थाईलैंड में रूढ़िवादी ताकतों की वापसी

थाईलैंड की राजनीति में 9 फरवरी को एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला, जब आम चुनावों के नतीजों ने रूढ़िवादी राजनीति को नई मजबूती प्रदान की। प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल के नेतृत्व वाली भुमजैथाई पार्टी ने उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन करते हुए स्पष्ट बढ़त हासिल की है। मतगणना के लगभग सभी परिणाम सामने आने के बाद भुमजैथाई पार्टी को पाँच सौ सदस्यीय संसद में एक सौ तिरानवे सीटें मिल चुकी थीं, जिससे सत्ता में उसकी स्थिति अत्यंत सशक्त हो गई है। चुनाव परिणामों के बाद प्रधानमंत्री अनुतिन चार्नवीराकुल ने कहा कि देश को एक मजबूत सरकार की आवश्यकता है। उन्होंने संकेत दिया कि वे व्यापक बहुमत वाली सरकार का गठन करना चाहते हैं, हालांकि अंतिम परिणाम आने के बाद ही औपचारिक बातचीत शुरू होगी। उनके इस बयान से यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में गठबंधन वार्ताएँ तेज होंगी। इन नतीजों का प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा। चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक अस्थिरता की आशंकाएँ कम हुईं, जिससे देश के आर्थिक माहौल में भी सकारात्मक संकेत मिले। वित्त मंत्री ने यह भरोसा दिलाया कि वर्तमान जनकल्याण योजनाओं और आर्थिक प्रोत्साहन कार्यक्रमों को जारी रखा जाएगा, जिससे बाजार में विश्वास बढ़ा है। जहाँ एक ओर सत्तारूढ़ दल को मजबूती मिली, वहीं प्रगतिशील विचारधारा वाली पीपुल्स पार्टी को बड़ा झटका लगा है। चुनाव से पहले अधिकांश जनमत सर्वेक्षणों में आगे चल रही इस पार्टी को केवल एक सौ अठारह सीटों पर संतोष करना पड़ा। यह परिणाम उस दल के लिए निराशाजनक है, जिसकी पूर्ववर्ती पार्टी ‘मूव फॉरवर्ड’ ने वर्ष दो हजार तेईस का चुनाव जीता था, लेकिन सरकार बनाने से रोक दी गई थी। स्थिति को और गंभीर बनाते हुए राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधक आयोग ने घोषणा की कि मूव फॉरवर्ड पार्टी के चवालीस पूर्व सांसदों ने नैतिक मानकों का उल्लंघन किया था। आरोप है कि इन नेताओं ने वर्ष दो हजार इक्कीस में संसद में शाही अपमान से जुड़े कानून में संशोधन का प्रयास किया था। इन चवालीस नेताओं में पीपुल्स पार्टी के दस नवनिर्वाचित सांसद भी शामिल हैं, जिनमें पार्टी प्रमुख नत्ताफोंग रूएंगपन्यावुत और उपनेता सिरीकन्या तंसाकुन प्रमुख हैं। अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय को भेजा जाएगा, जहाँ दोष सिद्ध होने पर इन नेताओं को पद से निलंबन और राजनीतिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। भुमजैथाई पार्टी को कुल मतों का लगभग तीस प्रतिशत समर्थन मिला और उसने कभी प्रभावशाली रही फेउ थाई पार्टी से भी कई सीटें छीन लीं। फेउ थाई पार्टी को केवल चैहत्तर सीटें मिलीं, जबकि अन्य छोटे दलों को मिलाकर कुल एक सौ पंद्रह सीटें हासिल हुईं। चुनाव में राष्ट्रवाद की भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई दी। अनुतिन चार्नवीराकुल ने कंबोडिया के साथ हुए हालिया सीमा संघर्ष के बाद राष्ट्रवादी भावनाओं को चुनावी रणनीति का आधार बनाया। उन्होंने कंबोडिया सीमा पर दीवार निर्माण और सेना को मजबूत करने का वादा दोहराया। इसके साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि नई सरकार में वित्त, विदेश और वाणिज्य मंत्रालयों में निरंतरता बनाए रखी जाएगी। आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियाँ बनी हुई हैं। मुद्रा के मजबूत होने, विदेशी शुल्कों और घरेलू कर्ज के दबाव के कारण आर्थिक वृद्धि दर के दो प्रतिशत से नीचे रहने की आशंका जताई जा रही है। बावजूद इसके, सरकार का दावा है कि दीर्घकालिक निवेश और विकास पर उसका ध्यान केंद्रित रहेगा।चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि मतदाताओं ने संविधान परिवर्तन के प्रस्ताव का समर्थन किया। लगभग दो-तिहाई मतदाताओं ने उस संविधान को बदलने के पक्ष में मतदान किया, जिसे वर्ष दो हजार चैदह के सैन्य हस्तक्षेप के बाद लागू किया गया था।
(वीपी राहुल-हिफी फीचर)



