और जनता ने जो विश्वास मुझ पर जताया है, मैं उस पर खरा उतरने की कोशिश करूंगा। निशांत ने कहा, एक पार्टी कार्यकर्ता के रूप में मैं पार्टी को मजबूत करने की कोशिश करूंगा। पापा ने जो 20 साल में किया, उसे जन-जन में पहुंचाने की कोशिश करूंगा और जनता के दिल में अपनी जगह बनाने की कोशिश करूंगा।
निशांत की राजनीति में एंट्री इस बात को पुख्ता करती है कि नीतीश कुमार अब अपने उत्तराधिकार की योजना को आखिरी रूप दे रहे हैं। अंदरखाने यह माना जाता है कि नीतीश कुमार का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है और ऐसी हालत में मुख्यमंत्री के पद पर बने रहना उचित नहीं था। लेकिन सवाल यही कि अगर नीतीश नहीं तो फिर कौन? निशांत राजनीतिक तौर पर कभी एक्टिव नहीं रहे। वहीं जनता दल यूनाइडेट में नीतीश ने अपने सिवा नेताओं की कोई सेकेंड लाइन भी नहीं बनाई। ऐसे में अब जनता दल यूनाइटेड को नीतीश की जगह नए चेहरे की भी तलाश थी। संजय झा और ललन सिंह जैसे नेता हैं लेकिन कार्यकर्ताओं में नीतीश कुमार जैसा भरोसा इनमें नजर नहीं आता। ऐसे में निशांत को सामने लाया गया।
जनता दल यूनाइटेड का पूरा आधार नीतीश कुमार के सुशासन की छवि पर टिकी हुई है। ऐसे में निशांत को आगे लाकर पार्टी यह संदेश भी देना चाहती है कि नीतीश की स्वच्छ राजनीति का वारिस कोई और नहीं बल्कि उनका बेटा निशांत ही है। क्योंकि कार्यकर्ताओं की भावना भी निशांत के साथ जुड़ी हुई थी। कार्यकर्ता भी मांग कर रहे थे अगर नीतीश सीएम नहीं रहेंगे तो उनकी जगह निशांत को सामने लाया जाए। फिलहाल नई सरकार में उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है ताकि शासन पर नीतीश की पकड़ और ब्रैंड नीतीश की निरंतरता बनी रहे। दरअसल, यह फैसला पार्टी के अंदर काफी सोच समझकर लिया गया। नीतीश को गिरते स्वास्थ्य के चलते पहले की तरह काम कर पाने की ऊर्जा नहीं मिल पा रही है। इसलिए पार्टी के अंदर उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला लिया गया। खुद नीतीश भी कई बार यह कह चुके हैं कि वे कभी इस उच्च सदन का सदस्य नहीं रहे और उनकी इच्छा है कि वे एक बार राज्यसभा में जाएं लेकिन नीतीश के बाद कोई और चेहरा ही नहीं था जो नीतीश के उत्तराधिकार को भी संभाले और पार्टी को एकजुट भी रख सके। ऐसे में निशांत को पार्टी के अंदर सक्रिय भूमिका सौंपना जनता दल यूनाइटेड की मजबूरी भी थी।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की सक्रिय राजनीति में एंट्री को लेकर अटकलें गत 24 जनवरी को ही तेज हो गई थीं। जनता दल (यूनाइटेड) के कार्यालय में सरस्वती पूजा के आयोजन के दौरान यह चर्चा और जोर पकड़ गई, जहां कार्यकर्ताओं ने निशांत को पार्टी में शामिल होने के लिए मनाने की कोशिश की। बता दें कि यह कार्यक्रम जेडीयू आईटी सेल की ओर से आयोजित किया गया था। निशांत कुमार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से पहले ही पूजा पंडाल में पहुंच गए थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वहां पहुंचे तो उन्हें बेटे को देखकर हैरानी हुई। नीतीश कुमार ने निशांत से पूछा, तुम कब आए? कार्यक्रम के दौरान कार्यकर्ताओं ने निशांत के राजनीति में आने की मांग रखी। केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने निशांत के कंधे पर हाथ रखकर कहा, श्आप मान जाइए। इसके अलावा पार्टी के प्रदेश महासचिव छोटू सिंह ने भी निशांत से कहा, श्बोल दीजिए कि अब बनेंगे। निशांत कुमार ने इस दौरान शांत रहते हुए जवाब दिया, सरस्वती मां का आशीर्वाद लेने आए थे पिता जी। मैं भी सरस्वती मां का आशीर्वाद लेने आया हूं।श्ललन सिंह ने एक दिन पहले भी कहा था कि नीतीश कुमार को अब निशांत कुमार के राजनीति में प्रवेश के लिए सहमत हो जाना चाहिए। सरस्वती पूजा में नीतीश कुमार के सामने ही ललन सिंह और अन्य नेताओं ने निशांत को मनाने की कोशिश की, जिससे राजनीतिक हलकों में चर्चा छिड़ गई कि क्या बहुत जल्द सीएम के बेटे एक्टिव पॉलिटिक्स में एंट्री कर सकते हैं। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)



